जो कभी हमारा था ही नहीं..
और ताउम्र उसके लिए..
और उसके यादों में..
जिंदगी को नर्क बना लेते है..।
और जो हमारा है..
उसको हम ताउम्र जेहन से लगा ही नहीं पाते है..।
दरसल हम उसे पहचान ही नहीं पाते है..
और जिंदगी यू ही गुजर जाती है..
इस कश्मकश में कि..
कौन अपना है,और कौन पराया..।
जो अपना है..
उसे कभी अपना माना ही नहीं..
सच कहूं तो उसे पहचाना ही नहीं..।
जब से सांसें चल रही है..
तब से वो मेरे साथ चल रहा है..
जंहा कोई नही होता..
वंहा भी वो होता है..
जंहा मैं नहीं होता..
वहां भी वो होता है..
उस मैं को मैंने पहचाना ही नहीं..।
कैसे दीदार करू उसका..
कैसे आंखें-चार करू उससे..
कुछ पता नहीं..

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