सोमवार, 12 जनवरी 2026

अतीत और भविष्य

कभी-कभी भविष्य की छलांग लगाने के लिए..
अतीत में डुबकियां लगानी होती है..।
मगर डुबकियां लगाना कंहा आसान है..।
जिस तरह समुंद्र से सीपियां निकालने के लिए 
गोताखोर को सांस पर नियंत्रण रखना होता है..
उसी तरह अतीत में गौता लगाने के लिए,
भावनाओं पे नियंत्रण रखना होता है..।।

अतीत में ही छुपी है भविष्य की कुंजी..
अगर अतीत ही बुरा हो,
तो भविष्य कंहा से बेहतर होगा..।

अगर जिसका अतीत ही बुरा हो,
वो फिर क्या करें..??

अपने अतीत में डुबकियां लगाकर.. 
अपने अतीत की गलतियों को ढूंढे..।
और अपने वर्तमान में गलतियों को सुधारें..
भविष्य की छलांग, तो नही लगा सकते..।
मगर वर्तमान में निरंतर दौड़कर..
अपने भविष्य के छलांग से आगे निकल सकते है।।


स्वामी विवेकानंद और जमशेदजी टाटा

स्वामी विवेकानंद जी के सपनों के भारत को अगर किसी ने साकार किया या कर रहा है,तो वो जमशेद जी टाटा और टाटा ट्रस्ट है..।

शायद, स्वामी जी, जमशेद जी टाटा से मिलने के बाद ही कहे होंगे-
"मुझे केवल 100 ऊर्जावान युवा दे दो और मैं इस देश को बदल दूंगा।"
मगर अफसोस भारत को 10 भी ऊर्जावान युवा नही मिल पाया..
अगर मिल जाता तो देश का दशा और दिशा कुछ और होता..।
जब एक टाटा कंपनी भारत के दिलों पे राज करती है,तो उस जैसी 10 कंपनी होती तो विश्व पर राज करती..।

स्वामी विवेकानंद और जमशेद जी की मुलाकात..
स्वामी जी मई 1893 में SS Empress of india नामक जहाज पर सवार होकर "विश्व धर्म सम्मेलन"में भाग लेने जा रहे थे और उसी जहाज पर जमशेद जी टाटा भी सवार थे..।



 ● यह मुलाकात केवल एक संयोग नही था ,बल्कि भारत के वैज्ञानिक पुनर्जागरण की नींव थी..
- विवेकानंद की आध्यात्मिक दृष्टिकोण और टाटा के औद्योगिक दृष्टिकोण का संगम भारत के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ..।

जो आगे चलकर भारत का सर्वश्रेष्ठ शैक्षणिक संस्थान IISc बंगलुरु(1909)बनता है..जंहा C.V.Raman,homi jahangir bhabha,vikram sarabhai , Satish dhavan ,G.N.Ramchandran , C.N.R.Rao..ऐसे - ऐसे व्यक्ति ने यंहा शिक्षण और प्रशिक्षण किया है..।
आज हम जिस इसरो(ISRO) पे गुमान कर रहे है..उसकी उपज भी IISc बंगलुरु के छांव में ही हुआ..।।

स्वामी विवेकानंद से प्रेरित होकर जमशेद जी ने झारखंड में TISCO की नींव रखी..।

टाटा ट्रस्ट आज भी स्वामी जी के भारत के सपने को साकार कर रहा है,टाटा ट्रस्ट ~66% हिस्सा जन कल्याण में खर्च करता है..।

जिस दरिद्रनारायण की सेवा की बात स्वामी विवेकानंद कर रहे थे उसमे टाटा ट्रस्ट आज भी अपना योगदान दे रहा है..।
जमशेदजी टाटा जी को पिछले सदी(100 साल) का विश्व का सबसे बड़ा दानवीर माना जाता है..
 -इन्होंने अपने जीवनकाल में 102 बिलियन डॉलर(आज के वैल्यू के हिसाब से) दान किये,जो बिल गेट्स और वॉरेन बफ़े जैसे दिग्गजों से भी बहुत अधिक है..।।

स्वामी जी को आज भी उस 100 युवाओं का तलाश है,जो भारत का परचम पूरे विश्व में लहराए..
शायद ये वही सदी है,जंहा स्वामी जी के सपने साकार होते हुए नजर आएंगे..।।
स्वामी विवेकानंद यही चाहते थे कि अध्यात्म और विज्ञान का मिलन हो..और आज दुनिया उस और बढ़ रही है..।।




खुद को समेटिये..

हमसब खिलना चाहते है,बिखरना चाहते है,और फैलना चाहते है..मगर इसके बाद क्या..??
इसके बाद का हमें पता नही..अगर पता है भी तो, हम उसे स्वीकारते नही..।
हरेक दशक में हज़ार से ज्यादा सफल लोग होते है..
मगर आनेवाले दशक में उनमें से 10 भी याद नही रह पाते..।।
आखिर क्यों..??

प्रकृति के कुछ नियम है..
खिलने के बाद मुरझाने की प्रक्रिया..मगर हम मुरझाते नहीं बल्कि उसके विपरीत मुरझाने की प्रक्रिया को चुनौती देते है..जो हमें थका देती है,और इस दौड़ से हटा देती है..।हम जिसे मुरझाने की प्रक्रिया समझते है,वो उस समय की सुसुप्ता अवस्था होती है,जंहा एक नया सृजन का निर्माण होने वाला होता है,मगर हम इस प्रक्रिया को चुनौती देकर नई सृजनता के अवसर को खो देते है..।।
आपने कभी गौर किया है..फूल खिलने के बाद मुरझाते है,उसके बाद ही इसमें बीज की उत्पत्ति होती है..।।

जब हम सफल होते है तो हमारी सफलता का शोर चारों और बिखरता है..और हम चाहते है कि ये शोर हमेशा ऐसा ही होता रहे..जो कि संभव नही है,इसके लिए हरेक बार सफल होना होगा तब ही सफलता का शोर बना रहेगा..मगर हम भूल जाते है कि हरेक बार सफल होना संभव नही है,यही से जिंदगी उल्टी दिशा में चलने लगती है,और हम अपनी मंज़िल से भटक जाते है...।

हरेक जीव अधिक से अधिक अपना फैलाव चाहता है,अपने अस्तित्व को सदा बनाये रखने के लिए..ये सोच अच्छी है,मगर जब ये सोच सामुदायिक न बनकर एकाकी बन जाती है,तब से जिंदगी रसातल में चली जाती है..।

हम इन सब प्रक्रिया में इतने मसगुल होते है कि सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया को भूल जाते है..खुद को समेटने की प्रक्रिया..जब तक हम खुद को समेटेंगे नही तबतक फिर से अपना नया विस्तार नही कर पाएंगे..।

जब भी जिंदगी अधर में हो तो सबसे पहले कछुए की भांति खुद को समेटने की कोशिश कीजिये..तबतक खुद को समेटते रह जबतक जिंदगी को नई दिशा न मिल जाये.. हम अक्सरहाँ जब जिंदगी में भटकाव महसूस करते है,तो उसका रास्ता बाहर ढूंढते है,जबकि उस भटकाव से निकलने का रास्ता हमारे अंदर होता है..।।


खुद को जितना समेटियगा आप अपना विस्तार उतना कर पाइयेगा..।।
बिग-बैंग सिद्धांत मालूम है..
एक छोटे से कण में बूम होता है..और 1 सेकंड से कम समय मे हमारा ब्रह्मांड का निर्माण हो जाता है..।।

जितना हो सके खुद को समेटिये.. जरूरत के हिसाब से ही अपना फैलाव कीजिये..कछुए की भांति..।

रविवार, 11 जनवरी 2026

स्वामी विवेकानंद और शिकागो धर्मसभा सम्मेलन

अगर स्वामी विवेकानंद 1893 के शिकागो धर्मसभा सम्मेलन में भाग नही लेते तो क्या हम स्वामी विवेकानंद को जान पाते..??
अगर सच कहूं तो शायद स्वामी विवेकानंद को कोई नही जानता..।


हम आप अक्सरहाँ चुनौतियों से दूर भागते है..मगर ये भूल जाते है कि हम जितना चुनौतियों से भागेंगे चुनौतियां उतना ही पीछा करेगा..और भागते-भागते हम इतने कमजोर हो जाएंगे कि वो हमसे आगे निकलकर हमारा रास्ता घेर लेगा और हमें कैद कर लेगा..।

आज के युवा को "युवा दिवस" मनाने की जरूरत नही है,बल्कि अपने यौवन का इस्तेमाल करके स्वामी विवेकानंद के सपनों को साकार करना है..।

हमें खुद से पूछना चाहिए कि हम अपने यौवन का किस दिशा में इस्तेमाल कर रहें है..??

 शिकागो यात्रा के दौरान स्वामी जी के समक्ष निम्नलिखित चुनौतियां था,मगर उन्होंने उस चुनौती को स्वीकार कर शिकागो जाना चुना..
- पहली चुनौती पैसों का था,इनके पास इतना पैसा नही था कि वो अमेरिका जा सके ,किसी तरह खेतड़ी महाराज से चंदा एकत्रित करके अमेरिका पहुंचे..।

मगर इनके पास इतने पैसा नही था कि ये होटलों में रह सके..।
तब इनकी मुलाकात "मैडम केट सैनबोर्न" से होती है,जो स्वामी जी को अपने घर मे रहने के लिए आमंत्रित करती है,और समाज के प्रभावशाली लोगों से परिचित करवाती है..।

-जब वो अमेरिका पहुंचे थे तब गर्मी था मगर कुछ महीनों में ही कड़ाके की ठंड पड़ने लगा,मगर इनके पास भगवा कपड़े के सिवा और कोई कपड़ा नही था..

-सबसे बड़ी मुसीबत तब आई जब इन्हें पता चला कि 'विश्व धर्म संसद' में शामिल होने की रजिस्ट्रेशन की तारीख एक महीने पहले ही समाप्त हो चुका है।बिना किसी निमंत्रण और पहचान पत्र न होने के कारण इन्हें प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार करने से मना कर दिया गया..।
आप सोच सकते है क्या बीता होगा..हमारी बस,ट्रैन,फ्लाइट छूटती है तो हमपे क्या बीतता है..इन्होंने तो अपने देश को छोड़कर चंदा से एकत्रित किये गए पैसा से वंहा पहुंचे थे..जरा इस परिस्थिति में खुद को रखकर देखिए तब अहसास होगा..।।

- भगवे कपड़े और रंग रूप देखकर लोग इनका सड़कों पर मजाक उड़ाते थे..और होटल में कमरा देने से मना तक कर देता था..।

जब इन्हें लगा कि अब 'विश्व धर्म संसद' में भाग नही ले पाऊंगा तब ये शिकागो से बोस्टन चले गए..
बोस्टन में इनका मुलाक़ात हावर्ड यूनिवर्सिटी के"प्रोफेसर जॉन हेनरी राइट" से हुआ प्रोफेसर स्वामी जी से इतने प्रभावित हुए की उन्होंने खुद विश्व धर्म संसद के अध्यक्ष को चिट्ठी लिखकर शिफारिश किया..।
स्वामी जी ने कहा मेरे पास कोई परिचय पत्र नही है..
तो प्रोफेसर ने कहा- आपसे परिचय पत्र मांगना वैसा है,जैसे सूर्य से स्वर्ग में चमकने का अधिकार मांगना..।
प्रोफेसर ने स्वामी जी का सारा खर्चा उठाया और शिकागो का टिकट दिलाया.।

•जब बोस्टन से शिकागो पहुंचे तो रास्ता भटक गए जिस कारण सारी रात रेलवे स्टेशन पर बिताया..सुबह होते ही वो अपनी मंजिल को ढूंढ रहे थे,मगर ढूंढते-ढूंढते इतना थक गए कि एक घर के सामने थक कर बैठ गए..।तब ही घर का दरवाजा खुलता है और एक महिला निकलती है,जिनका नाम '' जॉर्ज W. हेल था..उन्होंने स्वामी जी को घर के अंदर बुलाया और खाना खिलाया और स्वयं विश्व धर्म संसद में ले जाकर उनका नाम दर्ज करवाया..।


जब हमारा उद्देश्य नेक होता है और हमारे पास धैर्य होता है,तब पूरी कायनात भी हमारे लिए काम करती है😊..।


स्वामी जी ने पहली बार पक्षिमी दुनिया को भारतीय दर्शन से परिचय करवाया
●स्वामी विवेकानंद भारतीय आध्यात्मिकता,संस्कृति और योग के पहले ब्रांड अम्बेसडर थे..


आप एक बार फिर से सोचिए..अगर स्वामी विवेकानंद 'विश्व धर्म संसद" में भाग नही लेते तो कोई उन्हें जान पाता..??
● जिंदगी में जब भी चुनौतियां आये उसे सहस्र स्वीकार कीजिये,क्योंकि चुनौतियां ही तो इंसान को इंसान बनाता है..।



नजरिया..काम(ऊर्जा) और वासना(विस्तार)..

 "आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा 
     कामरूपेण कौन्तेय दुष्परेणानलेन च ।।"
भगवद्गीता के अनुसार- ज्ञानियों का ज्ञान इस काम रूपी शत्रु के द्वारा ढका हुआ है।यह कामवासना कभी न पूर्ण होने वाली और अग्नि के समान जला डालने वाली है।।


काम और वासना शब्द ज्योहीं हमारे जेहन में आते है..हम कुछ और ही सोचने लगते है..।
भारतीय दर्शन के अनुसार- इस प्रकृति का सृजन "काम(ऊर्जा)"से हुआ है..और इस ब्रह्मांड का प्रसार "वासना" से हुआ है...।

मगर आज इंसान की अधोगति का कारण काम और वासना ही है..
ये कैसी विड़बना है..??

"काम"
भारतीय संस्कृति में काम को जीवन का आवश्यक हिस्सा माना गया है..
सामन्यतः इसका अर्थ है-इच्छा,कामना और सुख की प्राप्ति।इन्द्रियों के माध्यम से संसार का आंनद लेना है।इसमें कला,सौंदर्य,,प्रेम और पारिवारिक सुख सब सम्मिलित है..।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते है-
"धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोsस्मि भरतर्षभ।"
- हे अर्जुन , मैं भूतों(प्राणियों) में धर्म के अनुकूल काम हूँ..।

 " काम ऐष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
   महाशनो महापापमा विद्ध्येनमिह वैरिणम ।।"
जब रजोगुण से उत्पन्न होने वाला यह काम ही है जो क्रोध बनता है।यह कभी तृप्त न होने वाला और बड़ा पापी है..।।

अगर काम(ऊर्जा) का सही से इस्तेमाल किया, तो आप.. ईश्वर तत्व बन जाएंगे,अगर सही से नही इस्तेमाल किया तो आप स्वयं के साथ-साथ सबके शत्रु बन जाएंगे..।


-ये काम(ऊर्जा)कभी समाप्त नही होता,बस इसका स्वरूप बदलता है..
मगर हम ज्ञान के अभाव में काम का एक ही स्वरूप को समझते है..।जो दुःखदायी और पीड़ादायी है..।
हम भूल जाते है की..अगर काम का सही से इस्तेमाल किया तो सृजन होगा,अगल गलत तरीके से इस्तेमाल किया तो स्वयं के साथ दूसरों का भी विनाश होगा..और आज वही हो रहा है..लोग काम का दुरुपयोग ही कर रहे है..मगर कुछ लोग है जो इसके ऊर्जा का सही से सदुपयोग करके सृजन कर रहें है..।।

● वही सिंगमंड फ्रायड ने काम को "Libido"(जीवन ऊर्जा) कहा है,जो मनुष्य को सृजन(creation) और सुख की और ले जाता है..अगर इस ऊर्जा का सही से इस्तेमाल नही किया तो ये विनाशकारी हो जाता है..।।
 
"वासना"
जिस तरह काम ऊर्जा है,उसीतरह उसके विस्तार का भाव "वासना" है..।
जंहा काम होगा वंहा वासना होगा ही..
बिना काम के वासना का कोई अस्तित्व नही है..।
जब तक दिए में तेल न हो तबतक दिया कैसे जलेगा..जब दिया जलेगा ही नही तो उसके प्रकाश का विस्तार कैसे होगा..।।

हम अक्सरहाँ काम और वासना को एक ही समझते है..मगर दोनों एक दूसरे से अलग होते हुए भी भिन्न नही है..जैसे दिए का जलना काम है,तो उसकी रोशनी वासना है..।

वासना क्या है-
"महोपनिषद" के अनुसार-
"दृढ़भावनया त्यक्तपुर्वापरविचारणं।
  यदादानम पदार्थस्य वासना सा प्रकीतिर्ता।।"
" जब मनुष्य बिना किसी सही गलत के विचार के ,केवल तीव्र मानसिक संस्कार के वशीभूत होकर किसी वस्तु को ग्रहण करता है या उसकी और भागता है,तो उसे ही वासना कहता है..।"
ये उसी तरफ भागता है..जिस तरफ हमारी काम(ऊर्जा) उद्विग्न होता है..।

मनुस्मृति के अनुसार वासना कभी खत्म नही होता..
"न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
 हविषा कृष्ण वत्यमैर्व भूय ऐवाभिवर्धते ।।"
काम की पूर्ति करते रहने से वासना कभी शांत नही होता,बल्कि ठीक उसी प्रकार बढ़ता है,जिस तरह अग्नि में घी डालने से आग धधकने लगता है।

काम और वासना जिंदगी का ज्योतिपुंज है,बिना इसके,जीवन का हम कल्पना नही कर सकते..।
अब निर्भर हम पे करता है..की हम इस ज्योतिपुंज को किस और ले जा रहे है..अगर हम अपने काम को उन्नति की और ले जा रहे है,तो वासना इसका विस्तार करेगा..अगर अवनति की और ले जा रहे है,तो भी वासना इसका विस्तार करेगा..।

क्या हम काम और वासना से छुटकारा पा सकते है..??
तो इसका जबाब ये है कि,क्या हम बिना सूर्य के जीवन व्यतीत कर सकते है..??
काम एक ऊर्जा है,और बिना ऊर्जा के जीवन का कोई अस्तित्व नही है..हां हम अपने ऊर्जा का स्वरूप बदल कर एक स्तर से दूसरे स्तर पर पहुंच सकते है..उस परम ब्रह्म ऊर्जा में खुद को समाहित कर सकते है..जिसे हम मोक्ष कहते है..।
ऊर्जा कभी खत्म नही होती,बल्कि उसका स्वरूप बदलता रहता है..। 
इसलिय अपने कामवासना से भागें नही बल्कि उसे सही दिशा में रूपांतरित करके अपना और समाज का कल्याण करें..।

इसे रूपांतरित कैसे करें..??
इसका जबाब संभव नही है,क्योंकि हम सब का ऊर्जा स्रोत तो एक ही है,मगर उसका पथ अलग-अलग है..इसलिय सबके जबाब अलग-अलग होंगे..
हां हम स्रोत के आधार पर ये कह सकते है कि ऊर्जा रूपांतरित करने का एक माध्यम ईश्वरभक्ति है..जो सबके लिए है।
तो ईश्वर का ध्यान करें,ऊर्जा रूपांतरित जरूर होगा..।




शनिवार, 10 जनवरी 2026

विश्व हिंदी दिवस..

आज क्या है..
कुछ तो नही..??
हां हमें किसी चीज का तब अहसास होता है,जब वो चीज हमारे जिंदगी पे प्रभाव डालती हो..।
सो आज कुछ ऐसा दिन नही है,जो हमारे जिंदगी पे प्रभाव डालता हो..।
सही कहा आपने..।
क्योंकि मैंने कई हिंदी अखबार खंगाले मुझे लगा इसमें कुछ कंटेंट मिल जाये मगर नही मिला..इसलिय मैंने राष्ट्रीय संस्करण का न्यूज़पेपर पढ़ा..मगर अफसोस उसमें भी कुछ पढ़ने को नही मिला..।।

एक पुस्तक है "सेपियंस" युवाल नोवा हरारी का..
वो कहते है..
पृथ्वी पे जीवन का अस्तित्व ~450 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ..
• और 3 लाख वर्ष पूर्व "होमो(homo)" परिवार का उद्भव हुआ..
 उस परिवार में होमो ईरेक्टस, होमो निएंडरथल ,होमो डेनिसोवा, होमो ईरगस्टर इत्यादि थे..आज सब विलुप्त हो गए.. सिर्फ "होमो सेपियंस" बचे हुए है..
जबकि होमो सेपियंस की औकाद निएंडरथल के सामने कुछ भी नही था..
जैसे खली के सामने राजपाल यादव😊..।।

मगर फिर ऐसा क्या हुआ.. कि सब विलुप्त हो गए और सिर्फ होमो सेपियंस बचे..??

नोवा हरारी कहते है-इसके पीछे संज्ञानात्मक(cognitive) क्रांति का अहम योगदान है..साधारण शब्द में कहे तो  भाषा का विकास ही इन्हें अबतक जीवित रखा है,यानी हम सब आज इसलिए है क्योंकि हमारी एक भाषा है..जो हमें एक दूसरे से जोड़ती है..और हमें सोचने में मदद करती है..।

अन्य प्रजातियां कुछ शब्दों तक ही सीमित रही जिस कारण उनका अस्तित्व आज नही है...।।

यानी भाषा का हमारे जीवन मे अहम योगदान है..
हम आज इसलिए है क्योंकि हमारे पूर्वजों ने भाषा का ईजाद किया..।

और आज " विश्व हिंदी दिवस " है..😊


इसे मनाने की शुरुआत मनमोहन सिंह ने पहली बार 2006 मे किया..
क्योंकि 10 जनवरी 1975 को नागपुर में पहली बार विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया गया था..जिसमें 30 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था..।
इस दिन को यादगार बनाने और पूरे विश्व मे हिंदी के प्रसार के लिए प्रत्येक साल 10 जनवरी को "विश्व हिंदी दिवस" मनाते है..।

इस बार का थीम है-
" हिंदी पारंपरिक ज्ञान से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक"

हिंदी भाषा का सफर..
आज से 300 साल पहले तक हिंदी,हिंदी नही था,इसे खड़ी बोली के रूप में जाना जाता था..और आज ये बोली से भाषा बन गया.।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान..
1915 तक हमारा स्वतंत्रता आंदोलन वकीलों का आंदोलन था..मगर हिंदी ने इसे जन आंदोलन बनाया और देश के हरेक छोड़ तक आंदोलन को पहुँचाया.. हिंदी ने देश के लोगों को जोड़ने का काम किया..।।

क्या आपको पता है..
हिंदी को राजभाषा बनाने की मांग किसने की..??
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हिंदी को राजभाषा बनाने की मांग उनलोगों ने किया जिनकी मातृभाषा हिंदी नही था..
गुजरात से - महात्मा गांधी,के.एम. मुंशी, स्वामी सत्यानंद सरस्वती
महाराष्ट्र से- बाल गंगाधर तिलक,सावरकर
पंजाब से -लाला लाजपत राय
बंगाल से- केशव चंद्र सेन से लेकर सुभाषचंद्र बोस तक ने की..
दक्षिण भारत मे हिंदी प्रचार प्रसार के लिए गांधी जी ने..
"दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा'' का स्थापना किया..
यानी पूरे भारत से हिंदी को समर्थन मिल रहा था..।
14 सेप्टेंबर 1949 को संविधान सभा ने ध्वनिमत से इसे राज्यभाषा के रूप में स्वीकार किया..(इस कारण 14सेप्टेंबर को हिंदी दिवस मनाते है)

वर्तमान में हिंदी की स्थिति..
1991 के जनगणना के अनुसार 39% लोग हिंदी बोलते थे..(1st लैंग्वेज)
  2001 के जनगणना के अनुसार 41% लोग हिंदी बोलते थे..और
  2011 के जनगणना के अनुसार 43.6% लोग हिंदी बोलते थे..
   दूसरे स्थान पर बंगला है(9%)
   तीसरे स्थान पर मराठी(8.7%),और चौथे स्थान पर तेलगु(8%)
  और अंग्रेजी बोलने वाले(0.02%) 2लाख 70हजार लोग है.
वर्तमान में लगभग 60करोड़ से ज्यादा लोग भारत मे हिंदी बोलते है..।

विश्व मे हिंदी की स्थिति..
क्या आप बता सकते है..विश्व मे हिंदी का कौन सा स्थान है..??
 
UNESCO के सर्वेक्षण के अनुसार विश्व मे 7115 भाषा है..
 • 150 भाषा ऐसी है,जिसे बोलने वालों की संख्या 10 लोगों से कम है..
 • 5.5-6 हजार ऐसी भाषा है जिसे बोलने वालों की संख्या 1 लाख से कम है..।
 ● 800 करोड़ आबादी वाले विश्व मे हिंदी का स्थान तीसरा है..लगभग 8% लोग हिंदी बोलते है..।
  • पहले स्थान पर अंग्रेजी(16%) दूसरे स्थान पर मंदारिन(14%) है..।।

अंग्रेजी पहले पायदान पर क्यों है..??
   सोचिए..🤔

हिंदी विश्व में तीसरा स्थान रखने पर भी दयनीय स्थिति क्यों है..
  (ये सभी भारतीय भाषाओं के साथ है..तेलगु,तमिल,मराठी...

-★जिस देश मे आधी आबादी हिंदी बोलने वाला हो..और मात्र 0.02% अंग्रेजी बोलने वाला हो..उस देश के हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में हिंदी या क्षेत्रीय भाषा मे जिरह और अपील नही किया जा सकता है..
अगर आप करते है तो उसे खारिज कर दिया जाता है..।
-सबसे पहले इस व्यवस्था को खत्म किया जाय..।

प्राथिमक शिक्षा मातृभाषा में अनिवार्य किया जाय..
(कम से कम 5वी कक्षा तक)
(UNESCO के शोध में पाया गया है वही देश तकनीकी रूप से अग्रणी है जंहा शिक्षा मातृभाषा में दी जा रही है..।)
(भारत से जब छात्र जर्मनी,रशिया,यूक्रेन में M.B.B.S की पढ़ाई करने जाते है तो पहले वंहा,उन्हें वंहा की भाषा सिखाया जाता है 1वर्ष तक..और हमारे यंहा..)

●कभी आपने सोचा है अगर गर्मी में अगर आपको जैकेट पहना दिया जाय तो क्या होगा..आज यही साजिश चल रही है..जब हम अपने मातृभाषा बोल रहे होते है तो हमें एक अजीब भाषा थोप दिया जाता है...जिसके न शब्द से न वाक्य से बच्चे परिचित रहते है..।।
(इंग्लिश जरूरी है,मगर अनिवार्य नही..मगर आज टेक्नोलॉजी और AI ने इसके अनिवार्यता पे प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है..)

आपने सोचा है..नोबेल प्राइज जितने वाले अधिकांश लोग कौन है..??
   जरा सोचियेगा..🤔

आपको जानकर हैरानी होगी कि पिछले 10 वर्षों में 89441 सरकारी स्कूल बंद हो गए है..जंहा हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषा मे शिक्षा दिया जा रहा था..
 ★ 2024-2025 के एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 8000 ऐसे सरकारी स्कूल है जंहा पे एक भी नामांकन नही हुआ है..
65054 ऐसे सरकारी स्कूल है जंहा छात्रों की संख्या 10 से भी कम है..।

आखिर ये स्थिति क्यों है..??

क्या इससे हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषा की स्थिति दयनीय नही होगी..??

आखरी सवाल आप से..
 क्या आप अपने बच्चों को सरकारी या फिर उस स्कूल में पढ़ाएंगे जंहा  मातृभाषा में शिक्षा दी जा रही हो..?
-अगर आपका आर्थिक स्थिति थोड़ी भी अच्छी है तो आप उसे इंग्लिश मीडियम में ही पढ़ाएंगे..।।

मैं ये नही कहता कि अपने बच्चों को अंग्रेजी मीडियम में न पढ़ाये..क्योंकि इस ग्लोबलाइजेशन के दौड़ में अंग्रेजी जरूरी है..मगर अपने घर पर अपने बच्चों से अपने मातृभाषा में ही बात करें.. चाहे आपकी मातृभाषा कोई भी हो..।।(अपने बच्चों को सोचने वाला प्राणी बनाये)

आज जापान,जर्मनी,रूसिया,अमेरिका इतना विकसित क्यों है..??
क्योंकि वो अपने मातृभाषा में सोचता है..।

तो आज क्या है...??
10 जनवरी है..
हां, आज "विश्व हिंदी दिवस" है..।।

क्या आज इसकी प्रसांगिकता है..??
जरा सोचिए..🤔

बिल्कुल है..
क्योंकि  हम/आप आज भी हिंदी/क्षेत्रीय भाषा मे ही मनोरंजन का साधन ढूंढते है..(बुक,मूवी,इत्यादि)
•और आज तो सोशल मीडिया और AI ने तो इसकी प्रसांगिकता और बढ़ा दी है..😊।।


शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

क्या होती है खुशियां..

जब बिना शर्त के..
चेहरे पे यू ही मुस्कान आ जाये..।
ये होती है खुशियां..।

हम खुशियां ढूंढते है..
जबकि खुशियां बिखरी हुई है..
हमारे चारों और..
बस जरूरत है..
उसे समेटने की..।
मगर फुर्सत कंहा है..
किसी को समेटने की..।



फुर्सत ही नही..
बल्कि हमें..
खुशियों की पहचान ही कंहा है..?
हमें तो ये भी पता नही कि..
आखिर खुशियां होती क्या है..??

जब बिना शर्त के..
चेहरे पे यू ही मुस्कान आ जाये..।
ये होती है खुशियां..।

जब खिलते हुए फूलों को देखककर..
जब चहचहाते हुए चिड़ियों को सुनकर..
यू ही चेहरे पे मुस्कान आ जाये..
इससे बड़ी खुशियां और क्या है..।

जब बिना शर्त के..
चेहरे पे यू ही मुस्कान आ जाये..।
ये होती है खुशियां..।

Yoga for digestive system