"यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रेतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलः क्रियाः ।।"
(मनुस्मृति)
"जंहा स्त्रियों का सम्मान और पूजन होता है,वंहा देवता प्रसन्न होकर निवास करते है।जंहा उनका सम्मान नही होता,वंहा किये गए सभी कर्म और यज्ञ निष्फल हो जाते है..।"
मगर ऐसा क्या हुआ कि जिन माता-बहनों का हमारे जीवन में उच्च स्थान था, उनकी स्थिति दयनीय हो गई..??
उनकी दयनीय स्थिति के बारे में आपको पढ़ने को मिल जाएगा मगर उनकी दयनीय स्थिति क्यों हुई..इसके बारे में सब मौन है.. क्यों..??
जो महिलाएं कभी वेद की ऋचाएं लिखा करती थी..अपने पति के साथ युद्धभूमि में जाया करती थी,शंकराचार्य से शाश्त्रार्थ किया करती है..अपना वर स्वयं चुनती थी और पुरुष के साथ कदम से कदम मिला के चलती थी..
अचानक उनकी स्थिति दयनीय कैसे हो गई..??
कभी सोचा है..आखिर ऐसा क्या हुआ..की हमारी महिलाएं घर में ही सिमट के रह गई, उन्हें अपना सारा अधिकार खोना पड़ा..यौवन(puberty) आने से पहले ही शादी कर दिया जाने लगा,पति के मृत्यु के बाद सती होना पड़ा,या फिर अपना बाल मुड़वा कर जिंदगी को नीरस कर लेना पड़ा,शिक्षा को त्यागना पड़ा,घर मे रहकर भी कैद सा अनुभव करते रहना,अपना स्वतंत्रता खोना पड़ा..
आखिर क्यों..??
इस क्यों का जबाब कोई नही देता..क्यों??
1200 ईसवी तक आपको ये देखने को नही मिलेगा..(अपवाद हो सकते है)मगर इसके बाद ऐसा क्या हुआ..की भारतीय महिलाओं की स्थिति दयनीय हो गई..??
क्योंकि 1200 ईसवी के बाद मुस्लिम आक्रांता का भारत पे शासन शुरू हो गया..ये इतने हवसी और हिंसक थे कि शब्द लिखते भी गुस्सा आता है..।
इनके लिए स्त्रियां मांस का लोथड़ा होता था,ये गिद्ध की तरह टूट पड़ते थे, जिस तरह गिद्ध मांस के लोथड़े के साथ व्यवहार करते थे इसी तरह ये मुस्लिम आक्रान्ता भारतीय स्त्रियों के साथ व्यवहार करते थे..।।
तब आप ही बताये..एक भारतीय पुरुष अपने स्त्रियों की रक्षा के लिए क्या करता..क्योंकि हम उनके तरह हिंसक नही थे..वो जंगल से आये जंगली थे,जिन्हें सिर्फ यही आता था..और हम अहिंसा और अतिथि देवों भवः का पाठ करते थे..।जंहा तक हो सका हम लड़े, अगर नही लड़े तो मरे,समझौता किया मगर घुटना नही टेका..।
इतिहास गवाह है..
जंहा भी ये मुस्लिम आक्रांता गए उस क्षेत्र को तहस नहस करके मुस्लिम बहुल देश बना दिया..(आज भी मुस्लिम देश की महिलाएं अपने मूलभूत सुविधाओं से वंचित है) ।
और जंहा ईसाइ गये उस क्षेत्र को पूर्णतया ईसाई बहुल बना दिया..हम भारतीयों ने इन दोनों का सामना किया और अपने सनातन धर्म को बचाया..मगर इसमें हमारी माताओं और बहनों का अहम योगदान है..उन्होंने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया..अपनी पहचान तक भी..।।
मगर आधुनिक भारत में पहली बार एक महिला का उदय हुआ जिसने महिलाओं के बेड़ियों पे प्रहार करके बेड़िया को तोड़ दिया..
वो थी, आधुनिक भारत की पहली महिला शिक्षिका "सावित्रीबाई फुले"
इनका जन्म आज ही के दिन 3जनुअरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में हुआ था..।
1840 में 9वर्ष की आयु में इनका विवाह ज्योतिराव फुले से हो जाता है..।वो अनपढ़ थी मगर ज्योतिबा ने उन्हें पढ़ाया,फिर आगे चलकर सावित्रीबाई ने अहमदनगर और पुणे में शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थान से औपचारिक शिक्षा ली..
और 1 जनुअरी 1848 को पुणे के भिंडवाड़ा में भारत का पहला लड़कियों का स्कूल खोला और वंहा की अध्यापिका बनी..।।
इन्होंने ढेर सारे कुरीतियों पे प्रहार किया..
●1860 में नाइयों का हड़ताल करवाया..जिससे विधवा महिलाओं का सिर न मुंडवाया जाए।
●बालहत्या प्रतिबंधक गृह- विधवाओं के शोषण के कारण होने वाले अवैध गर्भधारण और समाज के डर से होने वाले भ्रूण हत्या को रोकने के लिए अपने ही घर मे 'बालहत्या प्रतिबंधक गृह' शुरू किया।एक ब्राह्मण विधवा के पुत्र(यशवंत राव)को गोद लेकर डॉक्टर बनाया।
●अछूतों के लिए घर मे ही पानी के लिए कुआं खोद दिया..।
(ये अछूत शब्द आया कंहा से..12वी शताब्दी तक ये शब्द अस्तित्व में नही था..)
● सत्यशोधक विवाह-बिना पुरोहित के शादी करवाना शुरू किया,जिसमें स्त्री-पुरुष के समानता का वचन दिलवाया जाता था।(आज भी महाराष्ट्र की महिलाएं पर इनका गहरा असर है।)
●अकाल में सेवा- 1876 और 1879 के अकाल के दौरान 52 मुफ्त भोजन केंद्र चलाये।
●अपनी पति की चिता की मुखाग्नि स्वयं दी,उस समय ये कल्पना से परे था,की कोई महिला चिता को मुखाग्नि दे।
सावित्रीबाई फुले ने मातृसत्तात्मक से पितृसत्तात्मक हो चुके समाज को चुनौती दी..और भारत की महिलाओं के लिए एक रास्ता बनाया जिसपर चलकर आज हमारी माताएं एवं बहनें हरेक क्षेत्र में भारत का झंडा बुलंद कर रही है..।
चाहे आसमां का सीना चीरना हो,या सागर की गहराइयां नापना हो,या पहाड़ की चोटी को नापना हो,या फिर युद्ध के मैदान में दुश्मन को ललकारना हो,या फिर भारत की बागडोर संभालना हो या फिर घर की ही बागडोर संभालना हो..वो हरेक चीज में महारथ है..।।
जरा सोचिए अगर वो न होती तो क्या होता..??
अफसोस हम सोचते ही नही..😊
सावित्रीबाई फुले वो लाइटहाउस है जो अभी भी भारतीय महिला को रास्ता दिखा रही है..वो तबतक दिखाती रहेंगी जबतक हमारी माताओं और बहनों को घर मे न पूजा जाएं..
(यंहा पूजने से तातपर्य उनके आदर करने से है..)
सबके खाने के बाद वो खाती है,
सबके सोने के बाद वो सोती है..
ढेर सारे तकलीफ को छुपाकर,
अकेले में अश्रु बहाती है..।
आखिर वो ऐसा क्यों करती है..??
ये दायित्व हम पुरुषों पर है..
उन्हें इन बंधनों से मुक्त कर
उन्हें स्वतंत्र करने का..।
अब वो स्वतंत्र हो रही है..
क्योंकि वो शिक्षित हो रही है,
क्योंकि वो आर्थिक रूप से संपन्न हो रही है..
मगर अब भी वो अश्रु क्यों बहाती है..?
शायद वो हमारे कारण ही बहाती है..
उनके अश्रु पोंछने का दायित्व अब हम ज्योतिबा पर है..
तब ही सावित्रीबाई फुले को याद करने के मायने होंगे।।



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