इसके बाद का हमें पता नही..अगर पता है भी तो, हम उसे स्वीकारते नही..।
हरेक दशक में हज़ार से ज्यादा सफल लोग होते है..
मगर आनेवाले दशक में उनमें से 10 भी याद नही रह पाते..।।
आखिर क्यों..??
प्रकृति के कुछ नियम है..
खिलने के बाद मुरझाने की प्रक्रिया..मगर हम मुरझाते नहीं बल्कि उसके विपरीत मुरझाने की प्रक्रिया को चुनौती देते है..जो हमें थका देती है,और इस दौड़ से हटा देती है..।हम जिसे मुरझाने की प्रक्रिया समझते है,वो उस समय की सुसुप्ता अवस्था होती है,जंहा एक नया सृजन का निर्माण होने वाला होता है,मगर हम इस प्रक्रिया को चुनौती देकर नई सृजनता के अवसर को खो देते है..।।
आपने कभी गौर किया है..फूल खिलने के बाद मुरझाते है,उसके बाद ही इसमें बीज की उत्पत्ति होती है..।।
जब हम सफल होते है तो हमारी सफलता का शोर चारों और बिखरता है..और हम चाहते है कि ये शोर हमेशा ऐसा ही होता रहे..जो कि संभव नही है,इसके लिए हरेक बार सफल होना होगा तब ही सफलता का शोर बना रहेगा..मगर हम भूल जाते है कि हरेक बार सफल होना संभव नही है,यही से जिंदगी उल्टी दिशा में चलने लगती है,और हम अपनी मंज़िल से भटक जाते है...।
हरेक जीव अधिक से अधिक अपना फैलाव चाहता है,अपने अस्तित्व को सदा बनाये रखने के लिए..ये सोच अच्छी है,मगर जब ये सोच सामुदायिक न बनकर एकाकी बन जाती है,तब से जिंदगी रसातल में चली जाती है..।
हम इन सब प्रक्रिया में इतने मसगुल होते है कि सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया को भूल जाते है..खुद को समेटने की प्रक्रिया..जब तक हम खुद को समेटेंगे नही तबतक फिर से अपना नया विस्तार नही कर पाएंगे..।
जब भी जिंदगी अधर में हो तो सबसे पहले कछुए की भांति खुद को समेटने की कोशिश कीजिये..तबतक खुद को समेटते रह जबतक जिंदगी को नई दिशा न मिल जाये.. हम अक्सरहाँ जब जिंदगी में भटकाव महसूस करते है,तो उसका रास्ता बाहर ढूंढते है,जबकि उस भटकाव से निकलने का रास्ता हमारे अंदर होता है..।।
खुद को जितना समेटियगा आप अपना विस्तार उतना कर पाइयेगा..।।
बिग-बैंग सिद्धांत मालूम है..
एक छोटे से कण में बूम होता है..और 1 सेकंड से कम समय मे हमारा ब्रह्मांड का निर्माण हो जाता है..।।
जितना हो सके खुद को समेटिये.. जरूरत के हिसाब से ही अपना फैलाव कीजिये..कछुए की भांति..।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें