"आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा
कामरूपेण कौन्तेय दुष्परेणानलेन च ।।"
भगवद्गीता के अनुसार- ज्ञानियों का ज्ञान इस काम रूपी शत्रु के द्वारा ढका हुआ है।यह कामवासना कभी न पूर्ण होने वाली और अग्नि के समान जला डालने वाली है।।
भारतीय दर्शन के अनुसार- इस प्रकृति का सृजन "काम(ऊर्जा)"से हुआ है..और इस ब्रह्मांड का प्रसार "वासना" से हुआ है...।
मगर आज इंसान की अधोगति का कारण काम और वासना ही है..
ये कैसी विड़बना है..??
"काम"
भारतीय संस्कृति में काम को जीवन का आवश्यक हिस्सा माना गया है..।
सामन्यतः इसका अर्थ है-इच्छा,कामना और सुख की प्राप्ति।इन्द्रियों के माध्यम से संसार का आंनद लेना है।इसमें कला,सौंदर्य,,प्रेम और पारिवारिक सुख सब सम्मिलित है..।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते है-
"धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोsस्मि भरतर्षभ।"
- हे अर्जुन , मैं भूतों(प्राणियों) में धर्म के अनुकूल काम हूँ..।
" काम ऐष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापापमा विद्ध्येनमिह वैरिणम ।।"
जब रजोगुण से उत्पन्न होने वाला यह काम ही है जो क्रोध बनता है।यह कभी तृप्त न होने वाला और बड़ा पापी है..।।
● अगर काम(ऊर्जा) का सही से इस्तेमाल किया, तो आप.. ईश्वर तत्व बन जाएंगे,अगर सही से नही इस्तेमाल किया तो आप स्वयं के साथ-साथ सबके शत्रु बन जाएंगे..।
-ये काम(ऊर्जा)कभी समाप्त नही होता,बस इसका स्वरूप बदलता है..।
मगर हम ज्ञान के अभाव में काम का एक ही स्वरूप को समझते है..।जो दुःखदायी और पीड़ादायी है..।
हम भूल जाते है की..अगर काम का सही से इस्तेमाल किया तो सृजन होगा,अगल गलत तरीके से इस्तेमाल किया तो स्वयं के साथ दूसरों का भी विनाश होगा..और आज वही हो रहा है..लोग काम का दुरुपयोग ही कर रहे है..मगर कुछ लोग है जो इसके ऊर्जा का सही से सदुपयोग करके सृजन कर रहें है..।।
● वही सिंगमंड फ्रायड ने काम को "Libido"(जीवन ऊर्जा) कहा है,जो मनुष्य को सृजन(creation) और सुख की और ले जाता है..अगर इस ऊर्जा का सही से इस्तेमाल नही किया तो ये विनाशकारी हो जाता है..।।
"वासना"
जिस तरह काम ऊर्जा है,उसीतरह उसके विस्तार का भाव "वासना" है..।
जंहा काम होगा वंहा वासना होगा ही..
बिना काम के वासना का कोई अस्तित्व नही है..।
जब तक दिए में तेल न हो तबतक दिया कैसे जलेगा..जब दिया जलेगा ही नही तो उसके प्रकाश का विस्तार कैसे होगा..।।
हम अक्सरहाँ काम और वासना को एक ही समझते है..मगर दोनों एक दूसरे से अलग होते हुए भी भिन्न नही है..जैसे दिए का जलना काम है,तो उसकी रोशनी वासना है..।
वासना क्या है-
"महोपनिषद" के अनुसार-
"दृढ़भावनया त्यक्तपुर्वापरविचारणं।
यदादानम पदार्थस्य वासना सा प्रकीतिर्ता।।"
" जब मनुष्य बिना किसी सही गलत के विचार के ,केवल तीव्र मानसिक संस्कार के वशीभूत होकर किसी वस्तु को ग्रहण करता है या उसकी और भागता है,तो उसे ही वासना कहता है..।"
ये उसी तरफ भागता है..जिस तरफ हमारी काम(ऊर्जा) उद्विग्न होता है..।
मनुस्मृति के अनुसार वासना कभी खत्म नही होता..
"न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्ण वत्यमैर्व भूय ऐवाभिवर्धते ।।"
काम की पूर्ति करते रहने से वासना कभी शांत नही होता,बल्कि ठीक उसी प्रकार बढ़ता है,जिस तरह अग्नि में घी डालने से आग धधकने लगता है।
काम और वासना जिंदगी का ज्योतिपुंज है,बिना इसके,जीवन का हम कल्पना नही कर सकते..।
अब निर्भर हम पे करता है..की हम इस ज्योतिपुंज को किस और ले जा रहे है..अगर हम अपने काम को उन्नति की और ले जा रहे है,तो वासना इसका विस्तार करेगा..अगर अवनति की और ले जा रहे है,तो भी वासना इसका विस्तार करेगा..।
क्या हम काम और वासना से छुटकारा पा सकते है..??
तो इसका जबाब ये है कि,क्या हम बिना सूर्य के जीवन व्यतीत कर सकते है..??
काम एक ऊर्जा है,और बिना ऊर्जा के जीवन का कोई अस्तित्व नही है..हां हम अपने ऊर्जा का स्वरूप बदल कर एक स्तर से दूसरे स्तर पर पहुंच सकते है..उस परम ब्रह्म ऊर्जा में खुद को समाहित कर सकते है..जिसे हम मोक्ष कहते है..।
ऊर्जा कभी खत्म नही होती,बल्कि उसका स्वरूप बदलता रहता है..।
इसलिय अपने कामवासना से भागें नही बल्कि उसे सही दिशा में रूपांतरित करके अपना और समाज का कल्याण करें..।
इसे रूपांतरित कैसे करें..??
इसका जबाब संभव नही है,क्योंकि हम सब का ऊर्जा स्रोत तो एक ही है,मगर उसका पथ अलग-अलग है..इसलिय सबके जबाब अलग-अलग होंगे..
हां हम स्रोत के आधार पर ये कह सकते है कि ऊर्जा रूपांतरित करने का एक माध्यम ईश्वरभक्ति है..जो सबके लिए है।
तो ईश्वर का ध्यान करें,ऊर्जा रूपांतरित जरूर होगा..।



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