बुधवार, 14 जनवरी 2026

सत्य क्या है..??

सत्य क्या होता है..??
"सत्यं ज्ञानम अनंन्त ब्रह्म:"(तैत्तिरीय उपनिषद)


सत्य..क्या है??
जो तीनों कालों(भूत, वर्तमान और भविष्य) में एक समान रहें..।

ज्ञान क्या है..??
जो स्वयं प्रकाशित हो,और जिससे अन्य चीजों का भान हो..।
(जैसे अंधेरे में दिए के जलने से अन्य चीज का भान)

अनंन्त(infinite)
जिसकी कोई सीमा न हो..जो सर्वव्यापी और कालातीत है..।

"सत्य का ज्ञान अनंन्त है,और जो अनंन्त है वही ब्रह्मा है..।"

हम साधारण मनुष्य एक सीमा तक ही सोचते है,जबकि सत्य उस सीमा के परे होता है..और हम वंहा तक सोचते ही नही है..।

जब सूर्यास्त होता है तो हमें लगता है कि शाम हो गया,जबकि ये सत्य हमारे लिए है,जबकि किसी और क्षेत्र में रह रहे लोगों के लिए सूर्योदय हो रहा होगा..।
सूर्य सत्य है,मगर सूर्योदय और सूर्यास्त पूर्ण सत्य नही है..ये पृथ्वी के घूर्णन के कारण हो रहा है..।जब आप पृथ्वी के गति के साथ अपना तादात्मय बिठा लेंगे तब सत्य का भान होगा..मगर क्या ये आसान है..??

आसान तो नही है..मगर मुश्किल भी नही है..।
इसके लिए पहले अपने अंदर ज्ञान का बीज बोना होगा..और जब वो अंकुरित होगा तब खुद-व-खुद सत्य का भान होगा..।

इसकी प्रक्रिया क्या है..??
बहुत आसान है..
खुद के साथ सबको स्वीकारिये..
स्वीकृति ही प्रकृति के करीब ले जाएगा..।
क्योंकि सबका अपना-अपना सत्य है..भले ही दूसरे का सत्य आपके लिए सत्य न हो..मगर उसके सत्य को नकारे नही..।




वो दूरियां बना रही है..

वो दूरियां बना रही है तो बनाने दो न..
तुम क्यों उसके करीब जा रहें हो..।
जो चीज तुम्हारी कभी थी ही नही..
उसे पाने को व्यर्थ प्रयत्न क्यों करना..।
जो तुम्हारे हिस्से में है..
वो तुम्हारे हिस्से में आकर ही रहेगा..।
जो नही है,
उसे पाने का क्यों व्यर्थ प्रयत्न करना..।
वो गलती से जिंदगी का हिस्सा बन भी गई..
तो तुम्हीं बताओ जिंदगी कैसी होगी..??

वो दूरियां बना रही है तो बनाने दो न..
तुम क्यों उसके करीब जा रहें हो..।


सोमवार, 12 जनवरी 2026

अतीत और भविष्य

कभी-कभी भविष्य की छलांग लगाने के लिए..
अतीत में डुबकियां लगानी होती है..।
मगर डुबकियां लगाना कंहा आसान है..।
जिस तरह समुंद्र से सीपियां निकालने के लिए 
गोताखोर को सांस पर नियंत्रण रखना होता है..
उसी तरह अतीत में गौता लगाने के लिए,
भावनाओं पे नियंत्रण रखना होता है..।।

अतीत में ही छुपी है भविष्य की कुंजी..
अगर अतीत ही बुरा हो,
तो भविष्य कंहा से बेहतर होगा..।

अगर जिसका अतीत ही बुरा हो,
वो फिर क्या करें..??

अपने अतीत में डुबकियां लगाकर.. 
अपने अतीत की गलतियों को ढूंढे..।
और अपने वर्तमान में गलतियों को सुधारें..
भविष्य की छलांग, तो नही लगा सकते..।
मगर वर्तमान में निरंतर दौड़कर..
अपने भविष्य के छलांग से आगे निकल सकते है।।


स्वामी विवेकानंद और जमशेदजी टाटा

स्वामी विवेकानंद जी के सपनों के भारत को अगर किसी ने साकार किया या कर रहा है,तो वो जमशेद जी टाटा और टाटा ट्रस्ट है..।

शायद, स्वामी जी, जमशेद जी टाटा से मिलने के बाद ही कहे होंगे-
"मुझे केवल 100 ऊर्जावान युवा दे दो और मैं इस देश को बदल दूंगा।"
मगर अफसोस भारत को 10 भी ऊर्जावान युवा नही मिल पाया..
अगर मिल जाता तो देश का दशा और दिशा कुछ और होता..।
जब एक टाटा कंपनी भारत के दिलों पे राज करती है,तो उस जैसी 10 कंपनी होती तो विश्व पर राज करती..।

स्वामी विवेकानंद और जमशेद जी की मुलाकात..
स्वामी जी मई 1893 में SS Empress of india नामक जहाज पर सवार होकर "विश्व धर्म सम्मेलन"में भाग लेने जा रहे थे और उसी जहाज पर जमशेद जी टाटा भी सवार थे..।



 ● यह मुलाकात केवल एक संयोग नही था ,बल्कि भारत के वैज्ञानिक पुनर्जागरण की नींव थी..
- विवेकानंद की आध्यात्मिक दृष्टिकोण और टाटा के औद्योगिक दृष्टिकोण का संगम भारत के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ..।

जो आगे चलकर भारत का सर्वश्रेष्ठ शैक्षणिक संस्थान IISc बंगलुरु(1909)बनता है..जंहा C.V.Raman,homi jahangir bhabha,vikram sarabhai , Satish dhavan ,G.N.Ramchandran , C.N.R.Rao..ऐसे - ऐसे व्यक्ति ने यंहा शिक्षण और प्रशिक्षण किया है..।
आज हम जिस इसरो(ISRO) पे गुमान कर रहे है..उसकी उपज भी IISc बंगलुरु के छांव में ही हुआ..।।

स्वामी विवेकानंद से प्रेरित होकर जमशेद जी ने झारखंड में TISCO की नींव रखी..।

टाटा ट्रस्ट आज भी स्वामी जी के भारत के सपने को साकार कर रहा है,टाटा ट्रस्ट ~66% हिस्सा जन कल्याण में खर्च करता है..।

जिस दरिद्रनारायण की सेवा की बात स्वामी विवेकानंद कर रहे थे उसमे टाटा ट्रस्ट आज भी अपना योगदान दे रहा है..।
जमशेदजी टाटा जी को पिछले सदी(100 साल) का विश्व का सबसे बड़ा दानवीर माना जाता है..
 -इन्होंने अपने जीवनकाल में 102 बिलियन डॉलर(आज के वैल्यू के हिसाब से) दान किये,जो बिल गेट्स और वॉरेन बफ़े जैसे दिग्गजों से भी बहुत अधिक है..।।

स्वामी जी को आज भी उस 100 युवाओं का तलाश है,जो भारत का परचम पूरे विश्व में लहराए..
शायद ये वही सदी है,जंहा स्वामी जी के सपने साकार होते हुए नजर आएंगे..।।
स्वामी विवेकानंद यही चाहते थे कि अध्यात्म और विज्ञान का मिलन हो..और आज दुनिया उस और बढ़ रही है..।।




खुद को समेटिये..

हमसब खिलना चाहते है,बिखरना चाहते है,और फैलना चाहते है..मगर इसके बाद क्या..??
इसके बाद का हमें पता नही..अगर पता है भी तो, हम उसे स्वीकारते नही..।
हरेक दशक में हज़ार से ज्यादा सफल लोग होते है..
मगर आनेवाले दशक में उनमें से 10 भी याद नही रह पाते..।।
आखिर क्यों..??

प्रकृति के कुछ नियम है..
खिलने के बाद मुरझाने की प्रक्रिया..मगर हम मुरझाते नहीं बल्कि उसके विपरीत मुरझाने की प्रक्रिया को चुनौती देते है..जो हमें थका देती है,और इस दौड़ से हटा देती है..।हम जिसे मुरझाने की प्रक्रिया समझते है,वो उस समय की सुसुप्ता अवस्था होती है,जंहा एक नया सृजन का निर्माण होने वाला होता है,मगर हम इस प्रक्रिया को चुनौती देकर नई सृजनता के अवसर को खो देते है..।।
आपने कभी गौर किया है..फूल खिलने के बाद मुरझाते है,उसके बाद ही इसमें बीज की उत्पत्ति होती है..।।

जब हम सफल होते है तो हमारी सफलता का शोर चारों और बिखरता है..और हम चाहते है कि ये शोर हमेशा ऐसा ही होता रहे..जो कि संभव नही है,इसके लिए हरेक बार सफल होना होगा तब ही सफलता का शोर बना रहेगा..मगर हम भूल जाते है कि हरेक बार सफल होना संभव नही है,यही से जिंदगी उल्टी दिशा में चलने लगती है,और हम अपनी मंज़िल से भटक जाते है...।

हरेक जीव अधिक से अधिक अपना फैलाव चाहता है,अपने अस्तित्व को सदा बनाये रखने के लिए..ये सोच अच्छी है,मगर जब ये सोच सामुदायिक न बनकर एकाकी बन जाती है,तब से जिंदगी रसातल में चली जाती है..।

हम इन सब प्रक्रिया में इतने मसगुल होते है कि सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया को भूल जाते है..खुद को समेटने की प्रक्रिया..जब तक हम खुद को समेटेंगे नही तबतक फिर से अपना नया विस्तार नही कर पाएंगे..।

जब भी जिंदगी अधर में हो तो सबसे पहले कछुए की भांति खुद को समेटने की कोशिश कीजिये..तबतक खुद को समेटते रह जबतक जिंदगी को नई दिशा न मिल जाये.. हम अक्सरहाँ जब जिंदगी में भटकाव महसूस करते है,तो उसका रास्ता बाहर ढूंढते है,जबकि उस भटकाव से निकलने का रास्ता हमारे अंदर होता है..।।


खुद को जितना समेटियगा आप अपना विस्तार उतना कर पाइयेगा..।।
बिग-बैंग सिद्धांत मालूम है..
एक छोटे से कण में बूम होता है..और 1 सेकंड से कम समय मे हमारा ब्रह्मांड का निर्माण हो जाता है..।।

जितना हो सके खुद को समेटिये.. जरूरत के हिसाब से ही अपना फैलाव कीजिये..कछुए की भांति..।

रविवार, 11 जनवरी 2026

स्वामी विवेकानंद और शिकागो धर्मसभा सम्मेलन

अगर स्वामी विवेकानंद 1893 के शिकागो धर्मसभा सम्मेलन में भाग नही लेते तो क्या हम स्वामी विवेकानंद को जान पाते..??
अगर सच कहूं तो शायद स्वामी विवेकानंद को कोई नही जानता..।


हम आप अक्सरहाँ चुनौतियों से दूर भागते है..मगर ये भूल जाते है कि हम जितना चुनौतियों से भागेंगे चुनौतियां उतना ही पीछा करेगा..और भागते-भागते हम इतने कमजोर हो जाएंगे कि वो हमसे आगे निकलकर हमारा रास्ता घेर लेगा और हमें कैद कर लेगा..।

आज के युवा को "युवा दिवस" मनाने की जरूरत नही है,बल्कि अपने यौवन का इस्तेमाल करके स्वामी विवेकानंद के सपनों को साकार करना है..।

हमें खुद से पूछना चाहिए कि हम अपने यौवन का किस दिशा में इस्तेमाल कर रहें है..??

 शिकागो यात्रा के दौरान स्वामी जी के समक्ष निम्नलिखित चुनौतियां था,मगर उन्होंने उस चुनौती को स्वीकार कर शिकागो जाना चुना..
- पहली चुनौती पैसों का था,इनके पास इतना पैसा नही था कि वो अमेरिका जा सके ,किसी तरह खेतड़ी महाराज से चंदा एकत्रित करके अमेरिका पहुंचे..।

मगर इनके पास इतने पैसा नही था कि ये होटलों में रह सके..।
तब इनकी मुलाकात "मैडम केट सैनबोर्न" से होती है,जो स्वामी जी को अपने घर मे रहने के लिए आमंत्रित करती है,और समाज के प्रभावशाली लोगों से परिचित करवाती है..।

-जब वो अमेरिका पहुंचे थे तब गर्मी था मगर कुछ महीनों में ही कड़ाके की ठंड पड़ने लगा,मगर इनके पास भगवा कपड़े के सिवा और कोई कपड़ा नही था..

-सबसे बड़ी मुसीबत तब आई जब इन्हें पता चला कि 'विश्व धर्म संसद' में शामिल होने की रजिस्ट्रेशन की तारीख एक महीने पहले ही समाप्त हो चुका है।बिना किसी निमंत्रण और पहचान पत्र न होने के कारण इन्हें प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार करने से मना कर दिया गया..।
आप सोच सकते है क्या बीता होगा..हमारी बस,ट्रैन,फ्लाइट छूटती है तो हमपे क्या बीतता है..इन्होंने तो अपने देश को छोड़कर चंदा से एकत्रित किये गए पैसा से वंहा पहुंचे थे..जरा इस परिस्थिति में खुद को रखकर देखिए तब अहसास होगा..।।

- भगवे कपड़े और रंग रूप देखकर लोग इनका सड़कों पर मजाक उड़ाते थे..और होटल में कमरा देने से मना तक कर देता था..।

जब इन्हें लगा कि अब 'विश्व धर्म संसद' में भाग नही ले पाऊंगा तब ये शिकागो से बोस्टन चले गए..
बोस्टन में इनका मुलाक़ात हावर्ड यूनिवर्सिटी के"प्रोफेसर जॉन हेनरी राइट" से हुआ प्रोफेसर स्वामी जी से इतने प्रभावित हुए की उन्होंने खुद विश्व धर्म संसद के अध्यक्ष को चिट्ठी लिखकर शिफारिश किया..।
स्वामी जी ने कहा मेरे पास कोई परिचय पत्र नही है..
तो प्रोफेसर ने कहा- आपसे परिचय पत्र मांगना वैसा है,जैसे सूर्य से स्वर्ग में चमकने का अधिकार मांगना..।
प्रोफेसर ने स्वामी जी का सारा खर्चा उठाया और शिकागो का टिकट दिलाया.।

•जब बोस्टन से शिकागो पहुंचे तो रास्ता भटक गए जिस कारण सारी रात रेलवे स्टेशन पर बिताया..सुबह होते ही वो अपनी मंजिल को ढूंढ रहे थे,मगर ढूंढते-ढूंढते इतना थक गए कि एक घर के सामने थक कर बैठ गए..।तब ही घर का दरवाजा खुलता है और एक महिला निकलती है,जिनका नाम '' जॉर्ज W. हेल था..उन्होंने स्वामी जी को घर के अंदर बुलाया और खाना खिलाया और स्वयं विश्व धर्म संसद में ले जाकर उनका नाम दर्ज करवाया..।


जब हमारा उद्देश्य नेक होता है और हमारे पास धैर्य होता है,तब पूरी कायनात भी हमारे लिए काम करती है😊..।


स्वामी जी ने पहली बार पक्षिमी दुनिया को भारतीय दर्शन से परिचय करवाया
●स्वामी विवेकानंद भारतीय आध्यात्मिकता,संस्कृति और योग के पहले ब्रांड अम्बेसडर थे..


आप एक बार फिर से सोचिए..अगर स्वामी विवेकानंद 'विश्व धर्म संसद" में भाग नही लेते तो कोई उन्हें जान पाता..??
● जिंदगी में जब भी चुनौतियां आये उसे सहस्र स्वीकार कीजिये,क्योंकि चुनौतियां ही तो इंसान को इंसान बनाता है..।



नजरिया..काम(ऊर्जा) और वासना(विस्तार)..

 "आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा 
     कामरूपेण कौन्तेय दुष्परेणानलेन च ।।"
भगवद्गीता के अनुसार- ज्ञानियों का ज्ञान इस काम रूपी शत्रु के द्वारा ढका हुआ है।यह कामवासना कभी न पूर्ण होने वाली और अग्नि के समान जला डालने वाली है।।


काम और वासना शब्द ज्योहीं हमारे जेहन में आते है..हम कुछ और ही सोचने लगते है..।
भारतीय दर्शन के अनुसार- इस प्रकृति का सृजन "काम(ऊर्जा)"से हुआ है..और इस ब्रह्मांड का प्रसार "वासना" से हुआ है...।

मगर आज इंसान की अधोगति का कारण काम और वासना ही है..
ये कैसी विड़बना है..??

"काम"
भारतीय संस्कृति में काम को जीवन का आवश्यक हिस्सा माना गया है..
सामन्यतः इसका अर्थ है-इच्छा,कामना और सुख की प्राप्ति।इन्द्रियों के माध्यम से संसार का आंनद लेना है।इसमें कला,सौंदर्य,,प्रेम और पारिवारिक सुख सब सम्मिलित है..।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते है-
"धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोsस्मि भरतर्षभ।"
- हे अर्जुन , मैं भूतों(प्राणियों) में धर्म के अनुकूल काम हूँ..।

 " काम ऐष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
   महाशनो महापापमा विद्ध्येनमिह वैरिणम ।।"
जब रजोगुण से उत्पन्न होने वाला यह काम ही है जो क्रोध बनता है।यह कभी तृप्त न होने वाला और बड़ा पापी है..।।

अगर काम(ऊर्जा) का सही से इस्तेमाल किया, तो आप.. ईश्वर तत्व बन जाएंगे,अगर सही से नही इस्तेमाल किया तो आप स्वयं के साथ-साथ सबके शत्रु बन जाएंगे..।


-ये काम(ऊर्जा)कभी समाप्त नही होता,बस इसका स्वरूप बदलता है..
मगर हम ज्ञान के अभाव में काम का एक ही स्वरूप को समझते है..।जो दुःखदायी और पीड़ादायी है..।
हम भूल जाते है की..अगर काम का सही से इस्तेमाल किया तो सृजन होगा,अगल गलत तरीके से इस्तेमाल किया तो स्वयं के साथ दूसरों का भी विनाश होगा..और आज वही हो रहा है..लोग काम का दुरुपयोग ही कर रहे है..मगर कुछ लोग है जो इसके ऊर्जा का सही से सदुपयोग करके सृजन कर रहें है..।।

● वही सिंगमंड फ्रायड ने काम को "Libido"(जीवन ऊर्जा) कहा है,जो मनुष्य को सृजन(creation) और सुख की और ले जाता है..अगर इस ऊर्जा का सही से इस्तेमाल नही किया तो ये विनाशकारी हो जाता है..।।
 
"वासना"
जिस तरह काम ऊर्जा है,उसीतरह उसके विस्तार का भाव "वासना" है..।
जंहा काम होगा वंहा वासना होगा ही..
बिना काम के वासना का कोई अस्तित्व नही है..।
जब तक दिए में तेल न हो तबतक दिया कैसे जलेगा..जब दिया जलेगा ही नही तो उसके प्रकाश का विस्तार कैसे होगा..।।

हम अक्सरहाँ काम और वासना को एक ही समझते है..मगर दोनों एक दूसरे से अलग होते हुए भी भिन्न नही है..जैसे दिए का जलना काम है,तो उसकी रोशनी वासना है..।

वासना क्या है-
"महोपनिषद" के अनुसार-
"दृढ़भावनया त्यक्तपुर्वापरविचारणं।
  यदादानम पदार्थस्य वासना सा प्रकीतिर्ता।।"
" जब मनुष्य बिना किसी सही गलत के विचार के ,केवल तीव्र मानसिक संस्कार के वशीभूत होकर किसी वस्तु को ग्रहण करता है या उसकी और भागता है,तो उसे ही वासना कहता है..।"
ये उसी तरफ भागता है..जिस तरफ हमारी काम(ऊर्जा) उद्विग्न होता है..।

मनुस्मृति के अनुसार वासना कभी खत्म नही होता..
"न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
 हविषा कृष्ण वत्यमैर्व भूय ऐवाभिवर्धते ।।"
काम की पूर्ति करते रहने से वासना कभी शांत नही होता,बल्कि ठीक उसी प्रकार बढ़ता है,जिस तरह अग्नि में घी डालने से आग धधकने लगता है।

काम और वासना जिंदगी का ज्योतिपुंज है,बिना इसके,जीवन का हम कल्पना नही कर सकते..।
अब निर्भर हम पे करता है..की हम इस ज्योतिपुंज को किस और ले जा रहे है..अगर हम अपने काम को उन्नति की और ले जा रहे है,तो वासना इसका विस्तार करेगा..अगर अवनति की और ले जा रहे है,तो भी वासना इसका विस्तार करेगा..।

क्या हम काम और वासना से छुटकारा पा सकते है..??
तो इसका जबाब ये है कि,क्या हम बिना सूर्य के जीवन व्यतीत कर सकते है..??
काम एक ऊर्जा है,और बिना ऊर्जा के जीवन का कोई अस्तित्व नही है..हां हम अपने ऊर्जा का स्वरूप बदल कर एक स्तर से दूसरे स्तर पर पहुंच सकते है..उस परम ब्रह्म ऊर्जा में खुद को समाहित कर सकते है..जिसे हम मोक्ष कहते है..।
ऊर्जा कभी खत्म नही होती,बल्कि उसका स्वरूप बदलता रहता है..। 
इसलिय अपने कामवासना से भागें नही बल्कि उसे सही दिशा में रूपांतरित करके अपना और समाज का कल्याण करें..।

इसे रूपांतरित कैसे करें..??
इसका जबाब संभव नही है,क्योंकि हम सब का ऊर्जा स्रोत तो एक ही है,मगर उसका पथ अलग-अलग है..इसलिय सबके जबाब अलग-अलग होंगे..
हां हम स्रोत के आधार पर ये कह सकते है कि ऊर्जा रूपांतरित करने का एक माध्यम ईश्वरभक्ति है..जो सबके लिए है।
तो ईश्वर का ध्यान करें,ऊर्जा रूपांतरित जरूर होगा..।




Yoga for digestive system