शुक्रवार, 15 नवंबर 2024

कितना मुश्किल है..

कितना मुश्किल होता है,
बिना सपनो के जिया जाना..
सच कहता हूं..
इससे भी मुश्किल होता है..
सपने न पूरा होने का मलाल ले कर ताउम्र जिया जाना..
काश ये होता है,काश ये करता..
ताउम्र इस काश के सहारे 
सपने न पूरे होने का मलाल लेकर जिया जाना..।।
कितना मुश्किल होता है..
उस बड़े सपने का न पूरा होना..
उससे भी मुश्किल होता है..
छोटे सपनों को भी न पूरा कर..
ताउम्र जिया जाना..।।

मगर आप हार नही मानते हो, तो..
आपके सामने हमेशा एक विकल्प होता है..
उसे पूरा करने के लिए..
जुट जा,जी जान लगा दे..
जो कर सकता है,
वो सब कर ले..
इतना कर ले..
की भविष्य में सपने ना पूरे होने का मलाल न रहे..

कितना मुश्किल होता है..
बिना सपनों के जिया जाना..
उससे भी मुश्किल होता है..
सपनों का न पूरा होने का मलाल ले कर ताउम्र जिया जाना..
मगर हमेशा एक विकल्प होता है..
उस अधूरे सपनों के ऊपर मरहम लगाने का..
अगर ये भी न लगा पाया..
तो सच मे ..
कितना मुश्किल है बिना सपनो के जिया जाना..

रविवार, 10 नवंबर 2024

मंजिले मिल ही जाती है..अगर पता हो

हम में से बहुत कम लोग ही होते है,जो अपने मंजिल तक पहुंच पाते है..
इसके अनेक कारण है..
सबसे बड़ा कारण है कि हममें से बहुधा लोगों को पता ही नही है कि जाना(मंजिल) कंहा है..
कुछ लोग अनमने ढंग से शुरुआत करते है,और कुछ रुकावट के कारण हार मान लेते है..।।
मगर कुछ लोग मंजिल पर पहुंच ही जाते है,चाहे कैसी भी रुकावट हो..

एक छोटी सी आपबीती बताता हूँ..



मैं अभी एक मंदिर के प्रांगण में बैठा था..और एक चूहा झाड़ियों से निकलकर बाहर आया और चबूतरे के किनारे-किनारे आगे बढ़ने लगा..
उस चबूतरे पे फिलहाल में अकेले बैठा था..चूहे की आंखे मुझसे मिली..में थोड़ा डरा क्योंकि चूहा थोड़ा बीमारू लग रहा था...और दिमाग मे प्लेग का ख्याल आने लगा..
चूहा अगर 10 सेकंड और मुझे घूरता तो मैं वंहा से हट जाता..
(शायद वो 10 सेकंड सोचा कि क्या करना है.. 
सीख - हम इंसान को भी कोई निर्णय लेने से पहले सोचना चाहिए शायद 30 सेकंड से 2 मिनट..तब शायद सही निर्णय ले पाए)
मगर ये क्या, चूहे ने खुद रास्ता बदल लिया और मेरे पीछे से होते हुए आगे की और बढ़ गया..
जंहा कुछ दूर पे उसका बिल था..
और वो बिल में घुस गया..
और मुझे सोचने को विवश कर छोड़ गया..
(सीख-उस चूहा के सामने में ,मैं उसके काल के ही समान भीमकाय था,मगर वो डरा नही,बल्कि अपने मंजिल तक पहुंचने का निर्णय लिया...और हम इंसान क्या करते है.थोड़ी सी भी परेशानियां आती है,और हम घबरा जाता है..)


हममें से अक्सरहाँ लोग जिंदगी में कठिनाई आने पर क्या करते है..
उस कठिनाई से पल्ला झाड़ने का सोचते है..
या अनमने ढंग से प्रयास करते है..
कुछ लोग होते है..
जो कठिनाई से निकलने के लिए नया मार्ग ढूंढते है,
और मंजिल तक पहुंचते है..।।

अगर मंजिल का पता है,
तो लक्ष्य तक पहुंचना आसान हो जाता है..
अगर आपकी मंजिल आपके अस्तित्व का निर्णय करती है..
तब तो सबकुछ दांव पे लगा कर मंजिल तक पहुंचना जरूरी हो जाता है..

शुक्रवार, 1 नवंबर 2024

कभी-कभी...

कभी-कभी जान बूझकर हंसता हूँ मैं..
अपने गम को छुपाने के लिए..
कभी-कभी यू ही भीड़ का हिस्सा बन जाता हूँ मैं..
अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए..
कभी-कभी यू ही पेड़-पौधों से बात करने लगता हूँ मैं..
अपने होने का भान होने के लिए..
कभी-कभी यू ही समुन्द्र का सैर कर लेता हूँ मैं..
अपने अंदर छुपी उद्वेग को दूर करने के लिए..
कभी-कभी यू ही रात में आसमां को निघारने लगता हूं मैं..
अपने अस्तित्व को जानने के लिए..
कभी-कभी यू ही इस ब्रह्मण्ड के बारे में सोचने लगता हूँ मैं..
इसका उत्तराधिकारी होने के नाते😊..
कभी-कभी खुद के बारे में सोचने का प्रयास करता हूँ मैं..
मगर मैं,का भान होने से पहले ही, कंही भटक जाता हूँ मैं..।
कभी-कभी..यू ही _ख  ले_ हूँ मैं..
अपने मन को बहलाने के लिए..😊



बुधवार, 30 अक्टूबर 2024

इस दीवाली.."अप्प दीपो भवः"

महात्मा बुद्ध के अंतिम क्षणों में उनके शिष्य आंनद ने उनसे पूछा- महात्मन हमलोगों के लिए क्या संदेश है..
उन्होंने कहा- "अप्प दीपो भवः"
यानी अपना दीपक स्वयं बने...।।

मगर वर्तमान में क्या हो रहा है..
आप जरा सोचिए बचपन से लेकर अबतक आप दूसरों के विचारों से ही प्रभावित है,आप आज जो कुछ कर भी रहे है कंही न कंही उसपे दूसरों का प्रभाव ही है..

वास्तविकता तो ये है कि वर्तमान समय मे हम खुद से कुछ निर्णय लेने की स्थिति में है ही नही..।।

आपको अगर कुछ खरीदना है तो आप कमेंट और रिव्यु देखते है,इंस्टा पर रील देखकर फैशन का चयन करते है..
Tv और मोबाइल पे ऐड देखकर आप समान खरीदते है..।।

जरा सोचिए आपने आखरी बार कब अपनी पंसंद की वस्तु खरीदी थी..जिसके लिए आपको ऐड और रिव्यु नही देखना पड़ा था..।।

वर्तमान में हमारी नई जेनरेशन पूर्णतया दूसरों पे आश्रित होते जा रहे है..
वो कुछ भी निर्णय करने की स्थिति में आज नही है..
वो क्या पहनेंगे,क्या खाएंगे,क्या पियेंगे,क्या करेंगे..
इसका निर्णय कोई और कार रहा है..
अब ये स्थिति ग्रामीण क्षेत्र में भी अपना विशालकाय रूप धारण करने को अग्रसर है..।।

इसलिय इस दीवली एक दीप अपने लिए जलाए..
और स्वयं ही "अप्प दीपो भवः " होए..

एक नया कीर्तिमान रचना है..

सब जिंदगी के किसी न किसी मुकाम पे पहुंच गए..
मैं जंहा था,वंही ही रह गया..
एक समय था जब मैं खुद से कहा करता था..
मैं इतनी लंबी छलांग लगाऊंगा की मैं सबसे आगे निकल जाऊंगा..
और सबसे आगे निकल जाऊंगा..।

आज फिर खुद को देखता हूँ..
तो खुद को वंही पाता हूँ,
जंहा सालों पहले थे..
और जो मुझसे आगे थे,
वो सच में बहुत आगे निकल गए..।।

मेरा होड़ किसी से नही है स्वयं के सिवा..
मैं खुद को ही नही हरा पा रहा हूँ..
तो औरों की बात क्या है..।।

एक लंबी छलांग तो लगानी है..
अपनी सारी असफलताओं को ठेंगा दिखाकर..
एक नया कीर्तिमान रचना है..।।

क्योंकि..
मैं कल भी आशावादी था,
मैं आज भी आशावादी हूँ,
मैं कल भी आशावादी रहूंगा..😊


रविवार, 27 अक्टूबर 2024

प्यार की पांति...मालूम नही तुम क्यों..

मालूम नही,तुम क्यों याद आती हो..
जब भी याद आती हो..
आंखें नम करके चली जाती हो..
मालूम नही तुम क्यों याद आती हो..।

जब भी मैं एकाकी महसूस करता हूँ
(जब भी कुछ ज्यादा हो गया😊)
सहसा तुम्हारा ख्याल आता है..
शायद मैं तुम्हारा ऋणी हूँ..
इसीलिए शायद तुम याद आती हो..।

वास्तविकता तो ये है..
की सालों से तुम्हारा कोई खबर नही है..
इस डिजिटल युग मे भी तुम,
न जाने कंहा गुम हो..।

अब तुम्हारी याद भी..
अरब सागर के सुनामी की तरह ही आती है..
मगर फिर भी..
मालूम नही तुम क्यों याद आती हो..।।

वैसे भी हम कभी पैंजिया थे ही नही..
कुछ उम्मीदें जगी भी,
मगर जगने से पहले ही हम,
अंगारलैंड और गौंडवानलैंड में बट गए..
मैं तुम्हारा पीछा करते-करते 
दक्षणी गोलार्ध से उत्तरी गोलार्ध मैं पहुंच गया..
मगर तुम्हारा कुछ पता ही नही चला..
मगर तुम्हारा अस्तित्व है अभी भी,
इसीलिये तो भूकंप की तरह,
मेरे अंदर उद्गार मारती हो कभी-कभी..।।
मालूम नही तुम क्यों याद आती हो..।।



क्या आप भी संडे को आराम फरमाते है..

आपने अक्सरहाँ सुना होगा..
कल तो संडे है..अपना दिन है..
मगर अफसोस इस दिन को हम अपना नही बना पाते...
आपको कोई ऐसा संडे याद है,जो आपके लिए खाश हो..
शायद अधिकांश का जबाब नही में ही होगा..
क्यों...??
क्योंकि संडे को हम आराम फरमाते है..।
अब स्कूल के बच्चे ही नही बल्कि बड़े भी संडे को देर तक आराम फरमाते है..
अब ये चलन गाँव तक पहुंच गया है..
क्योंकि अब हमारी निर्भरता कृषि पर से कम जो होती जा रही है..।।



क्या आपको पता है...
संडे को छुट्टी देने की शुरुआत कब और क्यों हुई..??

आज से लगभग 175 साल पहले तक संडे को छुट्टी के रूप में मनाने का रिवाज नही था..
सन 1843 में पहली बार ब्रिटेन के गवर्नर ने स्कूल में संडे को छुट्टी देने की घोषणा की...
जिससे बच्चे कुछ नया क्रिएटिव कर सके..
मगर आप ही बताए कितने बच्चे आज क्रिएटिव काम करते है या फिर हम बच्चों को करने देते है..😊

भारत मे संडे की छुट्टी की शुरुआत की मांग, मजदूर नेता मेधाजी लोखंडे ने 1857 में की, और इनकी मांग को अंग्रेजो ने 10 जून 1890 की स्वीकार कर लिया...
और सबके लिए संडे की छुट्टी घोषित कर दिया गया..।।

मगर वास्तविकता तो ये है कि,
 संडे तो गुलामों के लिए होता है..
 राजा के लिए संडे तो कुछ नया करने के लिए एक   सुनहरा  अवसर  होता है..
 निर्णय आपको करना है..
 संडे को गुलामों की तरह जाया करना है,
 या फिर राजा की तरह सदुपयोग...😊

Yoga for digestive system