रविवार, 26 मार्च 2023

लोग बैचैन है..क्यों..??

लोग बैचैन है... 

क्यों..???

क्योंकि वो खाली है..।और वो अपने खालीपन को भरने के लिए बेचैन है...



इसीलिए तो वो कभी कुछ,कभी कुछ करने में व्यस्त है, कभी फेसबुक,कभी इंस्टाग्राम,कभी यूट्यूब,कभी हॉटस्टार,कभी नेटफ्लिक्स पे अपना समय जाया कर रहे होते है..।।

हमें लगता है कि वो अपना समय बर्बाद कर रहे है...मगर वास्तिवकता ये है कि, वो अपना खालीपन भरने के लिए बेचैन है..।। कितने लोग तो ताउम्र गुजार लेते है मगर उनका खालीपन कभी भर नही पाता..।।

जब तक आपका खालीपन नही भरेगा तबतक आप बैचैन रहोगे,आप वो सब करोगे जो आप करना नही चाहते,मगर आप मजबूर है क्योंकि आपको अपना खालीपन जो भरना है..।

 कभी आपने लूडो या पजल खेला है...??

आपने देखा होगा कि जबतक सही नंबर नही आता तबतक आपको खेलना होता है.. ज्योही सही नंबर मिल जाये ,आप जीत जाते है,और खेल समाप्त हो जाता है ..।।      

  


 उसी तरह जब आपके जिंदगी में सही नंबर,मतलब सही उद्देश्य का पता चल जाएगा त्योंही आपकी सारी बेचैनियां दूर हो जाएगी.. आप जंहा-तहां जो भटक रहे है, वो भटकन समाप्त हो जाएगी। अपने खालीपन को भरने के लिए अपने उद्देश्य को ढूंढे.. जिस रोज आपका अपना उद्देश्य मिल जाएगा,आप अनेक झंझटों से मुक्त हो जाओगे...।।                                           

अपने उद्देश्य को कैसे जाने..???                                        

आसान नही है... मगर मुश्किल भी नही है..                          

प्रकृति का स्वभाव क्या है..??                                        

प्रकृति का स्वभाव देने का है..            

◆क्या इसमें से कोई लक्षण आपमें है-

सोचे क्या आप जो कर रहे है,उससे आपको संतुष्टि मिल रही. 

●आप जो कर रहे है,क्या वो सही है..?                                

●आप जो कर रहे है,क्या इससे किसी की जिंदगी में बदलाव आ रहा है..या आएगा??                                             

 ●क्या आपके जिंदगी में अभी भी,करुणा,दया का भाव उपस्थित है..।

अगर हां,तो आपका खालीपन भर गया होगा,या भर रहा होगा..और आप अपने उद्देश्य की और अग्रसर हो रहे है..।        

मगर अफसोस कि अक्सरहां का जबाब "ना" में होगा.. इसीलिये आप बैचैन है..।

बदलाव प्रकृति का स्वभाव है,मगर खुद में अच्छा बदलाव लाना महानता का स्वभाव है..।।                                       

अगर आप अपने आप को बदल सकते है,तो आप अपने खालीपन को भी भर सकते है..।।

रविवार, 5 फ़रवरी 2023

सफल होना जरूरी क्यों है..??

सफलता जिंदगी में बहुत मायने रखता है..।



सच कहूं तो आपका अस्तित्व कंही-न-कंही आपके सफलता पे ही टिकी हुई है..।।

आपने बगीचे में देखा होगा..

बच्चों का जमवाड़ा उसी पेड़ के पास होता है,

जिस पेड़ पे फल लदते है..

जिस पे फल नही लदते,उस पेड़ के चारोतारफ सिर्फ और सिर्फ झाड़ियां ही रहता है..।।


सफलता आपको अमूर्त रूप देता है..

सफलता से पहले आप कुछ नही होते,

ज्योहीं सफल होते है,

जिंदगी त्योंही 360° बदल जाती है..।।


सफल होना इसलिय जरूरी है कि,

सफलता आपको अपने अस्तित्व का अहसास दिलाता है..।


बिना सफलता की जिंदगी, उस भेड़ की भीड़ की तरह है..

जिस भीड़ का नेतृत्व करने वालों को, सिर्फ और सिर्फ पेट भरने की फिक्र रहता है..


निर्णय आपको करना है..

खुद के पेट भरने के लिए जीना है,

या फिर इस भीड़ का पेट भरने के लिए जीना है,

या फिर इस भीड़ को पेट भरने के फिक्र से मुक्त करना है.।


सफलता आपको इस काबिल बनाती है..

कि आप अपने पेट के साथ दूसरों का भी पेट भर सकते है,

यंहा तक कि सफलता आपको उस काबिल बनाती है कि आप इस भीड़ को पेट भरने की चिंता से भी मुक्त कर सकते है..।।


सफलता जरूरी है,अपने अस्तित्व का अहसास होने के लिए..।।

सफल होना इस प्रकृति की नियति है,

मगर मनुष्य ही है,जो अपने आप को असफल मान कर नियति को चुनौती देता है..।।


आप प्रकृति को एक बार गौर से देखे तो सही..

चाहे पर्वत हो या पठार हो,उसका सीना चीरकर जब पौधा निकलता है तो प्रकृति मुस्कुराती है..

चाहे चिलचिलाती गर्मी में रेगिस्तान की मिट्टी जल क्यों न रही हो.. जब उसके तपन को सहकर पौधा निकलता है तो उस प्रकृति को कितनी ख़ुशी होती है..।।

चाहे समुन्द्र की गहराइयों में सूर्य की रोशनी न पहुंचती हो, मगर उस अंधेरे में भी, जब पौधा निकलता है,और उस पौधे के झाड़ियों में जब मछली अपना आशियाना बनाती है,तो प्रकृति कितना खुश होती है..।।


एक मानव ही है,

जो हताश है,निराश है,

बेवजह है..

जबकि वो इस धरा पे सबसे लाजबाब है..।

फिर वो क्यों निराश है,हताश है..??

क्योंकि वो प्रकृति से विरक्त है..

इसीलिए तो वो हताश है,निराश है..।।


मंगलवार, 31 जनवरी 2023

शून्यता में ही पूर्णता का अहसास

 हमें लगता है कि हम बहुत कुछ जानते है,

मगर वास्तिवकता ये है कि हम कुछ नही जानते..

हम जितना जानने की कोशिश करते है,उतनी अज्ञानता बढ़ती जाती है..।।


इस ब्रह्मांड का निर्माण लगभग 13.8 अरब साल पहले से शुरू हुआ,और होमोसैपियन का विकास लगभग 3 लाख साल पहले.. इतनी लंबी यात्रा में आप क्या-क्या जान पाओगे..??

इसिलिय शून्यता में ही पूर्णता का अहसास होता है..।।

कंही आप स्मार्टफोन के गुलाम तो नही है..??

 आपको क्या लगता है...

स्मार्टफोन को आप कंट्रोल कर रहे है या

फिर स्मार्टफोन आपको कंट्रोल कर रहा है..???

जरा सोचिए..🤔

आपने आखरी बार गूगल पे काम की चीज कब सर्च किया था.. या फिर यूट्यूब पे ही..।।

अगर आपने बीते हुए 3 दिन के अंदर अपने काम की चीज को सर्च किया है,तो आप कभी भी  स्मार्टफोन की गुलामी की जंजीरों को तोड़ सकते है..।

अगर एक सप्ताह हो गया है,तो थोड़ा मुश्किल है..।

अगर 15 दिन से ज्यादा हो गया है तो आप मान लीजिए कि आप समार्टफोन के गुलाम हो चुके है..।

याद रखियेगा.. आपको अपने काम का ही चीज सर्च करना है,जो आपके रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा हो सकता है..।।

 अगर आप रोज सर्च कर पाते है तो समझ लीजिए स्मार्टफोन आपका गुलाम है..

शुक्रवार, 13 जनवरी 2023

नरेंद्र से विवेकानंद बनने की यात्रा..

 आज युवा दिवस है..



और आज के युवा को सोशल मीडिया पर स्क्रोल करते वक़्त ये भी नही मालूम नही होता कि,वो आखिर क्या ढूंढने के लिए स्क्रोल कर रहे है..।। 


आज इस सोशल मीडिया और इंटरनेट के माध्यम से उन्हें जानना बहुत आसान है,जिनके जन्मदिवस पे आज युवा दिवस मनाया जा रहा है..।


मगर हम ये नही जानना चाहते कि नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद बनने की यात्रा कैसा था..??

ये हरेक युवा को जानना चाहिए..


नरेंद्र का जन्म 12 जनुअरी 1867 में कोलकाता में हुआ। पिता विश्वनाथ दत्त वकील थे और माता भुवनेश्वरी देवी थी। 

इनके जीवन के ऊपर जितना प्रभाव पिता का पड़ा उतना ही माता का भी..।।

इनके दादाजी दुर्गाचरण दत्त संस्कृत और पारसी के विद्वान थे, साथ ही लॉ की भी पढ़ाई किये थे। 25 वर्ष की उम्र में ही संत बन गये।

जिसका कुछ न कुछ प्रभाव इनके ऊपर भी पड़ा ही होगा।।


1871 में 7 साल के उम्र में मेट्रो पॉलिअन्त स्कूल में नामांकन होता है।

1879 में प्रेसीडेंसी कॉलेज में नामांकन लेते है।

कॉलेज के पढ़ाई के दौरान ही , एक दिन प्रोफेसर विलियम हैस्टिक, विलियम वर्ड्सवर्थ की 'the excursion' चैप्टर पढ़ा रहे थे । उसी में एक शब्द "TRANCE" आता है। नरेंद्र इस शब्द को अच्छी तरह नही समझ पाते है तो प्रोफेसर कहते है इसे अच्छी तरह समझने के लिए रामकृष्ण परमहंस से मिलना होगा।

उन्ही दिनों कोलकाता में रामकृष्ण परमहंस(1881)सुरेंद्र नाथ मित्र के यंहा आये थे। ये बात नरेंद्र को जब पता चलता है तो वो अपने मित्र के साथ पहुंच जाते है। संगीत-गान की भी व्यवस्था किया गया था,मगर कोई आया नही। इसी समय मित्र के कहने पर वो गाते है- "जागो मां कुलकाण्डलिनी" जिसे सुन परमहंस भावविभोर हो जाते है। और उन्हें दक्षिणेस्वर बुलाते है।



जब नरेंद्र दक्षिणेस्वर जाते है तो पहला सवाल वो पूछते है- क्या आपने भगवान को देखा है..??

परमहंस कहते है- हां देखा है, जैसे तुम्हें देख रहा हूँ,वैसे ही देखा हूँ, बल्कि इससे भी अच्छी तरह से देखा हूँ।।


नरेंद्र का जाना-आना लगा रहता है। इसी बीच 1884 में पिता के मृत्यु होते ही मानो पहाड़ टूट पड़ता है। दिन-प्रतिदिन कर्जदार होते गए,ऊपर से रिश्तेदारों ने केस कर दिया। नरेंद्र ने पहली बार जाना कि गरीबी क्या होती है,खाली-पेट नॉकरी के तलाश में एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर का सिलसिला जारी रहता।

इसी बीच रामकृष्ण परमहंस से नजदीकियां और बढ़ गया।

नरेंद्र की व्याकुलता देखकर एकदिन परमहंस ने कहा अगर तुम मेरा काम करोगे, तो तुम्हारे परिवार का दो वक्त के रोटी का में बंदोबस्त कर दूंगा।

विवेकानंद ने हामी भर दी और शिष्यत्व ग्रहण किया। परमहंस ने उन्हें अपना उत्तरदायित्व दे दिया।


1886 में रामकृष्ण परमहंस के मृत्यु के बाद 'बराह मठ' का निर्माण किया और शिष्य भाई को संगठित कर वो लाहौर से कन्याकुमारी की यात्रा पे पैदल चल दिये।


खेतड़ी के राजा अजित सिंह के सहयोग से 11 सेप्टेंबर 1893 को शिकागो धर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए जाते है। और इसी समय खेतड़ी के महाराज द्वारा उन्हें "स्वामी विवेकानंद" नाम दिया जाता है



4 साल तक पकश्चिमी देशों में लगातार व्यख्यान देने का सिलसिला जारी रहता है।

 भारत वापस आने पर 1 मई 1897 को रामकृष्ण मिशन की स्थापना करते है।

इस बीच लगातार रामकृष्ण परमहंस के विचारों के माध्यम से समाज में नई चेतना का विकास करने का कार्य जारी रखते है।।

4 जुलाई 1902 को 39 वर्ष की आयु में बेलूर मठ में अपना प्राण त्याग देते है।


मगर उनके विचार और आदर्श आज भी युवाओं को उद्देलित करता है..।

वो कहते है-

 " सामाजिक परिवर्तन बाहर से नही,अंदर से होता है"

 "हर व्यक्ति को भगवान की तरह देखो,आप किसी की मदद नहीं कर सकते, बस उसकी सेवा कर सकते हैं।

 "शिक्षा का मतलब सूचना एकत्र करना नही बल्कि, जीवन, चरित्र,और व्यक्ति निर्माण पर होना चाहिए।

 "बिना महिला के सशक्त हुए बिना,समाज कभी सशक्त नही होगा।


उनके विचारों ने समाज के हरेक वर्ग को उद्देलित किया..।।

सुभाष चन्द्र बोस ने उन्हें भारत का "आध्यातिमक पिता" कहा..।।


उनके विचार आज भी प्रासंगिक है,मगर अफसोस आज के युवा को उनके विचार को तो छोड़िए,उनका क्या विचार है वो खुद निर्णय नही ले पा रहे है..।।



सोमवार, 9 जनवरी 2023

लता भगवान करे... क्या आप इन्हें जानते है..

"लता भगवान करे".. 



शायद आपने ये नाम सुना भी नही होगा.. सुनियेगा कैसे... क्योंकि ये हमलोगों से खास है..।।

जब लोग रिटायरमेंट ले के घर पकड़ लेते है, तब ये मैराथन में भाग लेती है, शौक से नही, मजबूरी के कारण.. मगर जीतती है। इस उम्र में लोगों की जब कमर सीधी नही होती,तब ये सिर्फ दौड़ती ही नही, बल्कि जीतती है..।।

चलिए 'लता भगवान करे' के जीवन के उस पहलू पे नजर डालते है,जो उन्हें उन भारतीयों महिलाओं के श्रेणी में लाकर रखता है, जो पूजनीय है..।।

चाहे कोई भी भारतीय माँ और बहन हो, वो अपने परिवार के लिए कुछ भी कर सकती है..।। मगर वर्तमान के पूंजीवादी संस्कृति इस छवि को धूमिल कर रही है,मगर कितना करेगी,हमारी आत्मा तो नही बदल सकती..।।

सच्चा भारत गांव में ही बसता है,उसी लाखों गाँवो में से एक महाराष्ट्र के बारामती के पास रहने वाली लता भगवान करे है। 2014 में इनके पति का तबियत इतना खराब हो गया कि इन्हें अच्छे इलाज के लिए ज्यादा पैसों का जरूरत था, आसपास के लोगों से पैसा इकट्ठा करके हॉस्पिटल में इलाज करवाने के लिए गई,मगर कुछ ही दिन बाद इनके पास MRI कराने का पैसा नही था।। हताश निराश हॉस्पिटल के बाहर चाय के दुकान में बैठकर जब कुछ खा रही थी,तब उन्हें उस पेपर कटिंग में मैराथन के बारे में पढ़ा..।।

और उस मैराथन में भाग लेने के लिए चल गई, शुरुआत में तो इन्हें इनकार कर दिया गया। मगर बहुत अनुरोध करने पर इन्हें भाग लेने दिया गया... तब इनकी उम्र 65 के आसपास था.. मैराथन दौड़ 3km का था..।।

आप जरा सोचिए एक 65 साल की महिला 3km की दौड़ में भाग ले रही है... क्या आपके रोंगटे नही खड़े हो रहे है..।।

'लता भगवान करे' साड़ी पहन कर दौड़ने को तैयार थी, दौड़ शुरू ही हुई थी, कि इनकी चप्पल टूट गई , ये नंगे पांव दौड़ना शुरू कर दी.. तबतक दौड़ती रही जबतक सबसे आगे और जीत नही गई..।।

इन्हें इस मैराथन से जो 5 हज़ार रुपया मिला उस पैसों से पति का MRI करवाया..।।



आखिर ऐसी कौन सी ऐसी चीज थी जिसने उन्हें जीतने को विवश किया...??? 

जरूरत... अगर आप अपनी जरूरत जानते है, तो आप हरेक सीमाओं को तोड़ सकते है,आप नए कीर्तिमान रच सकते है..।।

लता भगवान करे जैसी महिला हरेक भारतीय घर में है, जो समय आने पर सबकुछ न्यौछावर कर सकती है..। 

मगर कब...??

जब आप, उन्हें होने का अहसास होने देंगे....।

'लता भगवान करे' के ऊपर मराठी में फ़िल्म भी बनी जिसमें इन्होंने अपना किरदार स्वयं निभाया..। 2020 में इस फ़िल्म को 67वॉ राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार में विशेष उल्लेख(special mention) के लिए सम्मानित किया गया।।



जरा आप सोचिए🤔...??

65 साल के उम्र में कोई महिला मैराथन में साड़ी पहन कर दौड़ती है, और वो जीतती भी है..। फिर 68 साल के उम्र में सारा जीवन खेतों में काम करने वाली वही महिला फिल्मों में काम करती है...। और उस फ़िल्म को सम्मानित भी किया जाता है..।।

आप क्या सोचते है इसके बारे में..

शनिवार, 7 जनवरी 2023

नव वर्ष का पहला सप्ताह

 नव वर्ष का पहला सप्ताह...कैसा रहा..??


क्या आपने खुद से किया हुआ वादा निभाया,या फिर टूट गया..।।
टूट ही गया होगा...।
क्योंकि 60% से ज्यादा लोगों का नव-वर्ष में किया हुआ वादा एक ही सप्ताह में टूट जाता है। फरबरी आते - आते 80% और अप्रैल-मई तक 12% और लोग, खुद से किया हुआ वादा तोड़ लेते है..।।
सिर्फ 8% लोग ही नव-वर्ष में खुद से किया हुआ वादा निभा पाते है..।।
और ये वो ही लोग है.. जो सिर्फ अपने ही जिंदगी में नही बल्कि औरों के जिंदगी में भी बदलाव लाने की काबिलियत रखते है।

ऐसा क्या कारण है कि लोग लिए हुए संकल्प को निभा नही पाते....??
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि इसका सबसे प्रमुख कारण है कि, हम बिना योजना बनाये हुए ही संकल्प ले लेते है..।।

जरा सोचिए एक दिन में तो हिमालय नही चढ़ा जा सकता..
और हम कुछ इसी तरह का संकल्प ले लेते है,जो बोझ बन जाती है,जिसे कुछ लोग कुछ दिन ढो पाते है,और कुछ लोग कुछ सप्ताह और कुछ महीना..।। 

 और जब एक बार लिया हुआ संकल्प टूट जाता है,तो हम   अपने आप को ही हीन भावना से देखने लगते है,जोकि    बिल्कुल गलत है। ये समय होता है फिर से पुनर्विचार करने  का.. 
आखिर ऐसा क्यों हुआ..??
उस क्यों का जबाब ढूंढे...।।
जब जबाब मिल जाये तो आपके अंदर जरूर बदलाव आएगा..।।

अपने अंदर बदलाव लाने के लिए खुद को दंडित करें...।।

है न अजीब बात.. खुद को दंडित करना..।।
मगर जरा आप सोचिए🤔...
आपके जिंदगी में जो भी अनुसाशन है वो क्यों है...??
और कब आया..??
आप जब स्कूल लेट जाते थे तो मार पड़ता था, या फिर जब होमवर्क नही करते थे तब मार पड़ता था..और हम दंडित होने से बचने के लिए समय पर स्कूल जाते और होमवर्क करते..।।

आप हेलमेट क्यों पहनते है🤔...??
शायद कुछ ही लोगों का जबाब होगा सेफ्टी के लिए...
अक्सरहां भारतीय, ट्रैफिक पुलिस के डर से पहनते है😊..।।
यानी हम दंडित होने से बचने के लिए अनुशासन का पालन करते है..।।


तो अब आप फिर से खुद को दंडित करने का सोचिए..।
सिर्फ सोचिए ही नही खुद को दंडित कीजिये..।।
- हमें सिर्फ एक-एक दिन का संकल्प लेना है और उसे पूरा करना है..।
अगर पूरा न हो तो घर मे ही 54 बार दंड बैठक करना है..।।

और अगली बार, कोई गलती करने से पहले सोचिएगा..।।पहले दंडबैठक करू...
या फिर गलती करके दंड बैठक करू..।।

तो फिर शुरू हो जाइए खुद को दंडित करने के लिए..😊


Yoga for digestive system