सोमवार, 7 अप्रैल 2025

टिक-टिक की आवाज...

रेलवे ब्रिज पे चढ़ा ही था कि एक अंधे व्यक्ति से टकरा गया..
कैसे टकराया मालूम नही क्योंकि भीड़ बहुत ज्यादा थी..
मैं भी प्लेटफार्म 9 पे जा रहा था और उन्हें भी प्लेटफार्म 9 पे ही जाना था...


उन्होंने मुझसे पूछा प्लेटफार्म 9 पे जाना है..
मैंने कहा हां प्लेटफार्म 9 के लिए इधर से ही जाना है..
उन्होंने मुझसे कहा-क्या आप मुझे छोड़ देंगे..
मुझे कल्याण जाना है।
मैंने कहा हां..
मैं भी इधर से ही जा रहा हूँ..
उन्होंने अपना हाथ मेरे कंधे पे रखा और चलने लगे..
(एक अजीब सी अनुभूति हो रही थी..मानो कोई कोमल हाथ जैसे कमल की पंखुड़िया मेरे कंधे पे हो)
स्लोपिंग वाला रास्ता था तो मैंने उनसे कहा आप अपना स्टिक खोल लीजिये..
उन्होंने कहा खराब हो गया है..
फिर उन्होंने कहा कि मैं ATM कवर,टिश्यू पेपर थैला में रखकर बेचता हूँ.. 
वो थैला उनके हाथ से लटकी हुई थी..।
उनकी बात जब खत्म हुई तो मैंने उनसे पूछा स्टिक कितने में देता है..
उन्होंने कहा 180₹ मैं..क्या आप मेरी मदद करेंगे..
मैंने कुछ नही कहा..
हम तबतक प्लेटफार्म पे पहुंच गए..
उन्होंने कहा ये ट्रैन कर्जत जाएगी..
मैंने उनसे पूछा क्या ये कल्याण होते हुए जाती है..
उन्होंने कहा हां..
तबतक ट्रैन खुल गई..।
फिर उन्होंने कहा मुझे हैंडीकैप्ड वाले डिब्बे के पास ले चले..
सीढ़ी के पास डिब्बा लगता है..
मैं सीढ़ी ढूंढने लगा, जो की सामने था..
उन्होंने कहा हां...हां यही..
टिक-टिक की आवाज आ रही है..
फिर उन्होंने एक चबूतरे की तरफ चेहरे करके पूछा क्या ये जगह खाली है..
चबूतरे पे बैठे हुए लोगों में से एक महिला ने कहा नही..
उन्होंने कहा ठीक है..
मैंने सोचा स्टिक का पैसा दे देता हूँ..
मैं 180₹ ढूंढने लगा..
फिर सोचा 180₹ नही 200₹ दे देता हूँ..।।
मैंने उनके हाथ मे 100-100 के 2 नोट थमाए और कहा 200₹ है..
उन्होंने कहा - धन्यवाद आपका..
मैंने कहा..इसकी कोई जरूरत नही..।
और मैं वंहा से अपनी ट्रैन पकड़ने के लिए आ गया..।
तबतक उनकी भी ट्रेन आ गई..
मैंने पीछे मुड़कर देखा कि, वो चढ़े की नही..
मगर वो अपने हाथों के सहारे ट्रैन में चढ़ गए..।।
और ट्रेन खुल गई..।।

और मैं सोचता ही रह गया...
आखिर वो कैसे हरेक छोटी बातों का ख्याल रखे हुए थे..
और हम आम इंसान हरेक छोटी बातों को दरकिनार करते है..।

ये ट्रैन कर्जत जाएगी..
ट्रैन खुल गई..
सीढ़ी के नीचे हैंडीकैप्ड बोगी..
टिक-टिक की आवाज..
क्या जगह खाली है..
धन्यवाद आपका..।।






रविवार, 6 अप्रैल 2025

प्यार की पांति...कैसे निष्ठुर थे तुम...

कैसे निष्ठुर थे तुम..
मैं या तुम..??
कैसे छोड़ के गए तुम..
चोरी चुपके..।।
हां गलती हुई मुझसे..
मगर अपनी शर्म हया को बचाने के खातिर ही निकला था मैं चुपके चुपके..
तुम तो मुझसे भी ज्यादा निष्ठुर निकली..
तुम इस तरह गायब हुई..
मेरी जिंदगी से जैसे तुम्हारा कोई अस्तित्व था ही नही..।।
कैसे निष्ठुर थे तुम..
मैं या तुम..??

राम से श्रीराम की यात्रा..

क्या राम आज भी प्रासंगिक है..??
अगर हां...तो कंहा..??
सोचिए...
आपके अनुसार राम की प्रासंगिकता कंहा है..??

मेरे अनुसार राम की प्रासंगिकता हमारे जीवन को छोड़करके हरेक जगह है..
हमारे जीवन मे अगर राम की प्रासंगिकता अगर बनी हुई है तो वो राजनीतिक कारणों से ही..
या फिर मंदिर में विराजमान होने के कारण..।
या फिर बाजारवाद के कारण ही राम आज प्रांसगिक बने हुए है..
क्योंकि राम के कारण..
कई राजनीतिक पार्टियों की राजनीति चल रही है..
तो कंही राम के कारण बहुत बड़ा बाजार को बढ़ावा मिल रहा है, जिससे कइयों का पेट और आजीविका चल रहा है..।

अक्सरहाँ लोग रामराज की बात करते है..
मगर राम के चरित्र के बारे में कोई बात नही करते..
क्या बिना राम के चरित्र को अनुसरण किये हुए राम राज्य की कल्पना किया जा सकता है..।

आज हममें से अक्सरहाँ लोग राम के चरित्र के बारे में नही जानते...
उनके राम से श्रीराम बनने की यात्रा को नही जानते..
बिना इस यात्रा को जाने हुए क्या हम राम को जान सकते है..??
चलिए राम से श्रीराम बनने की यात्रा को जानते है..



बुधवार, 2 अप्रैल 2025

शैतान

हमसब के अंदर एक शैतान छुपा होता है..
जो नियम,कानून,परवरिश और समाज के भय से छुपा रहता है..।
कभी-कभी वो हमारे क्रोध के रूप में बाहर आता है,और फिर कुछ समय बाद वो किसी कोने में दुबक जाता है।
मगर कभी-कभी हमारा क्रोध इतना उग्र हो जाता है की हमारे अंदर छुपा शैतान बाहर आ ही जाता है,और कुछ गलत कर जाता है..जिसकी सजा ताउम्र भुगतनी पड़ती है..।

आजकल तो हमारे अंदर छुपे शैतान को तो अक्सरहाँ बाहर हुलकिया मारने का मौका मिलता रहता है..
और ये मौका सोशल मीडिया दे रहा है..
ये शैतान वंहा पे अपना स्वरूप दिखाता रहता है..।।

स्वीकारिये...

हमसब कंही न कंही गलतियां करते है,
कभी गलती से करते है,तो कभी-कभी जानबूझकर..।
और फिर इन गलतियों के कारण कभी सजा भुगतना पड़ता है..
या फिर कई बार इसकी सफाई देना पड़ता है..।।
और अक्सरहाँ इसकी टीस उभरती रहती है..
कभी-कभी तो, ये टीस ताउम्र बनी रहती है..।।
क्या इससे छुटकारा पाया जा सकता है..??
बिल्कुल..
सिर्फ एक काम करना है..
आपको अपनी गलतियां स्वीकारना है..।
क्या हम अपनी गलतियां स्वीकार सकते है..??
ज्योही,हम अपनी गलतियां स्वीकारते है..
सारा टीस और तकलीफ खत्म हो जाती है..
चाहे वो कितनी बड़ी या पुरानी ही क्यों न हो..।।



जब हम अपनी गलतियां स्वीकारते है..
तो हममें गंभीरता आती है..
और इस गंभीरता में सारे दर्द,बोझ और टीस दफन हो जाते है..
और ये फिर कभी उभरकर नही आते है..।।

स्वीकारे... अपनी गलतियों को..
स्वीकारे... अपने कमियों को..
स्वीकारी...अपने नाकामियों को..
स्वीकारे...अपने आप को..
ये स्वीकार ही आपको स्वीकृति देगी..
ये स्वीकार ही आपको नई आकृति देगी..
ये स्वीकार ही आपको स्वयं से साक्षात्कार कराएगी..।।
मत भागिए..
कंहा तक भागियेगा..
भागते-भागते फिर वंही पे आ जाइयेगा..
स्वीकारिये..और सिर्फ स्वीकारिये..


शुक्रवार, 21 मार्च 2025

किसी से उलझे नही..

हममें से शायद ही कोई होगा..
जो किसी से कभी उलझा ना होगा..।



बचपन(3-12वर्ष की आयु) में तो सभी उलझते है..
उलझना भी चाहिए...क्योंकि हम जबतक उलझेंगे नही, तबतक उलझने और सुलझने की अहमियत कैसे पता चलेगा..।।

•मगर जब हम युवावस्था(13-30) में आते है..
तब भी उलझते है..
इस समय हम 2 तरह से उलझते है..
¡.पहले, अपने अधिकारों और जब अन्याय होते हुए देखते है तब उलझते है..जो सही ही नही,बल्कि पूर्णतया सही है..।
¡¡. दूसरा,हम यू ही उलझते है..किसी का मजाक उड़ाते हुए,तो अपने ईष्या, द्वेष,लालसा,स्वार्थ और अपनी अहम के हितों के लिए..। जो कि बिल्कुल गलत है,अगर इसे युवावस्था में पहचान कर इस कमियों को दूर नही किया तो ये ताउम्र हमारे साथ रहता है..।

•मगर जब हम प्रौढ़ावस्था(31-60) में आते है तो हममें से अधिकांश लोग उलझने से बचने लगते है,जो कि बिल्कुल सही है..।क्योंकि हम जब किसी से उलझते है,तो सिर्फ अपना समय ही जाया नही करते बल्कि अपने व्यक्तित्व का भी ह्रास करते है..।
आपने अक्सरहाँ सुना होगा..
"यार मैं तो सोचता था ये तो बड़ा अच्छा आदमी है,
  मगर ये तो बड़ा ..........निकला"।
आखिर ऐसा क्यों हुआ..
क्योंकि उन्होंने उलझने का जिम्मा उठाया..
बिना ये जाने की आगे वाला व्यक्ति कैसा है..।।

"उलझना बुरा नही है,आप किस से,और क्यों उलझते है ये महत्वपूर्ण है.."।

प्रौढ़ावस्था में आने के बाद अक्सरहाँ लोग उलझने से बचते है..
तबतक जबतक कोई आंच व्यक्तित्व पे ना आये..इस समय भी वो कोई रास्ता तलाशते है..बिना खुद आगे आये इसे सुलझाने की कोशिश करते है..ऐसे ही लोग सफल होते है..।।
हां कभी-कभी इसका खामियाजा उठाना पड़ता है..क्योंकि कुछ लोग आपका फायदा उठाते है..मगर कोई बात नही..
आप सुकून से जीते है,और वो ताउम्र दुविधा में जीते है..।।

आप जरा सोचिए...
आप घर से ट्रैन पकड़ने के लिए निकलते है,और रास्ते में ऑटो वाला आपको आधे रास्ते में उतार देता है, ये कहकर की आपको दूसरा ऑटो पकड़ा देते है..2 पैसेंजर लेकर हम कंहा जाए..आप उससे उलझ जाते है..और कहते है कि स्टेशन नही जाना था तो पहले ही बोलना था ना.. ऑटो वाला अपनी गलती स्वीकारता है मगर आप तब भी उससे बहस कर रहे है..।
अंत मे आप दूसरा ऑटो पकड़ते है..मगर जब आप शहर में एंट्री करते है तो ट्रैफिक बहुत रहता है..और आपकी नजर बार-बार घड़ी पे जाता है..कंही ट्रैन छूट ना जाये..किसी तरह ट्रैफिक घटती है और आप स्टेशन पर पहुंचते है..
तो आप देखते है कि आपके सामने से ट्रेन गुजर रही है..
अब आप चाह कर भी उसे नही पकड़ सकते..।।


जरा सोचिए..अब आपके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा..।
अगर आप ऑटो वाले से न उलझ कर सीधे दूसरे ऑटो में बैठ गए होते तो,क्या आपकी ट्रैन छूटती..।।

अक्सरहाँ हम अपने विचारों को दूसरों पे थोपने के लिए उलझते है..
या फिर खुद को साबित करने के लिए दूसरों से उलझते है.. 
वो भी किसके सामने..जिसके सामने खुद को सत्यापित करके कुछ न मिलने वाला है..ऐसे जगह पर मौन रहना ही बेहतर है..।।

"उलझना बुरी बात नही है,मगर बात-बात पर उलझना बुरी बात है"।

"जिंदगी में अगर आगे बढ़ना है,तो अपने दुश्मनों से भी उलझने से बचें"।

प्रकृति भी हमें यही सिखाती है..
जो पेड़ आपस मे उलझते है वो क्षमतावान होते हुए भी ज्यादा ऊंचे नही उठ पाते..बांस को ही देख लीजिए।
दूसरी तरफ चीर, देवदार, रेडवुड,स्प्रूस इत्यादि येअनेक विपरीत परिस्थितियों का सामना करते है..महीनों बिना पानी के या फिर महीनों बर्फ से ढक्के रहते है या फिर पहाड़ो पे तेज हवाओं के झोंकाओ का सामना करते रहते है..
मगर ये किसी से उलझते नही है...इसीलिये तो ये आसमां की ऊंचाइयों को छूते है..।।

सचिन तेंदुलकर का नाम सुना है..
मुथैया मुरलीधरन का नाम सुना है..
ये दोनों क्रिकेट के महानतम बल्लेबाज और गेंदबाज है..क्यों..??
क्योंकि इसीलिए की ये अच्छे बल्लेबाज और गेंदबाज थे,नही बल्कि इन्होंने अपने कैरियर में किसी से उलझने का जोखिम नही लिया..।।

इसीलिये जितना हो सके उलझने से बचें..
खासकर ऐसे लोगों से..
जो आपके अपने है..
दूसरे,वो लोग जो आपके ऊपर छींटे उछालते है,आपके पाँव खिंचते है..क्योंकि ये बदलने वाले नही है,आप जितने इनसे उलझेंगे ये आपको उतना ही दलदल में लेते जाएंगे..और आप कभी निकल नही पाएंगे..।
तीसरे वो लोग जिनको आप जानते तक नही..जिनसे गलती तो हो गई मगर वो स्वीकारते नही ऐसे लोगों से नही उलझे..।

क्या उलझे ही नही..??
उलझे..अपने और समाज के अधिकार के लिए,
उलझे..अपने उन्नति के लिए..
उलझे..अपने आत्मसम्मान के लिए(उससे नही जो आपको जानता ही नही)
उलझे..एक बेहतर विश्व के निर्माण के लिए..
उलझे..उसी से,जो आपके स्तर का..बाकी को माफ कर दे या माफी मांग ले..।।
यही है जिंदगी में आगे बढ़ने की रणनीति..।।


सोमवार, 17 मार्च 2025

प्यार की पांति...

तुम बड़ी ईष्यालु हो..
जब भी मेरे करीब कोई आता है..
तुम सरपट दौड़ के चली आती हो..।
आखिर क्यों..??
तुम कंहा हो,कैसी हो..??
मुझे कुछ भी पता नही..
क्योंकि तुम चाहती ही नही..।।
मगर फिर क्यों..??
तुम मेरे जेहन में आती हो..
जबकि मैं तुम्हे याद तक नही करता..
फिर क्यों,
तुम अपनी मौजूदगी मेरे जेहन में दर्ज करती हो..??



Yoga for digestive system