रविवार, 18 जनवरी 2026

सुबह हो ही रही थी..

सुबह हो ही रही थी...
की आंख लग गई..।
आंख लगी ही थी कि..
सपनों में तुम आ गई..।
तुम आई ही थी,
की आंख खुल गई..।
आंख खुली ही थी..
कि मोबाइल पे एक मैसेज आया..
उस मेसैज ने मेरे लिए 
गुड मॉर्निंग का पैगाम लाया..।

सुबह हो ही रही थी..
की आंख लग गई..।


दोसजी..

मैं उसे हर रोज याद करता हूँ..
मगर उसे कॉल नही करता..।
क्योंकि..
ड़र लगता है..
कंही वो फिर कॉल न काट दे..।।



तुम्हारा फोन न उठाना उतना तकलीफ देह नही था..
जितना तुम्हारा फोन काटना..
आज भी दर्द देता है..।।

मालूम नही..
किस मनहूस घरी पर मैंने..
तुम्हें फोन किया..
जो तुम्हें फोन काटना पड़ा..।

मालूम नही क्यों..
मैं तुम्हें आज भी याद करता हूँ..
और तुम्हारे फ़ोन आने का इंतजार करता हूँ..।।

फ़ोन करने को मैं भी फ़ोन कर दु...
मगर डरता हूँ..
कंही तुम फिर फोन न काट दो..।।

मैं ये भी जानता हूँ..
क्योंकि.. 
तुम्हारी जिंदगी अब सिर्फ तुम्हारी नही है..
क्योंकि आधी जिंदगी की लगाम तूने..
मोहतरमा के हाथों में थमा दिया है..।

मुझे आज भी तुम्हारे फोन का इंतजार है..
और एक सच या झूठ सुनने का इंतजार है..
तुम फोन करो..और कहो..
दोसजी मैंने नही,हो सकता है..
उन्होंने फोन काट दिया हो..।
और मैं मुस्कुराते हुए इस सच को स्वीकार कर लूं..।

मुझे आज भी तुम्हारे कॉल का इंतजार है..
दोसजी..


हम अयोग्य है..

हम अयोग्य है..
इसीलिए तो लड़ रहे है..
लड़ भी किस चीज के लिए रहे है..
तेल,खनिज और जमीन के टुकड़े के लिए..।


जबकि ये ब्रह्मांड इतना विशाल है..कि
 इस पृथ्वी का भी..
इस ब्रह्मांड में कोई खास स्थान नही है..
जिस तेल खनिज के लिए हम लड़ रहे है..
हो सकता है..
ब्रह्मांड में कोई ऐसी जगह होगी जंहा..
खनिज और तेल की धार बह रही होगी..।

हम अयोग्य है..
इसलिय तो लड़ रहे है..।
खुद से..दूसरे से..
जिस रोज हमारी अयोग्यता दूर हो जाएगी..
उस रोज हम लड़ना बंद कर देंगे..।।

हम अयोग्य है...
इसलिय लड़ रहे है...।।

मैं तुमसे मिलकर..

कैसे कहु मैं उससे..
मुझे प्यार का इजहार करना नही आता..।
अगर देखना ही,हो तुमको..
मेरे दिल मे झांक कर देखो..
प्रेम का सैलाब बह रहा है..।

मुझे नही आता.. 
इस भीड़ की तरह प्रेम जताना..।
क्या करूँ..
मैं हूँ ही ऐसा..।

मैं तुमसे मिलकर..
"मैं"हो जाना चाहता हूँ..।
क्योंकि इस जंहा में सिर्फ एक ही सत्य तो है..
और वो है..
"मैं" हो जाना..।।


शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

सोचा था..

सोचा था तुम्हें अब मैसेज नही करूँगा..
मगर तुम्हारा स्टेटस देखकर..
मैं भूल गया..
की तुम्हें मैसेज नही करना था😊..।।

तुम मेरी जिंदगी में आई..
तपती धूप में,
बिन बादल बरसात की तरह..।
और मैं तुम्हें भूलने की व्यर्थ कोशिस कर रहा हूँ..
सावन की बरसात की तरह..।

तुम्हारा एक मैसेज..
मुझे स्पंदित कर देता है..
तुम्हारा एक कमेंट मुझे..
अनकही सी उलझन में डाल देता है..
कि कोई अजनबी..
इतना अपना सा कैसे लग सकता है.??


बुधवार, 14 जनवरी 2026

समय..

समय..
न यह ठहरता है..
न यह लौटता है..
यह तो बस..
पलकों के झपकने में बीत जाता है..।

जिसे हम 'कल' कहते है..
वह एक याद है..।

जिसे हम 'कल' कहेंगे..
वह एक प्यास है..।

और जो 'अभी' है..
बस वही प्रकाश है..।।



सत्य क्या है..??

सत्य क्या होता है..??
"सत्यं ज्ञानम अनंन्त ब्रह्म:"(तैत्तिरीय उपनिषद)


सत्य..क्या है??
जो तीनों कालों(भूत, वर्तमान और भविष्य) में एक समान रहें..।

ज्ञान क्या है..??
जो स्वयं प्रकाशित हो,और जिससे अन्य चीजों का भान हो..।
(जैसे अंधेरे में दिए के जलने से अन्य चीज का भान)

अनंन्त(infinite)
जिसकी कोई सीमा न हो..जो सर्वव्यापी और कालातीत है..।

"सत्य का ज्ञान अनंन्त है,और जो अनंन्त है वही ब्रह्मा है..।"

हम साधारण मनुष्य एक सीमा तक ही सोचते है,जबकि सत्य उस सीमा के परे होता है..और हम वंहा तक सोचते ही नही है..।

जब सूर्यास्त होता है तो हमें लगता है कि शाम हो गया,जबकि ये सत्य हमारे लिए है,जबकि किसी और क्षेत्र में रह रहे लोगों के लिए सूर्योदय हो रहा होगा..।
सूर्य सत्य है,मगर सूर्योदय और सूर्यास्त पूर्ण सत्य नही है..ये पृथ्वी के घूर्णन के कारण हो रहा है..।जब आप पृथ्वी के गति के साथ अपना तादात्मय बिठा लेंगे तब सत्य का भान होगा..मगर क्या ये आसान है..??

आसान तो नही है..मगर मुश्किल भी नही है..।
इसके लिए पहले अपने अंदर ज्ञान का बीज बोना होगा..और जब वो अंकुरित होगा तब खुद-व-खुद सत्य का भान होगा..।

इसकी प्रक्रिया क्या है..??
बहुत आसान है..
खुद के साथ सबको स्वीकारिये..
स्वीकृति ही प्रकृति के करीब ले जाएगा..।
क्योंकि सबका अपना-अपना सत्य है..भले ही दूसरे का सत्य आपके लिए सत्य न हो..मगर उसके सत्य को नकारे नही..।