सब के लिए अलग-अलग महत्व होगा..??
दरसल हम इस पर ध्यान ही नही देते..मंदिर ही तो है..ये सोच के इग्नोर कर देते है..।
आपने कभी अहसास किया है कभी घर से दूर अगर सुकून का अहसास होता है तो वो मंदिर में ही होता है..और कंही नही,जिस तरह हम घर में आराम से बैठ सकते है लेटने के जगह पर लेट सकते है,उसी तरह आप बिना किसी भय और डर के साथ मंदिर में लेट और बैठ सकते है..।
आपको तबतक कोई नही भगाएगा या कुछ कहेगा जबतक की आपके कारण किसी को परेशानी ना हो..।
भारत में मंदिर कभी आर्थिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था,यात्रियों का रैनबसेरा हुआ करता था,कला और संस्कृति का समागम हुआ करता था,या फिर उस क्षेत्र के राजाओं का पहचान हुआ करता था..।
हरेक राजा अपने जीवनकाल में एक मंदिर बनाना चाहता था,जिससे उसकी पहचान युगों-युगों तक रहें..वो आज भी कमोबेश देखने को मिल जाता है.।
आज ढेर सारे राजाओं या राजवंश को हम इसलिए जानते है कि उन्होंने मंदिर बनाया,चाहे गुप्तवंश हो,चोलवंश हो,चंदेल वंश हो या काकतीय,या फिर चालुक्य ये सब आज भी अपने मंदिर के कारण जाने जाते है..।
उन्ही मंदिर में से एक ऐसा मंदिर है जिसे कई बार विध्वंश किया गया मगर हर बार वो पहले से ज्यादा मजबूती से फिर से खड़ा हो गया..
वो मंदिर कोई और नही बल्कि सोमनाथ मंदिर है..।
●आज ही के दिन 6 जनुअरी 1026 को महमूद गजनी ने मंदिर पर पूर्ण कब्जा करके लूटना शुरू किया था..मंदिर में इतना कत्लेआम किया गया और इतना विध्वंश किया गया कि शब्दो मे बयां नही किया जा सकता है..
- 50 हज़ार से ज्यादा हिंदू योद्धाओं और श्रद्धालु मारे गए..
-ऐतिहासिक दस्तावेज 'तारीख़-ए-फरिश्ता' के अनुसार 20 लाख दीनार से भी अधिक रकम की सोना, चांदी और कीमती रत्न लूट कर ले गया।
-इसका आक्रमण का वर्णन अल-बरुनी की पुस्तक 'किताब-उल-हिंद' में मिलता है..।
सोमनाथ मंदिर का पहली बार निर्माण कब और किसने किया..इसका कोई साक्ष्य नही है..।
मगर पौराणिक मान्यता के अनुसार-
इसका निर्माण सतयुग में चंद्रदेव ने सोने से किया..
- त्रेतायुग में रावण ने चांदी से..
- द्वापर युग मे कृष्ण ने चंदन की लकड़ी से और
- कलयुग में भीमदेव सोलंकी ने पत्थर से..।
इसका प्रथम एतिहासिक साक्ष्य कालिदास के रघुवंशम में मिलता है,जिसमे वो सोमनाथ प्रभास का जिक्र करते है(मंदिर का नही)
ये एक त्रिवेणी संगम के कारण भी बहुत महत्वपूर्ण है..यंहा हिरणा, कपिला और सरस्वती नदी का संगम होता है..जिस कारण भी इसका धार्मिक महत्व है..।।
सोमनाथ मंदिर द्वादश ज्योतिर्लिंग में से प्रथम है..।
इसीलिए भी इसका महत्व सर्वाधिक है..।
इस मंदिर पर सर्वाधिक बार आक्रमण क्यों किया गया...??
इसका सबसे बड़ा कारण इसका भौगालिक अविस्थिति है...ये जिस जगह पर स्थित है,वो जगह कभी बंदरगाह हुआ करता था,और वंहा से व्यापारिक गतिविधियां दूर-दराज तक होता था,इस तरह से ये मंदिर की ख्यातियां भी व्यापारियों के द्वारा दूर तक पहुंचती गई..।
अभी भी भारत के जितने भी प्राचीन मंदिर है,वो कभी व्यापारिक गतिविधियों के कारण जाने जाते थे..उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक और पूर्वी भारत से लेकर पश्चिम भारत तक आपको आज भी महत्वपूर्ण मंदिर मिल जाएंगे..।
सोमनाथ मंदिर पर सर्वाधिक आक्रमण इसलिए हुए क्योंकि ये समुंद्र के किनारे था इसलिए ये किसी भी बाहय आक्रांता का प्रथम शिकार बनता..और उसे उतनी धन दौलत वंही से मिल जाती की वो भारत के अंदर नही आता..।
(•सोचने वाली बात ये है कि क्या इसमें भारतीय राजाओं की कोई रणनीति थी,जबतक यंहा बाह्य आक्रान्ता कोई लूटपाट मचाये तबतक उनसे लड़ने के लिए इन्हें पूरा समय मिल जाता था,और वो लुटेरे वंही से चला जाता हो,अंदर न घुसता हो..??•या फिर मंदिर के तहत उस क्षेत्र का नेतृत्व किया जा रहा था, क्योंकि जो भी साक्ष्य रहे होंगे वो सब ध्वस्त हो गए होंगे..इतिहासकार को इस नजरिए से भी सोचना चाहिए)।
मगर ये लूटपाट का सिलसिला यंही नही रुका इतिहासकारों के अनुसार 17 बार बड़े आक्रमण हुए जिसमें से 7 ऐसे आक्रमण थे जिसमें मंदिर को पूर्ण ध्वस्त कर दिया गया..।
•प्रथम आक्रमण 725 ईसवी में सिंध के अरब गवर्नर अल जुनैद ने किया..
ये शुरुआती हमलों में एक था..इसके द्वारा विध्वंस करने के बाद...
★815 ईसवी में इसका पुनर्निर्माण प्रतिहार राजा नागभट्ट-।। ने किया..।
•महमूद गजनवी ने 1026 में मंदिर से अकूत संपत्ति लूटी और मंदिर के साथ शिवलिंग को भी खंडित कर दिया,साथ ही उसने 50000 से ज्यादा निर्दोष श्रद्धालुओं को मंदिर के रक्षा करने के क्रम में मारा डाला..।
•1299 ईसवी में अल्लाउद्दीन ख़िलजी ने मंदिर को लूटा और मूर्तियों को तोड़ा..
•1395 में जफर खान(बाद में गुजरात सल्तनत की स्थापना) ने मंदिर को लूटा और उसे अपवित्र कर दिया..
•1451 में गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा ने मंदिर पर हमला किया और मंदिर को अपवित्र किया और पूजा करने से रोकने की कोशिश की..।
•1520 में मुजफ्फरशाह द्वितीय ने पुर्तगालियों और स्थानीय लोगो के साथ मंदिर को भी नुकसान पहुँचाया..।
• 1665 और 1706 में औरंगजेब ने दो बार नष्ट करने का आदेश दिया...
- 1665 में उसने मंदिर को तोड़ने का आदेश दिया..
- 1706 में आदेश दिया कि ऐसे ध्वस्त किया जाय कि, वंहा पूजा न किया जा सके और उनके जगह मस्जिद नुमा ढांचा खड़ा कर दिया जाय..।
★1783 में रानी अहिल्याबाई ने पुराने मंदिर के पास एक नया मंदिर बनवाया..।
इस मंदिर में कुछ तो बात थी..जितने बार ध्वस्त किया जाता ये फिर से खड़ा हो जाता..इसका भी सबसे बड़ा कारण भौगोलिक स्थिति थी..व्यापारियों के कारण आय की कमी नही होती थी जिस कारण चंदा एकत्रित करके फिर से इस मंदिर का पुनर्निर्माण कर दिया जाता होगा..।
इसलिय इस मंदिर को "शाश्वत तीर्थ" भी कहते है..।
★वर्तमान में जो मंदिर है उसका नींव सरदार पटेल ने जूनागढ़ यात्रा के दौरान 13 नवंबर 1947 को समुंद्र जल हाथ मे लेकर पुनर्निर्माण का संकल्प लिया..
इसमें भी कम अड़चने नही थी..नेहरू नही चाहते थे कि,इस समय मंदिर बनाया जाए.. गांधीजी ने बीच का रास्ता निकाला और सुझाव दिया की मंदिर सार्वजनिक फंड से न बनाकर चंदा एकत्रित करके बनाया जाए..।
पटेल जी के बीच मे ही देहांत होने के बाद सारा दारोमदार K.M.मुंशी जी ने अपने हाथ मे ले लिया..
और नेहरू जी के आपत्ति जताने के बावजूद डॉ राजेन्द्र प्रसाद 11 मई 1951 को मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा की..।और कहा-
"सोमनाथ का मंदिर इस बात का प्रतीक है कि निर्माण की शक्ति विनाश की शक्ति से कंही अधिक प्रबल होती है..।"
आज भी सोमनाथ का ध्वज हवा में लहरा के ये संदेश दे रहा है की..
दरसल संदेश गोपनीय है...😀
"सौराष्ट्रदेशे विशदेsतिरमये ज्योर्तिमय चंद्रकलावत्सम।
उज्जयिन्याम महाकालमोक्षकारममलेश्वरं।।



कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें