पहले भी मेरी बागडोर तुम्हारे ही हाथ में था..
मगर मैं नासमझ,समझ न पाया..
तुम्हारे इस रहस्य को जान न पाया..
यू ही जस्तज़ु करता रहा..
मगर क्या हासिल हुआ..।
आज वो देखा जिसे देख के सब समझ गया..
मेरी बागडोर पहले भी तुम्हारे हाथ मे था..
अब भी तुम्हारे ही हाथ मे है..
मगर मेरी ना समझी के कारण..
आपने बागडोर ढीला छोड़ दिया..
और में यू ही..भटकता रहा,और भटक रहा हूँ..
अब मेरी बागडोर कस के पकड़ो..
जिस तरह अर्जुन का बागडोर संभाले थे..
अब मेरा भी बागडोर संभालो..।
इतना सामर्थ्य दो..
की पूर्ण समर्पण कर पाऊं..
आप में और खुद का भेद मिटा पाऊं..।
मेरी बागडोर अब तुम्हीं संभालो..।

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