मैं उसे हर रोज याद करता हूँ..
मगर उसे कॉल नही करता..।
क्योंकि..
ड़र लगता है..
कंही वो फिर कॉल न काट दे..।।
तुम्हारा फोन न उठाना उतना तकलीफ देह नही था..
जितना तुम्हारा फोन काटना..
आज भी दर्द देता है..।।
मालूम नही..
किस मनहूस घरी पर मैंने..
तुम्हें फोन किया..
जो तुम्हें फोन काटना पड़ा..।
मालूम नही क्यों..
मैं तुम्हें आज भी याद करता हूँ..
और तुम्हारे फ़ोन आने का इंतजार करता हूँ..।।
फ़ोन करने को मैं भी फ़ोन कर दु...
मगर डरता हूँ..
कंही तुम फिर फोन न काट दो..।।
मैं ये भी जानता हूँ..
क्योंकि..
तुम्हारी जिंदगी अब सिर्फ तुम्हारी नही है..
क्योंकि आधी जिंदगी की लगाम तूने..
मोहतरमा के हाथों में थमा दिया है..।
मुझे आज भी तुम्हारे फोन का इंतजार है..
और एक सच या झूठ सुनने का इंतजार है..
तुम फोन करो..और कहो..
दोसजी मैंने नही,हो सकता है..
उन्होंने फोन काट दिया हो..।
और मैं मुस्कुराते हुए इस सच को स्वीकार कर लूं..।
मुझे आज भी तुम्हारे कॉल का इंतजार है..
दोसजी..

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