शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

संस्मरण..आखिर क्यों..??

कुछ घटना,कुछ वाकया मन मष्तिष्क पर छाप छोड़ देती है..
और सोचने को मजबूर कर देती है..।
आज शाम 3 दृश्य ने सोचने को मजबूर कर दिया..।

पहला दृश्य..
समुंद्र के किनारे टहलते टहलते मैं आखरी छोर तक चला गया जंहा कोई नही था बिल्कुल शांति थी..।मेरी नजर उन दो कुत्तों पे पड़ी जो समुंद्र के लहर से 10-11 फ़ीट की दूरी पर पाँव से गड्ढे खोद रहे थे..मुझे लगा मस्ती कर रहे है..।मगर जब करीब गया तो देखा कि ये दोनों कुते गड्ढे खोदने के बाद रेत से रिस कर आ रहे पानी का भरने का इंतजार करते है,जब पानी भर जाता है तब वो उसे पी लेते है..फिर इंतजार करते है,और फिर पीते है..।
मुझे दो चीज सोचने को विवश किया..
1.क्या समुंद्र का पानी इसे नुकसान नही करेगा..??
 मैंने झट से गूगल किया तो पता चला हरेक जानवर को समुंद्र का पानी नुकसान पहुचायेगा.. हो सकता है ये सब अपने आप को उसके अनुरूप ढाल लिया हो..।
2.इन्हें पानी फ़िल्टर कर पीने को किसने सिखाया..??
ये एक तरह से गड्ढा खोदकर पानी को फ़िल्टर ही तो कर रहें थे..।


दूसरा दृश्य..
समुंद्र के किनारे ही एक अकेली महिला थी..जो अपने में खुश थी मगर उसकी खुशी उसकी विक्षिप्त अवस्था को दर्शा रही थी..वो महिला अचानक मुझसे कही जरा मेरा वीडियो बना देंगे..मैंने कहा हां..तो उन्होंने अपना मोबाइल मेरे हाथ मे थमा कर बोली आप सिर्फ इसे पकड़े रहिये..।
थोड़ा इधर थोड़ा उधर थोड़ा ऊपर थोड़ा नीचे के बाद आखिर मोबाइल एडजस्ट हो गया..मन हो रहा था छोड़ के भाग जाऊ..
मगर इसके बाद जो हुआ वो सोचने को विवश कर दिया..
वो बनावटी मुस्कान के साथ बोलती है,
हाइ गाइज.. 
मैं रोज बिच पे आती हूँ, मेरा वजन कम हो रहा है..
मैं यंहा हीरोइन बनने आई थी आज कुछ भी नही बन पाई..
ये दरिंदो से भरा हुआ जगह है..
सब साले इस्तेमाल करेंगे..
इसलिय अपना स्वास्थ्य का ख्याल रखें और आपलोग गाँव मे ही रहें, अच्छे से रहें..।
उसके बाद उन्होंने कहा मेरा एक फोटो खींच दीजियेगा..मैंने 3-4 क्लिक करके वंहा से निकल गया..।
मगर उसका चेहरा और बातें अभी भी दिमाग मे चल रहा है..।

तीसरा दृश्य..
एक छोटा बच्चा लगभग 3 साल का रहा होगा..
वो माँ की अंगुली पकड़ कर जा रहा था कि उसकी एक चप्पल पाँव से निकल कर पीछे छूट जाता है..
जबतक वो माँ को बोलता तबतक वो कई कदम आगे बढ़ गया था..।
क्योंकि वो छोटा बच्चा अपने उम्र के अनुसार नही चल रहा था,बल्कि उसकी माँ अपने उम्र के अनुसार चला रही थी..।
जबतक बच्चा शब्दों का चयन कर वाक्य बनाता और माँ को कहता कि मेरा एक चप्पल पाँव से निकल गया है..तबतक वो कई कदम आगे बढ़ गया था..
माँ के कानों में ये शब्द जाते ही माँ ने एक थप्पड़ जड़ दिया..।
मैं ये दृश्य देखकर आवाक रह गया..??


एक तो माँ अपने स्पीड से बच्चें को चला रही थी,..
दूसरे में, माँ को बच्चे के चाल में बदलाव का महसूस नही हुआ..।
मैं इसी उधेड़बुन में हूँ...
कभी-कभी दूसरों की लापरवाही के वजह से किसी और को सजा भुगतना पड़ता है..।।

ये 3 दृश्य ने सोचने को मजबूर कर दिया..
● कुत्ते को पानी फ़िल्टर कर पीने को किसने सिखाया..??
●उस महिला के साथ क्या हुआ होगा..??
●आखिर हम बच्चों पर हाथ क्यों उठाते है..??
आखिर क्यों..??

बुधवार, 7 जनवरी 2026

प्यार की पांति..कभी-कभी

कभी-कभी तुम भी कुछ लिखा करो..

कभी-कभी तुम भी कुछ कहा करो..।

मैं ही कबतक अकेले लिखता रहूंगा..

मैं ही अकेले कबतक बकता रहूंगा..।

कभी-कभी तुम भी कुछ लिखा करो..

कभी-कभी तुम भी कुछ कहा करो..।


जानता हूँ..मैं भी..

जानती हो..तुम भी..

हमदोनों के बीच की दूरियों को..

और..

हमदोनों के बीच के खाइयों को..।

कभी-कभी हमदोनों मिलकर दूरियां मिटाये...

कभी-कभी हमदोनों मिलकर खाइयों के गहराइयों का पता लगाएं..

कभी-कभी..तुम भी कुछ लिखा करो..

कभी-कभी तुम भी कुछ कहा करो..।।


यू मुँह मोड़ने से क्या होगा..

यू चुप रहने से क्या होगा..

जबतक नजरें मिलाओगे नहीं..

जबतक चुपिया तोड़ोगे नही..

तुम्हीं बताओ मैं कैसे समझ पाऊंगा..।

कभी-कभी तुम भी कुछ लिखा करो..

कभी-कभी तुम भी कुछ कहा करो..।


माना कि आता नही..

मुझे प्यार जताना..

तुम्हीं सिखाओ..

तुम्ही बताओ..

की कैसे जताए..

की कैसे बताये..।

कभी-कभी तुम भी कुछ लिखा करो..

कभी-कभी तुम भी कुछ कहा करो..।


उम्मीद..

जब तुमसे कोई उम्मीद न करें,

तो तुम खुद से ही उम्मीद करना..।

क्योंकि ये उम्मीद ही तो है..

जो जीने का मार्ग प्रशस्त करती है..।।

चाहे कितनी भी परेशानियां जीवन मे क्यों न आये,

ये उम्मीद ही तो है,

जो हर परेशानियों से निकलने का हिम्मत देता है..।


जब तुमसे कोई उम्मीद न करें..

तो तुम खुद से ही उम्मीद करना..।।



शहर

ये शहर भी,
कभी खुशनुमा था...
जंहा हमेशा,
रहा करता था...
चहल-पहल..।
ये शहर कुछ इस तरह बढ़ता गया..
और सबको अपने आगोश में लेता गया..।
जो भी इसके रुकावट में आया..
सबके सब इसमें समाया..।
न जंगल बचा, 
ना जंगल में रहने वाले बचे..।
न नदियां बची....
न पर्वत,पठारें बचा..।
कुछ इस कदर शहर सबको निगलता गया..कि
समुंद्र को भी निगलने का दुःसाहस कर गया..।
न जाने फिर क्या हुआ..??
समुन्द्र की लहरों ने ही..
शहर को निगल लिया..।
ये शहर भी,
कभी खुशनुमा था..।।



शहर..

इस शहर में भी कई शहर है..
और हरेक शहर की अपनी सरगुज़श्त है..।
कंहा से इस शहर का कारवां शुरू हुआ था..
और अब, कंहा जा रहा है..??
इस शहर ने पहले जंगलों को फ़ना किया..
फिर पर्वत,पठार,नदी और तालाब को..।

कभी इन पर्वत,पठारों को नीचे से देखा करता था..
आज इन पर्वतों पठारों को तोड़ कर,
बनाई हुई मीनारों से...
ऊपर से इन्हें देखता हूँ..।


इस शहर में भी कई शहर है..
और हरेक शहर की अपनी सरगुज़श्त है..।

कभी नदियों और तालाबों में सब नहाया करते थे..
मगर इस शहर ने नदी और तालाब को लील कर,
उसके ऊपर आलीशान आशियाना बनाया..
और फिर उसके ऊपर कुछ लोगों के लिए स्विमिंग पूल बनाया..।

इस शहर में भी कई शहर है..
और हरेक शहर की अपनी सरगुज़श्त है..।

कभी सुबह होते ही चिड़ियों के चहचहाटों से आंखें खुलती थी..
अगर उससे भी आंखें न खुली,
तो सूर्य की लालिमा होले से गालों को सहलाकर उठाती थी..।
मगर अब चिड़ियों की बसाहटों के जगह,बड़ी-बड़ी मीनार ने ले ली..
और इस मीनार ने सूर्य की लालिमा को लील ली..।।

इस शहर में भी कई शहर है..
और हरेक शहर की अपनी सरगुज़श्त है..।

कभी अंधेरी रातों में,
जुगनुओं की रोशनी और झींगुरों की संगीत सुनाई दिया करता था..
और आसमां से चांद-तारों की रोशनी..
छन-छन कर जिंदगी को राह दिखाया करता था..।
मगर आज न जुगनू है..
न झींगुर है..
और न ही चांद तारों की रोशनी..
मगर तब भी घर मे इतना उज्याला है..
की रात का अहसास होता ही नही..??

इस शहर में भी कई शहर है..
और हरेक शहर की अपनी सरगुज़श्त है..।

कभी खुली हवा में सांस लिया करता था..
मगर आज..
मास्क लगा कर सांस लेने को मजबूर हूँ..
कभी इन स्वछ हवाओं के लिए बड़े-बड़े पेड़ हुआ करते थे..
मगर आज इन हवाओं को साफ करने के लिए..
बड़े-बड़े प्यूरीफायर है..।


इस शहर में भी कई शहर है..
और हरेक शहर की अपनी सरगुज़श्त है..।



सोमवार, 5 जनवरी 2026

सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनी के आक्रमण के 1000 वर्ष

आपके जीवन में मंदिर का क्या महत्व है..??
सब के लिए अलग-अलग महत्व होगा..??
दरसल हम इस पर ध्यान ही नही देते..मंदिर ही तो है..ये सोच के इग्नोर कर देते है..।

आपने कभी अहसास किया है कभी घर से दूर अगर सुकून का अहसास होता है तो वो मंदिर में ही होता है..और कंही नही,जिस तरह हम घर में आराम से बैठ सकते है लेटने के जगह पर लेट सकते है,उसी तरह आप बिना किसी भय और डर के साथ मंदिर में लेट और बैठ सकते है..।
आपको तबतक कोई नही भगाएगा या कुछ कहेगा जबतक की आपके कारण किसी को परेशानी ना हो..।

भारत में मंदिर कभी आर्थिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था,यात्रियों का रैनबसेरा हुआ करता था,कला और संस्कृति का समागम हुआ करता था,या फिर उस क्षेत्र के राजाओं का पहचान हुआ करता था..।
हरेक राजा अपने जीवनकाल में एक मंदिर बनाना चाहता था,जिससे उसकी पहचान युगों-युगों तक रहें..वो आज भी कमोबेश देखने को मिल जाता है.।

आज ढेर सारे राजाओं या राजवंश को हम इसलिए जानते है कि उन्होंने मंदिर बनाया,चाहे गुप्तवंश हो,चोलवंश हो,चंदेल वंश हो या काकतीय,या फिर चालुक्य ये सब आज भी अपने मंदिर के कारण जाने जाते है..।

उन्ही मंदिर में से एक ऐसा मंदिर है जिसे कई बार विध्वंश किया गया मगर हर बार वो पहले से ज्यादा मजबूती से फिर से खड़ा हो गया..
वो मंदिर कोई और नही बल्कि सोमनाथ मंदिर है..।
●आज ही के दिन 6 जनुअरी 1026 को महमूद गजनी ने मंदिर पर पूर्ण कब्जा करके लूटना शुरू किया था..मंदिर में इतना कत्लेआम किया गया और इतना विध्वंश किया गया कि शब्दो मे बयां नही किया जा सकता है..
- 50 हज़ार से ज्यादा हिंदू योद्धाओं और श्रद्धालु मारे गए..

-ऐतिहासिक दस्तावेज 'तारीख़-ए-फरिश्ता' के अनुसार 20 लाख दीनार से भी अधिक रकम की सोना, चांदी और कीमती रत्न लूट कर ले गया

-इसका आक्रमण का वर्णन अल-बरुनी की पुस्तक 'किताब-उल-हिंद' में मिलता है..।


सोमनाथ मंदिर का पहली बार निर्माण कब और किसने किया..इसका कोई साक्ष्य नही है..


मगर पौराणिक मान्यता के अनुसार-
इसका निर्माण सतयुग में चंद्रदेव ने सोने से किया..
- त्रेतायुग में रावण ने चांदी से..
- द्वापर युग मे कृष्ण ने चंदन की लकड़ी से और
- कलयुग में भीमदेव सोलंकी ने पत्थर से..

इसका प्रथम एतिहासिक साक्ष्य कालिदास के रघुवंशम में मिलता है,जिसमे वो सोमनाथ प्रभास का जिक्र करते है(मंदिर का नही)
ये एक त्रिवेणी संगम के कारण भी बहुत महत्वपूर्ण है..यंहा हिरणा, कपिला और सरस्वती नदी का संगम होता है..जिस कारण भी इसका धार्मिक महत्व है..।।

सोमनाथ मंदिर द्वादश ज्योतिर्लिंग में से प्रथम है..।
इसीलिए भी इसका महत्व सर्वाधिक है..।

इस मंदिर पर सर्वाधिक बार आक्रमण क्यों किया गया...??
इसका सबसे बड़ा कारण इसका भौगालिक अविस्थिति है...ये जिस जगह पर स्थित है,वो जगह कभी बंदरगाह हुआ करता था,और वंहा से व्यापारिक गतिविधियां दूर-दराज तक होता था,इस तरह से ये मंदिर की ख्यातियां भी व्यापारियों के द्वारा दूर तक पहुंचती गई..।
अभी भी भारत के जितने भी प्राचीन मंदिर है,वो कभी व्यापारिक गतिविधियों के कारण जाने जाते थे..उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक और पूर्वी भारत से लेकर पश्चिम भारत तक आपको आज भी महत्वपूर्ण मंदिर मिल जाएंगे..।

सोमनाथ मंदिर पर सर्वाधिक आक्रमण इसलिए हुए क्योंकि ये समुंद्र के किनारे था इसलिए ये किसी भी बाहय आक्रांता का प्रथम शिकार बनता..और उसे उतनी धन दौलत वंही से मिल जाती की वो भारत के अंदर नही आता..।
(•सोचने वाली बात ये है कि क्या इसमें भारतीय राजाओं की कोई रणनीति थी,जबतक यंहा बाह्य आक्रान्ता कोई लूटपाट मचाये तबतक उनसे लड़ने के लिए इन्हें पूरा समय मिल जाता था,और वो लुटेरे वंही से चला जाता हो,अंदर न घुसता हो..??•या फिर मंदिर के तहत उस क्षेत्र का नेतृत्व किया जा रहा था, क्योंकि जो भी साक्ष्य रहे होंगे वो सब ध्वस्त हो गए होंगे..इतिहासकार को इस नजरिए से भी सोचना चाहिए)

मगर ये लूटपाट का सिलसिला यंही नही रुका इतिहासकारों के अनुसार 17 बार बड़े आक्रमण हुए जिसमें से 7 ऐसे आक्रमण थे जिसमें मंदिर को पूर्ण ध्वस्त कर दिया गया..।

प्रथम आक्रमण 725 ईसवी में सिंध के अरब गवर्नर अल जुनैद ने किया..
ये शुरुआती हमलों में एक था..इसके द्वारा विध्वंस करने के बाद...
815 ईसवी में इसका पुनर्निर्माण प्रतिहार राजा नागभट्ट-।। ने किया..।

महमूद गजनवी ने 1026 में मंदिर से अकूत संपत्ति लूटी और मंदिर के साथ शिवलिंग को भी खंडित कर दिया,साथ ही उसने 50000 से ज्यादा निर्दोष श्रद्धालुओं को मंदिर के रक्षा करने के क्रम में मारा डाला..।

1299 ईसवी में अल्लाउद्दीन ख़िलजी ने मंदिर को लूटा और मूर्तियों को तोड़ा..

1395 में जफर खान(बाद में गुजरात सल्तनत की स्थापना) ने मंदिर को लूटा और उसे अपवित्र कर दिया..

1451 में गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा ने मंदिर पर हमला किया और मंदिर को अपवित्र किया और पूजा करने से रोकने की कोशिश की..।

1520 में मुजफ्फरशाह द्वितीय ने पुर्तगालियों और स्थानीय लोगो के साथ मंदिर को भी नुकसान पहुँचाया..।

1665 और 1706 में औरंगजेब ने दो बार नष्ट करने का आदेश दिया...
- 1665 में उसने मंदिर को तोड़ने का आदेश दिया..
- 1706 में आदेश दिया कि ऐसे ध्वस्त किया जाय कि, वंहा पूजा न किया जा सके और उनके जगह मस्जिद नुमा ढांचा खड़ा कर दिया जाय..


1783 में रानी अहिल्याबाई ने पुराने मंदिर के पास एक नया मंदिर बनवाया..।



इस मंदिर में कुछ तो बात थी..जितने बार ध्वस्त किया जाता ये फिर से खड़ा हो जाता..इसका भी सबसे बड़ा कारण भौगोलिक स्थिति थी..व्यापारियों के कारण आय की कमी नही होती थी जिस कारण चंदा एकत्रित करके फिर से इस मंदिर का पुनर्निर्माण कर दिया जाता होगा..।
इसलिय इस मंदिर को "शाश्वत तीर्थ" भी कहते है..।
वर्तमान में जो मंदिर है उसका नींव सरदार पटेल ने जूनागढ़ यात्रा के दौरान 13 नवंबर 1947 को समुंद्र जल हाथ मे लेकर पुनर्निर्माण का संकल्प लिया..
इसमें भी कम अड़चने नही थी..नेहरू नही चाहते थे कि,इस समय मंदिर बनाया जाए.. गांधीजी ने बीच का रास्ता निकाला और सुझाव दिया की मंदिर सार्वजनिक फंड से न बनाकर चंदा एकत्रित करके बनाया जाए..
पटेल जी के बीच मे ही देहांत होने के बाद सारा दारोमदार K.M.मुंशी जी ने अपने हाथ मे ले लिया..
और नेहरू जी के आपत्ति जताने के बावजूद डॉ राजेन्द्र प्रसाद 11 मई 1951 को मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा की..।और कहा-
"सोमनाथ का मंदिर इस बात का प्रतीक है कि निर्माण की शक्ति विनाश की शक्ति से कंही अधिक प्रबल होती है..।"

आज भी सोमनाथ का ध्वज हवा में लहरा के ये संदेश दे रहा है की..
दरसल संदेश गोपनीय है...😀

"सौराष्ट्रदेशे विशदेsतिरमये ज्योर्तिमय चंद्रकलावत्सम।
 उज्जयिन्याम महाकालमोक्षकारममलेश्वरं।।


शनिवार, 3 जनवरी 2026

क्या आप भारत की पहली महिला शिक्षिका को जानते है..

"यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रेतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलः क्रियाः ।।"
                                                      (मनुस्मृति)
"जंहा स्त्रियों का सम्मान और पूजन होता है,वंहा देवता प्रसन्न होकर निवास करते है।जंहा उनका सम्मान नही होता,वंहा किये गए सभी कर्म और यज्ञ निष्फल हो जाते है..।"


मगर ऐसा क्या हुआ कि जिन माता-बहनों का हमारे जीवन में उच्च स्थान था, उनकी स्थिति दयनीय हो गई..??
उनकी दयनीय स्थिति के बारे में आपको पढ़ने को मिल जाएगा मगर उनकी दयनीय स्थिति क्यों हुई..इसके बारे में सब मौन है.. क्यों..??

जो महिलाएं कभी वेद की ऋचाएं लिखा करती थी..अपने पति के साथ युद्धभूमि में जाया करती थी,शंकराचार्य से शाश्त्रार्थ किया करती है..अपना वर स्वयं चुनती थी और पुरुष के साथ कदम से कदम मिला के चलती थी..
अचानक उनकी स्थिति दयनीय कैसे हो गई..??

कभी सोचा है..आखिर ऐसा क्या हुआ..की हमारी महिलाएं घर में ही सिमट के रह गई, उन्हें अपना सारा अधिकार खोना पड़ा..यौवन(puberty) आने से पहले ही शादी कर दिया जाने लगा,पति के मृत्यु के बाद सती होना पड़ा,या फिर अपना बाल मुड़वा कर जिंदगी को नीरस कर लेना पड़ा,शिक्षा को त्यागना पड़ा,घर मे रहकर भी कैद सा अनुभव करते रहना,अपना स्वतंत्रता खोना पड़ा..
आखिर क्यों..??
इस क्यों का जबाब कोई नही देता..क्यों??

1200 ईसवी तक आपको ये देखने को नही मिलेगा..(अपवाद हो सकते है)मगर इसके बाद ऐसा क्या हुआ..की भारतीय महिलाओं की स्थिति दयनीय हो गई..??
क्योंकि 1200 ईसवी के बाद मुस्लिम आक्रांता का भारत पे शासन शुरू हो गया..ये इतने हवसी और हिंसक थे कि शब्द लिखते भी गुस्सा आता है..।
इनके लिए स्त्रियां मांस का लोथड़ा होता था,ये गिद्ध की तरह टूट पड़ते थे, जिस तरह गिद्ध मांस के लोथड़े के साथ व्यवहार करते थे इसी तरह ये मुस्लिम आक्रान्ता भारतीय स्त्रियों के साथ व्यवहार करते थे..।।

तब आप ही बताये..एक भारतीय पुरुष अपने स्त्रियों की रक्षा के लिए क्या करता..क्योंकि हम उनके तरह हिंसक नही थे..वो जंगल से आये जंगली थे,जिन्हें सिर्फ यही आता था..और हम अहिंसा और अतिथि देवों भवः का पाठ करते थे..।जंहा तक हो सका हम लड़े, अगर नही लड़े तो मरे,समझौता किया मगर घुटना नही टेका..।

इतिहास गवाह है..
जंहा भी ये मुस्लिम आक्रांता गए उस क्षेत्र को तहस नहस करके मुस्लिम बहुल देश बना दिया..(आज भी मुस्लिम देश की महिलाएं अपने मूलभूत सुविधाओं से वंचित है) ।
और जंहा ईसाइ गये उस क्षेत्र को पूर्णतया ईसाई बहुल बना दिया..हम भारतीयों ने इन दोनों का सामना किया और अपने सनातन धर्म को बचाया..मगर इसमें हमारी माताओं और बहनों का अहम योगदान है..उन्होंने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया..अपनी पहचान तक भी..।।

मगर आधुनिक भारत में पहली बार एक महिला का उदय हुआ जिसने महिलाओं के बेड़ियों पे प्रहार करके बेड़िया को तोड़ दिया..
वो थी, आधुनिक भारत की पहली महिला शिक्षिका "सावित्रीबाई फुले"

इनका जन्म आज ही के दिन 3जनुअरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में हुआ था..।
1840 में 9वर्ष की आयु में इनका विवाह ज्योतिराव फुले से हो जाता है..।वो अनपढ़ थी मगर ज्योतिबा ने उन्हें पढ़ाया,फिर आगे चलकर सावित्रीबाई ने अहमदनगर और पुणे में शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थान से औपचारिक शिक्षा ली..
और 1 जनुअरी 1848 को पुणे के भिंडवाड़ा में भारत का पहला लड़कियों का स्कूल खोला और वंहा की अध्यापिका बनी..।।

इन्होंने ढेर सारे कुरीतियों पे प्रहार किया..
1860 में नाइयों का हड़ताल करवाया..जिससे विधवा महिलाओं का सिर न मुंडवाया जाए।
बालहत्या प्रतिबंधक गृह- विधवाओं के शोषण के कारण होने वाले अवैध गर्भधारण और समाज के डर से होने वाले भ्रूण हत्या को रोकने के लिए अपने ही घर मे 'बालहत्या प्रतिबंधक गृह' शुरू किया।एक ब्राह्मण विधवा के पुत्र(यशवंत राव)को गोद लेकर डॉक्टर बनाया।
अछूतों के लिए घर मे ही पानी के लिए कुआं खोद दिया..।
(ये अछूत शब्द आया कंहा से..12वी शताब्दी तक ये शब्द अस्तित्व में नही था..)
सत्यशोधक विवाह-बिना पुरोहित के शादी करवाना शुरू किया,जिसमें स्त्री-पुरुष के समानता का वचन दिलवाया जाता था।(आज भी महाराष्ट्र की महिलाएं पर इनका गहरा असर है।)
अकाल में सेवा- 1876 और 1879 के अकाल के दौरान 52 मुफ्त भोजन केंद्र चलाये।
अपनी पति की चिता की मुखाग्नि स्वयं दी,उस समय ये कल्पना से परे था,की कोई महिला चिता को मुखाग्नि दे।

सावित्रीबाई फुले ने मातृसत्तात्मक से पितृसत्तात्मक हो चुके समाज को चुनौती दी..और भारत की महिलाओं के लिए एक रास्ता बनाया जिसपर चलकर आज हमारी माताएं एवं बहनें हरेक क्षेत्र में भारत का झंडा बुलंद कर रही है..।
चाहे आसमां का सीना चीरना हो,या सागर की गहराइयां नापना हो,या पहाड़ की चोटी को नापना हो,या फिर युद्ध के मैदान में दुश्मन को ललकारना हो,या फिर भारत की बागडोर संभालना हो या फिर घर की ही बागडोर संभालना हो..वो हरेक चीज में महारथ है..।।

जरा सोचिए अगर वो न होती तो क्या होता..??
अफसोस हम सोचते ही नही..😊

सावित्रीबाई फुले वो लाइटहाउस है जो अभी भी भारतीय महिला को रास्ता दिखा रही है..वो तबतक दिखाती रहेंगी जबतक हमारी माताओं और बहनों को घर मे न पूजा जाएं..
(यंहा पूजने से तातपर्य उनके आदर करने से है..)
सबके खाने के बाद वो खाती है,
सबके सोने के बाद वो सोती है..
ढेर सारे तकलीफ को छुपाकर,
अकेले में अश्रु बहाती है..।
आखिर वो ऐसा क्यों करती है..??
ये दायित्व हम पुरुषों पर है..
उन्हें इन बंधनों से मुक्त कर 
उन्हें स्वतंत्र करने का..।
अब वो स्वतंत्र हो रही है..
क्योंकि वो शिक्षित हो रही है,
क्योंकि वो आर्थिक रूप से संपन्न हो रही है..
मगर अब भी वो अश्रु क्यों बहाती है..?
शायद वो हमारे कारण ही बहाती है..
उनके अश्रु पोंछने का दायित्व अब हम ज्योतिबा पर है..
तब ही सावित्रीबाई फुले को याद करने के मायने होंगे।।