सोमवार, 27 जनवरी 2025

अपेक्षा बोझ नही,दायित्व है..

अपेक्षा हमेशा तकलीफदेह होती है..
हमारी उम्र ज्यों-ज्यों बढ़ती जाती है..
त्यों-त्यों लोगों की अपेक्षा हमसे बढ़ती जाती है..
और हम अपेक्षाओं के बोझ के तले दबते जाते है..।
हम चाहकर भी इन अपेक्षाओं का उपेक्षा नही कर सकते..
क्योंकि हमसे अपेक्षा हमारे माँ-बाप और हमारे हितैषी रखते है..
जिनके अपेक्षाओं को पूरा करना हमारा कर्तव्य होता है..।

मालूम नही कब ये अपेक्षा एक बोझ सा लगने लगता है..।
शायद ये अपेक्षा तब बोझ लगने लगता है,
जब हम किसी के अपेक्षाओं पे खड़े नही उतड़ते..।



वैसे भी माँ-बाप और चाहने वाले क्यों न अपेक्षा करें..
क्योंकि उन्होंने हमारा लालन-पालन किया है..
अगर वो हमारा लालन-पालन न करते तो हमारा क्या होता..??
अगर वो गर्भ में ही मेरा दमन कर दिया होता तो..??
इसीलिए हमसे अपेक्षा रखना उनका अधिकार है..
आखिर उनके अपेक्षा में कंही-न-कंही हमारा ही भला छुपा होता है..
सच कहूं तो माँ-बाप ही है,जो हमेशा हमारे कल्याण के बारे में सोचते है..।
मगर हम जब सक्षम नही होते तो उनके कल्याण में हमें,उनका स्वार्थ नजर आने लगता है..
वास्तविकता तो ये है कि..हम ही नाकाबिल है, जो अपने कमजोरियों को छुपाने के लिए उनके ऊपर दोषारोपण करते है..।।

आखिर आपसे कोई अपेक्षा क्यों न रखें..??
अगर आप किसी के अपेक्षा पे नही उतरते तो ये आपकी कमी है..अपनी कमियों को दूर करके कम-से-कम अपनों के अपेक्षा पे तो खड़े उतरे..।
दरसल हममें सबसे बड़ी ये कमी है कि हमें अपनी कमियां नजर नही आती..इस वजह से हमसे की गई अपेक्षा को जब हम पूरा नही कर पाते तो अपेक्षा हमें बोझ लगने लगती है..।।

आपसे सब अपेक्षा नही रखते..
जो आपके हितैषी होते है..
वही आपसे अपेक्षा रखते है..।।
जिस रोज लोग आपसे अपेक्षा रखना बंद कर दे तो सोच लीजिये.. 
आप या तो गलत दिशा पे जा रहे है,या फिर आप मृतप्राय हो चुके है..।।

अपेक्षा बोझ नही,दायित्व है..
अगर आप नाकाबिल होते है, तो आपको अपेक्षा हमेशा बोझ लगेगी..
अगर आपसे कोई अपेक्षा रखता है,या रखें हुए है..
तो मुस्कुराइए😊... 
की आप जिंदा है..
और जिंदा व्यक्ति कुछ भी कर सकता है..

रविवार, 26 जनवरी 2025

गणतंत्रता दिवस के मायने..

आज 26 जनुअरी है..
इससे बचपन की कुछ यादें जुड़ी हुई है..
हां सच में,कुछ ही यादें जुड़ी हुई है..।।

हमारी(~70% से ज्यादा की) परवरिश और शिक्षा वैसी जगह पर हुई, जंहा पे, शिक्षक को भी पूर्णतया 26 जनुअरी की महत्वता का पूर्ण ज्ञान नही था/है..।।




आज भी भारत की ~50% से ज्यादा आबादी को पता नही होगा कि हम 26 जनुअरी क्यों मनाते है..??
- स्कूली बच्चों के लिए बस एक उत्सव होगा..
- कामगार लोगों के लिए ये एक छुट्टी का दिन होगा..
( वैसे भी आज संडे है...90% से ज्यादा कामगार लोग मन ही मन बोल रहे होंगे साला एक छुट्टी मारा गया..क्योंकि हमें काम से प्यार नही बल्कि आर्थिक उपार्जन का एक साधन मात्र है)
-नेताओं के लिए झंडोत्सव का दिन होगा..

सच कहूं तो किसी के लिए ये खास दिन नही होगा..
ना ही सरकार चाहेगी की ये कोई खास दिन हो..सिर्फ छुट्टी के सिवा..।।

हम 26 जनुअरी क्यों मनाते है..??

आज भी भारत के बहुत बड़ी आबादी को स्वतंत्रता और गणतंत्रता के बारे में पता नही है..

आज के ही दिन हमारा संविधान लागू हुआ,और पूरा देश का वागडोर अब किसी के हाथ मे नही बल्कि संविधान के हाथ मे था..
और इस संविधान को शक्ति "हम भारत के लोग" से मिल रही थी..
हमारे संविधान निर्माताओ ने कई सपने देखें थे..कुछ साकार हुए,और कुछ को साकार करने का प्रयत्न कर रहे है,और कुछ का सिर्फ दिखावा कर रहे है..

हमारे संविधान निर्माताओं ने - सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय का सपना था..अभी तक कोई सपना पूरा नही हुआ है..

सामाजिक न्याय में बहुत हद तक सुधार हुआ है..मगर अभी भी आपको ढेर सारे ऐसे घटना देखने को मिल जाएगा जो आपको विचलित कर देगा..4 दिन पहले की बात है राजस्थान में एक दलित की शादी पुलिस और फ़ोर्स के सरंक्षण में करवानी पड़ी क्योंकि दूल्हा घोड़ी पर चढ़ करके जा रहा था..क्योंकि उस परिवार वर्षों पहले घोड़ी पे चढ़ने के वजह से दूल्हा की हत्या कर दी गई थी..

आर्थिक न्याय...अब आप ही बताए कि कितना न्याय हुआ है..
हां आज 90 के दशक जैसी गरीबी नही है..मगर आज आय की असमानता आजादी के बाद से बढ़ती ही जा रही है..
 " भारत के 1% लोगों के पास आय का 40.1% है,वंही
     भारत के 10% लोगों के पास आय का 77% है.."

राजनीतिक न्याय:- आज कोई आम आदमी M.L.A और M.Ps का चुनाव नही लड़ सकता क्योंकि आज इस चुनाव में जिनके पास पैसा और रुतबा है,उन्हें ही पार्टी टिकट देती है..भले ही आपने समाज मे कितना योगदान दिया है..इससे पार्टी को कोई मतलब नही है..

हमारा संविधान 5 तरह की स्वंतंत्रता की बात करता है:-
" विचार,अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना"
आज अगर आप किसी भी सरकार के खिलाफ गलत विचार और अपना अभिव्यक्ति रखते है..तो आप सरकार के रडार पर आए चाहे नही आये मगर आप उनके अनुयायी के राडार पर जरूर आ जाएंगे(वर्तमान हरेक राष्ट्र का यही हाल है)

-आज एक दूसरे के प्रति कितना विश्वास रह गया है हम-आप जानते ही है..
-धर्म और उपासना..आज बहुत सारे लोग धर्म और उपासना के बारे में कुछ नही जानते मगर इसके बारे में बड़ी-बड़ी बातें करते है..।।

फिर हमारा संविधान "प्रतिष्ठा और अवसर की समानता" की बात करता है..
अगर आप किसी सरकारी दफ्तर में जाते है तो कितना प्रतिष्ठा मिलता है..
जंहा तक अवसर की समानता की बात है..ये तो मजाक बन कर रहा गया है..
जब आप इसकी मांग करेंगे तो आपके ऊपर सिर्फ ज्यादती होगी..
हाल ही में बिहार में एक घटना घटी.. BPSC के अभ्यार्थियों ने री-एग्जाम की बात की क्योंकि 11 हज़ार छात्रों का एग्जाम दुबारा लिया जा रहा था..सरकार ठंड के रातों में पानी से भिंगो कर लाठी से बुरी तरह मारा..
(BPSC के 12 दिसम्बर वाले एग्जाम से 6%छात्र पास हुए, और 4 जनुअरी वाले एग्जाम से 20% से ज्यादा छात्र पास हुए)

कंहा है अवसर की समानता..??
अगर आप हिंदी भाषी राज्य में जन्म लेते है तो आपका औसत मासिक आय 9 हज़ार के आसपास होगा..
और आप गैर हिंदी भाषी राज्य में जन्म लेते है तो आपका मासिक आय ~27हज़ार होगा..

उत्तर भारत के स्कूल में, 10 में से शायद 2 ही बच्चे 10वी क्लास तक स्कूल में कंप्यूटर का इस्तेमाल कर पायेगा..
वंही दक्षिण भारत मे 10 में से 9 छात्र स्कूल में कंप्यूटर का इस्तेमाल कर पाते है..
कंहा है समानता..??

सरकार को क्या करना चाहिए:-
सरकार को कुछ नही भारत के हरेक नागरिक को अपने "मौलिक अधिकार"  और "मौलिक कर्तव्य"का ज्ञान अनिवार्य करना चाहिए..
जिस तरह सरकार ने "सर्व शिक्षा अभियान" चलाया उसी तरह सरकार को " सबको मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य का ज्ञान हो" का अभियान चलाना चाहिए..

मगर सरकार नही चलाएगी..
क्योंकि आज भारत मे कुछ चंद ही लोग है, जिन्हें मौलिक अधिकार का भान है,जब ये अपने अधिकार को लेकर सड़क पर उतड़ते है तो इन्हें दमन करने में सरकार को सहूलियत होता है..
अगर सबको मौलिक अधिकार का भान हो जाएगा तो सरकार तब कैसे दमन कर पायेगी..?

सभी को 26 जनुअरी को ढेर सारी शुभकामनाएं..
"गणतंत्रता दिवस" की शुभकामनाएं देकर आपको असमंजस में नही डालना चाहता..
क्योंकि कंही आप ये न सोचने लगे कि गणतंत्र क्या होता है..??


शुक्रवार, 24 जनवरी 2025

क्या चमत्कार होता है..

हम मनुष्य आज से ही नही बल्कि जब से सोचने-समझने की शक्ति हासिल किया, तब से ही चमत्कार शब्द का ईजाद किया..


क्या सच मे चमत्कार होता है..??
सच कहूं तो शायद नही..
प्राचीनकाल से ही मनुष्य चमत्कार की बात करते आया है..
जो चीज उन्हें समझ नही आता था,या फिर जो चीज वो नही कर पाते उसे वो चमत्कार मान लेते थे..

हम आज भी तो यही कर रहा है..
हमें जो चीज समझ मे नही आता उसे चमत्कार मान बैठते है..
और उसकी पूजा करना शुरू कर देते है..
हमारे समाज मैं कई ऐसे लोग मिल जाएंगे जो आज भी किसी चमत्कार के आस मैं बैठे हुए है..ऐसे लोगों के जीवन में कभी चमत्कार नही होता..

अगर चमत्कार होता है तो किसके साथ होता है..??
अगर आपने चमत्कार के बारे मे सुना है तो कुछ हद तक सही ही होगा..मगर आपने किसके बारे मे सुना है..
मुझे पूरा उम्मीद है कि आपने कोई भी चमत्कार किसी आम आदमी के जीवन मे घटित होने के बारे में नही सुना होगा..।।

चमत्कार अक्सरहाँ कठिन परिश्रमी और दृढ़निश्चयी व्यक्ति के ही जीवन में घटित होता है..दरसल ये कोई चमत्कार नही बल्कि उनके परिश्रम का फल होता है..
जब हम उस स्तर का मेहनत नही कर पाते तो उसे चमत्कार मान लेते है..।।

अगर चमत्कार होता तो,
वो किसी के भी जीवन में हो सकता था/है..।
मगर नही,
चमत्कार उन्हीं के जीवन में होता है,
जो अपने परिश्रम,साहस,दृढ़ता,धैर्य और विश्वास से अपने कर्तव्य पथ पे अड़िग रहते है..
अक्सरहाँ उन्ही के जीवन में चमत्कार होता है..।।

क्या आप भी अपने जीवन में चमत्कार लाना चाहते है..
तो कठिन परिश्रम,साहस,दृढ़ता, धैर्य और आत्मविश्वास की क्षमता को विकसित करें.. 
तब देखिए जिंदगी में चमत्कार कैसे होता है..
ये चमत्कार आपको नही बल्कि औरों को दिखेगा..।।

सच कह रहा हूँ..

सच कह रहा हूँ,
थक चुका हूं मैं,
सच कह रहा हूँ
मर चुका हूं मैं..।।

सच कह रहा हूँ,
मैं बस, जिंदा बोझ सा बन के रह गया हूँ..
एक चमत्कार के आस में जीवन व्यतीत कर रहा हूँ,
सच कह रहा हूँ,मर चुका हूं मैं....

सच कह रहा हूँ..
आधे से ज्यादा जिंदगी जाया कर चुका हूं मैं..
बची हुई उम्र को भी जाया करने की और बढ़ा जा रहा हूँ मैं..
सच कह रहा हूँ मैं,मर चुका हूं मैं...

अब कोई उम्मीद नही है किसी से..
सबके उम्मीदों पे,
पानी फेर दिया है मैंने..
कइयों के सपनों के साथ खिलवाड़ किया है मैंने..
अपने ही हाथों से,स्वयं का सत्यानाश किया है मैंने..
सच कह रहा हूँ,मर चुका हूं मैं..

सांस चलने से कोई जिंदा नही होता...
ना ही हांड-मांस की गठरी को ढोकर कोई जिंदा होता..
जिंदा लोगों की पहचान तो है,
नित नए परिवर्तन लाकर जिंदगी में आगे बढ़ते रहना..
सच कह रहा हूँ मैं,मर चुका हूं मैं..

मैं तो कब का मर चुका हूं...
बस सांसे चल रही है..
अगर जिंदा भी हूँ तो 1-2 लोगों के लिए..
अन्यथा मैं तो कब का मर चुका हूं..।।

सच कह रहा हूँ,मर चुका हूँ मैं..
अब लगता है,थक चुका भी हूँ..

क्या इसी तरह,मर के मरना है..
या फिर अच्छी तरह से मरना है..
ये भी नही निर्णय कर पा रहा हूँ मैं..
सच कह रहा हूँ मर चुका हूं मैं..

मैं इस तरह से मर कर मृत्यु को शर्मसार नही करना चाहता..
मैं तो इस तरह मरना चाहता हूं की, 
मृत्यु मेरी आलीगं को आतुर हो..
जब मेरा मृत्यु आलीगं करें..
तो मृत्यु भी हर्षित हो..
पूरा फ़िजा पुष्पित और ये जंहा सुगंधित है..।।

मैं इस तरह नही मरना चाहता..
मैं इस तरह असफलता का बोझ नही ढोना चाहता..

मैं अपनी असफलता को सफलता मैं परिवर्तित करूँगा..
मैं अपनी मृत्यु को उत्सव मैं परिवर्तित करूँगा..
मैं अपने प्रयास से स्वयं का निर्माण करूँगा..।

मैं सच कह रहा हूँ..
मैं फिर से एक नया शुरुआत करूँगा..
अपनी मृत्यु का बहुत विस्तार करूँगा..
मैं यू ही अब अपने जीवन को जाया नही करूँगा..
मैं स्वयं का निर्माण करूँगा..।।

सच कह रहा हूँ..
मैं फिर से एक शुरुआत करूँगा..।।



खुद को अकेले छोड़े

आज हम चारों और से घिरे हुए है,आंतरिक और बाह्य दोनों तरफ से घिरे हुए है..
हमें इस बात का भले ही अहसास न हो कि हमारे आस-पास कोई नही है,मगर वास्तविकता तो ये है कि हमारे आसपास एक पूरी आभासी दुनिया है..
आप इससे जबतक भागने की सोचेंगे तबतक बहुत देर हो चुकी होगी..क्योंकि आप इस दलदल में इतना फंस चुके होंगे कि, इसके बिना आप रह ही नही पाओगे..
आप दो कदम तो बाहर निकलने के लिए बढ़ाओगे..मगर आप फिर इसके और आकर्षित होकर इस दलदल में कूद जाओगे.।।

ये दलदल,ये आभासी दुनिया हमारे-आपके हाथ मे ही है..
ये स्मार्टफोन..
जरा सोचिए इसने आपसे क्या-क्या छीना है...??
इसने आपसे सबकुछ छीन लिया है..
आपका नींद,चैन,सुकून, आंनद.. सबकुछ..
अगर आप असफल है..तो इसका सबसे बड़ा योगदान इस स्मार्टफोन का भी होगा..।।
आपने आखरी बार कब 2 घंटे भी एकांकी समय गुजारा था..
शायद आपको याद नही होगा..

स्मार्टफोन तक तो ठीक था..अब तो स्मार्टवॉच भी अच्छी तरह से हमारी चैन छीन रहा है..

दुनिया पर वही राज करते है..
जिनके पास सोचने और समझने की शक्ति है..
आज स्मार्टफोन और सोशल मीडिया हमारे सोचने और समझने की शक्ति ही छीन रहा है..
हमारा अपना कोई विचार ही नही है..
जिसका विचार पसंद आये हम उसके साथ हो लेते है..मगर ये नही सोचते कि क्या सही है या क्या गलत..।

हमारी स्थिति सच मे गुलामों जैसी हो गई है...
• आपने अपना समार्टफोन इसलिए लिया होगा क्योंकि आपने कंही ऐड देखा होगा..
•आज हम ~60% से ज्यादा सामना कंही न कंही ऐड देख के ही लेते है..चाहे वो खाने का हो या फिर पहनने का..

आज हम खुद से कुछ कर ही नही रहे है,हमसे तो किसी न किसी रूप में कराया जा रहा है..

एक घंटा एकांतवास में गुजारे..
जंहा सिर्फ और सिर्फ आप ही हो..
आपका स्मार्टवॉच भी न हो..
देखिए जिंदगी में कैसा बदलाव आता है...।।



गुरुवार, 23 जनवरी 2025

सुभाष चंद्र बोस..

1905 के "स्वदेशी आंदोलन" के समय एक किशोर बंगाली क्रांतिकारियों का फोटो पेपर से काट कर दीवाल पे चिपकाता है..जिसको देखकर ब्रिटिश सरकार के कर्मचारी, उसके पिता ने घबराकर उसे फाड़कर फेंक दिया..

15 साल की उम्र में अपने माता को पत्र लिखता है-
"क्या हमारे देश की हालत बद-से-बदतर ही होती जाएगी, क्या भारत माता का कोई लाल अपने हितों को छोड़कर अपना पूरा जीवन माँ के प्रति समर्पित नही करेगा..??"

ये पत्र लिखने के बाद कुछ समय के बाद ही वो स्वंतंत्रता सेनानी हो गए... जिनके देशभक्ति को गांधीजी ने सर्वोत्तम बताया..

वो व्यक्ति नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे..


इनके पिता ने बड़े प्यार से इनका नाम सुभाष रखा जिसका मतलब अच्छा बोलने वाला होता है...उनके पिता ने कल्पना नही की होगी कि वह अपने भाषण क्षमता का इस्तेमाल वे लोगो मे क्रांतिकारिता का जोश भरने के लिए करेंगे..

1940 में 11वी बार गिरफ्तार करके बोस को  कलकत्ता के प्रेसिडेंसी जेल में डाल दिया वंहा तबियत अस्वस्थ होने के बाद उन्हें घर मे ही नजरबंद कर दिया गया.. 
17 जनुअरी 1941 को आधी रात को बीसवीं सदी की सबसे बड़ी साहसिक राजनीतिक पलायन किया..जबतक अंग्रेज़ को पता चला तबतक वो काबुल जाने के लिए पेशावर पहुंच गए..फिर वो मास्को गए वंहा से बर्लिन पहुंच गए..

"अगर किसी राष्ट्र के पास सैन्य ताकत नही है,तो वह अपनी आजादी को बचाने की उम्मीद नही रख सकता ।"

जर्मनी से वो फिर जापान पहुँचे और वंहा 'आज़ाद हिंद फौज' के नेता बन गए..इनके फ़ौज में ~50 हजार फ़ौज थे..
 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में सभी नेताओं को जब गिरफ्तार कर लिया गया था,तब आजाद हिंद फौज अपने चरम पर था..वो भारत के पूर्वी क्षेत्र में घुसने में कामयाब रही.

मगर तबतक जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया..कुछ महीनों के बाद बोस रुस के लिए निकले..ताइपे में ईंधन भराने के बाद ज्योहीं प्लैन हवा में उड़ा , आग लग गई..जिसका कोई साक्ष्य नही है..
मगर बोस कंहा गए पता नही चला..
इस घटना पे जॉर्ज ऑरवेल कहते है- दुनिया के लिए ये अच्छा हुआ।

इसके लिए 3 आधिकारिक आयोग बने,आखरी आयोग 2006
में बना जिसमे मान लिया गया कि उनकी मृत्यु 1945  में ही हो गया था..।।
भारत के बाहर उन्हें जो प्रतिष्ठा मिली थी.. 
उनके मृत्यु के बाद भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनका असर बना रहा..

1921 में अपने भाई शरत को पत्र में लिखा था-

"जिंदगी में कोई संघर्ष न हो,
तो उसका आधा मजा चला जाता है ।"


मंगलवार, 21 जनवरी 2025

नास्त्रेदमस

"नास्त्रेदमस" का नाम सुनते ही आपके जेहन में क्या आता है..
एक भविष्यवक्ता, जिसके कई भविष्यवाणी सच हुए है..।

इसके अलावा हममें से शायद ही किसीको पता होगा कि उन्हें ने मानव समुदाय के लिए और क्या किया...।।



हममें से अक्सरहाँ लोगों को "यूरोप के प्लेग त्रासदी"(ब्लैक डैथ) के बारे में जानकारी होगी..
ये त्रासदी ऐसा था कि, यूरोप की आबादी 50% से कम हो गया था..

ये समय 1528 का था जब "नास्त्रेदमस" ने इस त्रासदी में अपने पत्नी और 2 बच्चों को खोया..
इसके बाद वो प्लेग को समझने का प्रयास करने लगे...
औरों लोगों को समझाने का प्रयास किया कि- ये कोई भगवान का कहर नही बल्कि एक बीमारी है...
लोगों में अंधविश्वास इतना था कि, लोग घाव के जगह चूहे को पकड़कर सहलाते थे..उनका विश्वास था कि इससे घाव ठीक हो जाएगा..।।

नास्त्रेदमस ने अपने आस-पास अध्ययन करने पर पाया कि-
प्लेग का सबसे बड़ा कारण अस्वच्छता है..
उन्होंने ही सर्वप्रथम यूरोप के लोगों को पानी उबालना सिखाया और उस पानी का इस्तेमाल करना सिखाया..

उन्होंने प्लेग से मरे रोगी को अच्छी तरह दफ़नानं सिखाया..
उन्होंने पूरे यूरोप को स्वछता का पाठ सिखाया..
कुआँ,नाला,तालाब,नदी को स्वछता के प्रति लोगों को जागरूक करने में सफल रहे..

उनके इस प्रयास के कारण उन्हें यूरोप में प्लेग का डॉक्टर के नाम से लोग पुकारने लगे..
मगर हम उन्हें किस रूप में जानते है..।।

आज हममें से कई लोग यूरोप की स्वछता की बात तो करते है..
मगर इसके पीछे जिसका अहम योगदान था उसके बारे में हम नही जानते...।।

"कोई जरूरी नही की हम सबकुछ जाने ही..
जरूरी ये है कि हम जिसे जाने,उसे अच्छी तरह जाने..."





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