इसका निर्णय कौन करेगा..??
ये भीड़...
या मैं स्वयं..
मैं अपने हर सच और हर झूठ से वाकिफ हूँ..
इसलिए सही निर्णय तो मैं ही कर पाऊंगा..।
ये भीड़ सिर्फ मुखौटा देखती है..
मन की गहराई नहीं..।
मैं अच्छा हूँ, या बुरा हूँ..
इसका निर्णय कौन करेगा..??
तराजू तो सबके हाथ में है..
पर बांट सबके अलग अलग है..
कोई स्वार्थ से तोलेगा..
तो कोई संस्कार से..
बेहतर है कि मैं खुद को खुद से तोलूं..।।
मैं अच्छा हूँ, या बुरा हूँ..
इसका निर्णय कौन करेगा..??
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥"
(भगवद्गीता)


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें