और हरेक शहर की अपनी सरगुज़श्त है..।
कंहा से इस शहर का कारवां शुरू हुआ था..
और अब, कंहा जा रहा है..??
इस शहर ने पहले जंगलों को फ़ना किया..
फिर पर्वत,पठार,नदी और तालाब को..।
कभी इन पर्वत,पठारों को नीचे से देखा करता था..
आज इन पर्वतों पठारों को तोड़ कर,
बनाई हुई मीनारों से...
ऊपर से इन्हें देखता हूँ..।
इस शहर में भी कई शहर है..
और हरेक शहर की अपनी सरगुज़श्त है..।
कभी नदियों और तालाबों में सब नहाया करते थे..
मगर इस शहर ने नदी और तालाब को लील कर,
उसके ऊपर आलीशान आशियाना बनाया..
और फिर उसके ऊपर कुछ लोगों के लिए स्विमिंग पूल बनाया..।
इस शहर में भी कई शहर है..
और हरेक शहर की अपनी सरगुज़श्त है..।
कभी सुबह होते ही चिड़ियों के चहचहाटों से आंखें खुलती थी..
अगर उससे भी आंखें न खुली,
तो सूर्य की लालिमा होले से गालों को सहलाकर उठाती थी..।
मगर अब चिड़ियों की बसाहटों के जगह,बड़ी-बड़ी मीनार ने ले ली..
और इस मीनार ने सूर्य की लालिमा को लील ली..।।
इस शहर में भी कई शहर है..
और हरेक शहर की अपनी सरगुज़श्त है..।
कभी अंधेरी रातों में,
जुगनुओं की रोशनी और झींगुरों की संगीत सुनाई दिया करता था..
और आसमां से चांद-तारों की रोशनी..
छन-छन कर जिंदगी को राह दिखाया करता था..।
मगर आज न जुगनू है..
न झींगुर है..
और न ही चांद तारों की रोशनी..
मगर तब भी घर मे इतना उज्याला है..
की रात का अहसास होता ही नही..??
इस शहर में भी कई शहर है..
और हरेक शहर की अपनी सरगुज़श्त है..।
कभी खुली हवा में सांस लिया करता था..
मगर आज..
मास्क लगा कर सांस लेने को मजबूर हूँ..
कभी इन स्वछ हवाओं के लिए बड़े-बड़े पेड़ हुआ करते थे..
मगर आज इन हवाओं को साफ करने के लिए..
बड़े-बड़े प्यूरीफायर है..।
इस शहर में भी कई शहर है..
और हरेक शहर की अपनी सरगुज़श्त है..।

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