मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

सबको अपनी कहानी..

सबको अपनी कहानी खुद लिखनी होती है.
मुझे भी अपनी कहानी खुद लिखनी है..।
भले ही वक़्त अभी साथ न दे..
भले ही अभी कलम साथ न दे..
या फिर भले ही किस्मत अभी साथ ना दे..।
कहानी तो मन-मस्तिष्क में रच चुकी है..
बस उसे धरातल पल कलम और कागज से उकेरना है..।
सबको अपनी कहानी खुद लिखनी होती है.
मुझे भी अपनी कहानी खुद लिखनी है..।


चाहे बार-बार जिंदगी में रुकावट क्यों न आये..
किसी-न-किसी बार रुकावट को पार कर ही जाऊंगा..।
पार करने को मनुष्य से अब रह ही, क्या गया है..
चाहे हिमालय की चोटी हो,या हो समुन्द्र की गहराई..
या फिर पृथ्वी से दूर चंद्र और मंगल ही क्यों न हो..
अब कोई अछूता न रहा है...।
बस जरूरत है एक दृढनिश्चय इच्छा शक्ति की..
और कठिन परिश्रम की..।
कहानी खुद-खुद बन जाएगी..
और वक़्त,कलम,कागज एकसाथ आकर.. 
नई कहानियां बुन देंगी..।
सबको अपनी कहानी खुद लिखनी होती है.
मुझे भी अपनी कहानी खुद लिखनी है..।



रविवार, 28 दिसंबर 2025

फर्क ये नही पड़ता...

फर्क ये नही पड़ता है, कि,आप है कौन..?
फर्क ये पड़ता है कि,आप है कौन..

फर्क ये नही पड़ता कि आप कंहा से आये..
फर्क ये पड़ता है कि आप है कंहा..

फर्क ये नही पड़ता कि आपने कैसी जिंदगी जिया..
फर्क ये पड़ता है कि आप कैसी जिंदगी जी रहे है..।

फर्क ये नही पड़ता कि,आप कितनी दफा गिरे..
फर्क ये पड़ता है कि आप गिर के उठे की नही..

फर्क ये नही पड़ता कि लोग क्या सोच रहे है..
फर्क ये पड़ता है कि अब लोग क्या सोच रहे है..।

फर्क ये नही पड़ता कि,आप क्या सोच रहे है..
फर्क ये पड़ता है कि आप सच मे सोच रहे है..।

फर्क ये नही पड़ता कि,दुनिया कैसी है..
फर्क ये पड़ता है कि, दुनिया ऐसी है.।

फर्क ये नही पड़ता है कि,आप है कौन..
फर्क ये पड़ता है कि,आप है कौन..।


गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

प्यार की पांति..मैं जब तुम्हें..

मैं जब तुम्हें, कुछ लिखता हूँ,तो..
मेरे हाथ थरथराते है..
और हृदय घबराता है..।
इसलिय नही की..
मैं गलत कर रहा हूँ..।
इसलिए कि..
कंही मेरी लेखनी, तुम्हें पसंद न आये..।

मैं जब तुम्हें कुछ कहना चाहता हूं..
तो मेरे लब थरथराते है,
और मेरा शरीर कंपकपाता है..।
इसलिए नही की मैं तुमसे डरता हूँ,
इसलिय की..
तुम मुझे देख के असहज न हो जाओ..।

मैं जब तुम्हारे करीब आता हूँ..
तो खुद को निर्जीव पाता हूँ..
इसलिय नही की..
मेरी सांसें रुक जाती है..।
इसलिय की..
मेरी सांसे तुमसे चल रही होती है..।

मैं जब तुम्हें..



बुधवार, 24 दिसंबर 2025

खालीपन..

मैं जब-जब खुद को खाली महसूस करता हूँ..

तो मैं,तुम्हारे करीब आ जाता हूँ..

खुद को भरने के लिए..।


तुममें समाहित अथाह ऊर्जा में से..

कुछ ऊर्जा लेकर..

फिर से खुद को ऊर्जावान बनाने के लिए..

मैं तेरे करीब आ जाता हूँ..।


मैं जब भी खुद को खाली महसूस करता हूँ..

मैं तुम्हारे करीब आ जाता हूँ...।




प्यार की पांति..मैं तुमसे

मैं तुमसे मिलना चाहती हूं..
मगर कैसे..
तुम समुंद्र हो तो मैं नदी हूँ..
तुम वटवृक्ष हो तो मैं खजूर हूँ..
तुम गंगा की मैदान हो,तो मैं थार का रेगिस्तान हूँ..।
भला मैं तुमसे कैसे मिल सकता हूँ..।

मैं कुछ नही जानती..
मैं सिर्फ तुमसे मिलना चाहती हूँ..।।

मगर कैसे..??
कैसे समझाऊ तुम्हें..
तुम्हारी सुबह की शुरुआत सूर्य की मीठी तपिश से शुरू होती है,
और मेरी सुबह की शुरुआत,सूर्य की लालिमा की मासूमियत के साथ..।
तुम्हारी रात जब होने को होती है,तो मेरी सुबह होने को होता है..।
तुम्हें अपने चाँद-सितारे को देखने को लाखों खर्च करने होते है,और मेरे चाँद- सितारे यू ही आसमाँ में भटकते मिल जाते है..।।
तुम चलती हो अपने दस हज़ार स्टेप पूरा करने को,
और मैं चलता हूँ,अपने लक्ष्य को पाने को..।
अब तुम्हीं बताओ..
मैं भला कैसे...
तुमसे मिल सकता हूँ..।



क्या सोच रहे हो तुम..

क्या सोच रहे हो तुम..??
यही सोच रहा हूँ कि..
क्या सोच रहा हूँ मैं..।

सच कहूं तो..
कुछ तो सोच रहा हूँ मैं... 
मगर अफसोस क्या सोच रहा हूँ..
यही सोच-सोच कर..
कुछ तो सोच रहा हूँ मैं..।

क्या सोच रहा हूँ..
अब मत ये पूछना..
क्योंकि.. 
यही सवाल तो मैं खुद से..
वर्षों से पूछता आ रहा हूँ की..
क्या सोच रहा हूँ मैं..??

क्या सोच रहा हूँ मैं..??
या फिर क्या खोज रहा हूँ मैं..??
जैसे कस्तूरी मृग भटकता है..
वैसे ही शायद भटक रहा हूँ मैं..।
बस मालूम नही क्यों भटक रहा हूँ मैं..
शायद यही सोच-सोच कर..
कुछ तो सोच रहा हूँ मैं..।।

शायद उस "मैं" के बारे में ही सोच रहा हूँ मैं..
जिस 'मैं" का भान नही है..मुझको..।

जिस मैं से ये ब्रह्मांड है..
वो "मैं",
मैं कैसे हो सकता हूँ..??
शायद यही सोच-सोचकर
कुछ तो सोच रहा हूँ मैं..।।



प्यार की पांति..उसने कहा..

उसने कहा..
मेरे लिए ही सही..
काबिल तो बनो..।
कबतक यू ही..
खुद से मुँह फेरते रहोगे..
कबतक यू ही सबसे मुँह फेरते रहोगे..।

उस काबिल तो बनो..
जिससे अपना मुँह,
मुझको दिखा तो सको..।

उसने कहा..
सिर्फ तुम ही नही गिरे हो..
हरेक रोज कई गिरते है..।
मगर तुम उन जैसा तो न बनो..
जो गिर के उठ न सके..।
मेरे लिए ही सही..
काबिल तो बनो..।

उसने कहा..
कबतक जिंदगी यू ही अकेले काटते रहोगे..
कबतक यू ही सबसे मुँह फेरते रहोगे..
कंही ऐसा न हो..
की ये एकांकीपन तुमसे ही मुँह फेरने लगे..।
मेरे लिए ही सही..
काबिल तो बनो..।

उसने कहा..
मैं भी..भला कबतक तुम्हें झकझोरता रहूंगा..
एकदिन मैं भी कंही थक जाऊंगा..
तो फिर मेरा क्या होगा..??
मेरे लिए ही सही..
काबिल तो बनो..।

उसने कहा..
क्या कहा..??
उसने कहा..
बहुत कुछ कहा..
मगर मैं,नासमझ..
कुछ समझ न पाया..
उसने कहा..
क्या कहा..??


Yoga for digestive system