जब बिना शर्त के..
चेहरे पे यू ही मुस्कान आ जाये..।
ये होती है खुशियां..।
जबकि खुशियां बिखरी हुई है..
हमारे चारों और..
बस जरूरत है..
उसे समेटने की..।
मगर फुर्सत कंहा है..
किसी को समेटने की..।
फुर्सत ही नही..
बल्कि हमें..
खुशियों की पहचान ही कंहा है..?
हमें तो ये भी पता नही कि..
आखिर खुशियां होती क्या है..??
जब बिना शर्त के..
चेहरे पे यू ही मुस्कान आ जाये..।
ये होती है खुशियां..।
जब खिलते हुए फूलों को देखककर..
जब चहचहाते हुए चिड़ियों को सुनकर..
यू ही चेहरे पे मुस्कान आ जाये..
इससे बड़ी खुशियां और क्या है..।
जब बिना शर्त के..
चेहरे पे यू ही मुस्कान आ जाये..।
ये होती है खुशियां..।

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