रविवार, 11 जनवरी 2026

नजरिया..काम(ऊर्जा) और वासना(विस्तार)..

 "आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा 
     कामरूपेण कौन्तेय दुष्परेणानलेन च ।।"
भगवद्गीता के अनुसार- ज्ञानियों का ज्ञान इस काम रूपी शत्रु के द्वारा ढका हुआ है।यह कामवासना कभी न पूर्ण होने वाली और अग्नि के समान जला डालने वाली है।।


काम और वासना शब्द ज्योहीं हमारे जेहन में आते है..हम कुछ और ही सोचने लगते है..।
भारतीय दर्शन के अनुसार- इस प्रकृति का सृजन "काम(ऊर्जा)"से हुआ है..और इस ब्रह्मांड का प्रसार "वासना" से हुआ है...।

मगर आज इंसान की अधोगति का कारण काम और वासना ही है..
ये कैसी विड़बना है..??

"काम"
भारतीय संस्कृति में काम को जीवन का आवश्यक हिस्सा माना गया है..
सामन्यतः इसका अर्थ है-इच्छा,कामना और सुख की प्राप्ति।इन्द्रियों के माध्यम से संसार का आंनद लेना है।इसमें कला,सौंदर्य,,प्रेम और पारिवारिक सुख सब सम्मिलित है..।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते है-
"धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोsस्मि भरतर्षभ।"
- हे अर्जुन , मैं भूतों(प्राणियों) में धर्म के अनुकूल काम हूँ..।

 " काम ऐष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
   महाशनो महापापमा विद्ध्येनमिह वैरिणम ।।"
जब रजोगुण से उत्पन्न होने वाला यह काम ही है जो क्रोध बनता है।यह कभी तृप्त न होने वाला और बड़ा पापी है..।।

अगर काम(ऊर्जा) का सही से इस्तेमाल किया, तो आप.. ईश्वर तत्व बन जाएंगे,अगर सही से नही इस्तेमाल किया तो आप स्वयं के साथ-साथ सबके शत्रु बन जाएंगे..।


-ये काम(ऊर्जा)कभी समाप्त नही होता,बस इसका स्वरूप बदलता है..
मगर हम ज्ञान के अभाव में काम का एक ही स्वरूप को समझते है..।जो दुःखदायी और पीड़ादायी है..।
हम भूल जाते है की..अगर काम का सही से इस्तेमाल किया तो सृजन होगा,अगल गलत तरीके से इस्तेमाल किया तो स्वयं के साथ दूसरों का भी विनाश होगा..और आज वही हो रहा है..लोग काम का दुरुपयोग ही कर रहे है..मगर कुछ लोग है जो इसके ऊर्जा का सही से सदुपयोग करके सृजन कर रहें है..।।

● वही सिंगमंड फ्रायड ने काम को "Libido"(जीवन ऊर्जा) कहा है,जो मनुष्य को सृजन(creation) और सुख की और ले जाता है..अगर इस ऊर्जा का सही से इस्तेमाल नही किया तो ये विनाशकारी हो जाता है..।।
 
"वासना"
जिस तरह काम ऊर्जा है,उसीतरह उसके विस्तार का भाव "वासना" है..।
जंहा काम होगा वंहा वासना होगा ही..
बिना काम के वासना का कोई अस्तित्व नही है..।
जब तक दिए में तेल न हो तबतक दिया कैसे जलेगा..जब दिया जलेगा ही नही तो उसके प्रकाश का विस्तार कैसे होगा..।।

हम अक्सरहाँ काम और वासना को एक ही समझते है..मगर दोनों एक दूसरे से अलग होते हुए भी भिन्न नही है..जैसे दिए का जलना काम है,तो उसकी रोशनी वासना है..।

वासना क्या है-
"महोपनिषद" के अनुसार-
"दृढ़भावनया त्यक्तपुर्वापरविचारणं।
  यदादानम पदार्थस्य वासना सा प्रकीतिर्ता।।"
" जब मनुष्य बिना किसी सही गलत के विचार के ,केवल तीव्र मानसिक संस्कार के वशीभूत होकर किसी वस्तु को ग्रहण करता है या उसकी और भागता है,तो उसे ही वासना कहता है..।"
ये उसी तरफ भागता है..जिस तरफ हमारी काम(ऊर्जा) उद्विग्न होता है..।

मनुस्मृति के अनुसार वासना कभी खत्म नही होता..
"न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
 हविषा कृष्ण वत्यमैर्व भूय ऐवाभिवर्धते ।।"
काम की पूर्ति करते रहने से वासना कभी शांत नही होता,बल्कि ठीक उसी प्रकार बढ़ता है,जिस तरह अग्नि में घी डालने से आग धधकने लगता है।

काम और वासना जिंदगी का ज्योतिपुंज है,बिना इसके,जीवन का हम कल्पना नही कर सकते..।
अब निर्भर हम पे करता है..की हम इस ज्योतिपुंज को किस और ले जा रहे है..अगर हम अपने काम को उन्नति की और ले जा रहे है,तो वासना इसका विस्तार करेगा..अगर अवनति की और ले जा रहे है,तो भी वासना इसका विस्तार करेगा..।

क्या हम काम और वासना से छुटकारा पा सकते है..??
तो इसका जबाब ये है कि,क्या हम बिना सूर्य के जीवन व्यतीत कर सकते है..??
काम एक ऊर्जा है,और बिना ऊर्जा के जीवन का कोई अस्तित्व नही है..हां हम अपने ऊर्जा का स्वरूप बदल कर एक स्तर से दूसरे स्तर पर पहुंच सकते है..उस परम ब्रह्म ऊर्जा में खुद को समाहित कर सकते है..जिसे हम मोक्ष कहते है..।
ऊर्जा कभी खत्म नही होती,बल्कि उसका स्वरूप बदलता रहता है..। 
इसलिय अपने कामवासना से भागें नही बल्कि उसे सही दिशा में रूपांतरित करके अपना और समाज का कल्याण करें..।

इसे रूपांतरित कैसे करें..??
इसका जबाब संभव नही है,क्योंकि हम सब का ऊर्जा स्रोत तो एक ही है,मगर उसका पथ अलग-अलग है..इसलिय सबके जबाब अलग-अलग होंगे..
हां हम स्रोत के आधार पर ये कह सकते है कि ऊर्जा रूपांतरित करने का एक माध्यम ईश्वरभक्ति है..जो सबके लिए है।
तो ईश्वर का ध्यान करें,ऊर्जा रूपांतरित जरूर होगा..।




शनिवार, 10 जनवरी 2026

विश्व हिंदी दिवस..

आज क्या है..
कुछ तो नही..??
हां हमें किसी चीज का तब अहसास होता है,जब वो चीज हमारे जिंदगी पे प्रभाव डालती हो..।
सो आज कुछ ऐसा दिन नही है,जो हमारे जिंदगी पे प्रभाव डालता हो..।
सही कहा आपने..।
क्योंकि मैंने कई हिंदी अखबार खंगाले मुझे लगा इसमें कुछ कंटेंट मिल जाये मगर नही मिला..इसलिय मैंने राष्ट्रीय संस्करण का न्यूज़पेपर पढ़ा..मगर अफसोस उसमें भी कुछ पढ़ने को नही मिला..।।

एक पुस्तक है "सेपियंस" युवाल नोवा हरारी का..
वो कहते है..
पृथ्वी पे जीवन का अस्तित्व ~450 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ..
• और 3 लाख वर्ष पूर्व "होमो(homo)" परिवार का उद्भव हुआ..
 उस परिवार में होमो ईरेक्टस, होमो निएंडरथल ,होमो डेनिसोवा, होमो ईरगस्टर इत्यादि थे..आज सब विलुप्त हो गए.. सिर्फ "होमो सेपियंस" बचे हुए है..
जबकि होमो सेपियंस की औकाद निएंडरथल के सामने कुछ भी नही था..
जैसे खली के सामने राजपाल यादव😊..।।

मगर फिर ऐसा क्या हुआ.. कि सब विलुप्त हो गए और सिर्फ होमो सेपियंस बचे..??

नोवा हरारी कहते है-इसके पीछे संज्ञानात्मक(cognitive) क्रांति का अहम योगदान है..साधारण शब्द में कहे तो  भाषा का विकास ही इन्हें अबतक जीवित रखा है,यानी हम सब आज इसलिए है क्योंकि हमारी एक भाषा है..जो हमें एक दूसरे से जोड़ती है..और हमें सोचने में मदद करती है..।

अन्य प्रजातियां कुछ शब्दों तक ही सीमित रही जिस कारण उनका अस्तित्व आज नही है...।।

यानी भाषा का हमारे जीवन मे अहम योगदान है..
हम आज इसलिए है क्योंकि हमारे पूर्वजों ने भाषा का ईजाद किया..।

और आज " विश्व हिंदी दिवस " है..😊


इसे मनाने की शुरुआत मनमोहन सिंह ने पहली बार 2006 मे किया..
क्योंकि 10 जनवरी 1975 को नागपुर में पहली बार विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया गया था..जिसमें 30 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था..।
इस दिन को यादगार बनाने और पूरे विश्व मे हिंदी के प्रसार के लिए प्रत्येक साल 10 जनवरी को "विश्व हिंदी दिवस" मनाते है..।

इस बार का थीम है-
" हिंदी पारंपरिक ज्ञान से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक"

हिंदी भाषा का सफर..
आज से 300 साल पहले तक हिंदी,हिंदी नही था,इसे खड़ी बोली के रूप में जाना जाता था..और आज ये बोली से भाषा बन गया.।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान..
1915 तक हमारा स्वतंत्रता आंदोलन वकीलों का आंदोलन था..मगर हिंदी ने इसे जन आंदोलन बनाया और देश के हरेक छोड़ तक आंदोलन को पहुँचाया.. हिंदी ने देश के लोगों को जोड़ने का काम किया..।।

क्या आपको पता है..
हिंदी को राजभाषा बनाने की मांग किसने की..??
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हिंदी को राजभाषा बनाने की मांग उनलोगों ने किया जिनकी मातृभाषा हिंदी नही था..
गुजरात से - महात्मा गांधी,के.एम. मुंशी, स्वामी सत्यानंद सरस्वती
महाराष्ट्र से- बाल गंगाधर तिलक,सावरकर
पंजाब से -लाला लाजपत राय
बंगाल से- केशव चंद्र सेन से लेकर सुभाषचंद्र बोस तक ने की..
दक्षिण भारत मे हिंदी प्रचार प्रसार के लिए गांधी जी ने..
"दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा'' का स्थापना किया..
यानी पूरे भारत से हिंदी को समर्थन मिल रहा था..।
14 सेप्टेंबर 1949 को संविधान सभा ने ध्वनिमत से इसे राज्यभाषा के रूप में स्वीकार किया..(इस कारण 14सेप्टेंबर को हिंदी दिवस मनाते है)

वर्तमान में हिंदी की स्थिति..
1991 के जनगणना के अनुसार 39% लोग हिंदी बोलते थे..(1st लैंग्वेज)
  2001 के जनगणना के अनुसार 41% लोग हिंदी बोलते थे..और
  2011 के जनगणना के अनुसार 43.6% लोग हिंदी बोलते थे..
   दूसरे स्थान पर बंगला है(9%)
   तीसरे स्थान पर मराठी(8.7%),और चौथे स्थान पर तेलगु(8%)
  और अंग्रेजी बोलने वाले(0.02%) 2लाख 70हजार लोग है.
वर्तमान में लगभग 60करोड़ से ज्यादा लोग भारत मे हिंदी बोलते है..।

विश्व मे हिंदी की स्थिति..
क्या आप बता सकते है..विश्व मे हिंदी का कौन सा स्थान है..??
 
UNESCO के सर्वेक्षण के अनुसार विश्व मे 7115 भाषा है..
 • 150 भाषा ऐसी है,जिसे बोलने वालों की संख्या 10 लोगों से कम है..
 • 5.5-6 हजार ऐसी भाषा है जिसे बोलने वालों की संख्या 1 लाख से कम है..।
 ● 800 करोड़ आबादी वाले विश्व मे हिंदी का स्थान तीसरा है..लगभग 8% लोग हिंदी बोलते है..।
  • पहले स्थान पर अंग्रेजी(16%) दूसरे स्थान पर मंदारिन(14%) है..।।

अंग्रेजी पहले पायदान पर क्यों है..??
   सोचिए..🤔

हिंदी विश्व में तीसरा स्थान रखने पर भी दयनीय स्थिति क्यों है..
  (ये सभी भारतीय भाषाओं के साथ है..तेलगु,तमिल,मराठी...

-★जिस देश मे आधी आबादी हिंदी बोलने वाला हो..और मात्र 0.02% अंग्रेजी बोलने वाला हो..उस देश के हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में हिंदी या क्षेत्रीय भाषा मे जिरह और अपील नही किया जा सकता है..
अगर आप करते है तो उसे खारिज कर दिया जाता है..।
-सबसे पहले इस व्यवस्था को खत्म किया जाय..।

प्राथिमक शिक्षा मातृभाषा में अनिवार्य किया जाय..
(कम से कम 5वी कक्षा तक)
(UNESCO के शोध में पाया गया है वही देश तकनीकी रूप से अग्रणी है जंहा शिक्षा मातृभाषा में दी जा रही है..।)
(भारत से जब छात्र जर्मनी,रशिया,यूक्रेन में M.B.B.S की पढ़ाई करने जाते है तो पहले वंहा,उन्हें वंहा की भाषा सिखाया जाता है 1वर्ष तक..और हमारे यंहा..)

●कभी आपने सोचा है अगर गर्मी में अगर आपको जैकेट पहना दिया जाय तो क्या होगा..आज यही साजिश चल रही है..जब हम अपने मातृभाषा बोल रहे होते है तो हमें एक अजीब भाषा थोप दिया जाता है...जिसके न शब्द से न वाक्य से बच्चे परिचित रहते है..।।
(इंग्लिश जरूरी है,मगर अनिवार्य नही..मगर आज टेक्नोलॉजी और AI ने इसके अनिवार्यता पे प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है..)

आपने सोचा है..नोबेल प्राइज जितने वाले अधिकांश लोग कौन है..??
   जरा सोचियेगा..🤔

आपको जानकर हैरानी होगी कि पिछले 10 वर्षों में 89441 सरकारी स्कूल बंद हो गए है..जंहा हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषा मे शिक्षा दिया जा रहा था..
 ★ 2024-2025 के एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 8000 ऐसे सरकारी स्कूल है जंहा पे एक भी नामांकन नही हुआ है..
65054 ऐसे सरकारी स्कूल है जंहा छात्रों की संख्या 10 से भी कम है..।

आखिर ये स्थिति क्यों है..??

क्या इससे हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषा की स्थिति दयनीय नही होगी..??

आखरी सवाल आप से..
 क्या आप अपने बच्चों को सरकारी या फिर उस स्कूल में पढ़ाएंगे जंहा  मातृभाषा में शिक्षा दी जा रही हो..?
-अगर आपका आर्थिक स्थिति थोड़ी भी अच्छी है तो आप उसे इंग्लिश मीडियम में ही पढ़ाएंगे..।।

मैं ये नही कहता कि अपने बच्चों को अंग्रेजी मीडियम में न पढ़ाये..क्योंकि इस ग्लोबलाइजेशन के दौड़ में अंग्रेजी जरूरी है..मगर अपने घर पर अपने बच्चों से अपने मातृभाषा में ही बात करें.. चाहे आपकी मातृभाषा कोई भी हो..।।(अपने बच्चों को सोचने वाला प्राणी बनाये)

आज जापान,जर्मनी,रूसिया,अमेरिका इतना विकसित क्यों है..??
क्योंकि वो अपने मातृभाषा में सोचता है..।

तो आज क्या है...??
10 जनवरी है..
हां, आज "विश्व हिंदी दिवस" है..।।

क्या आज इसकी प्रसांगिकता है..??
जरा सोचिए..🤔

बिल्कुल है..
क्योंकि  हम/आप आज भी हिंदी/क्षेत्रीय भाषा मे ही मनोरंजन का साधन ढूंढते है..(बुक,मूवी,इत्यादि)
•और आज तो सोशल मीडिया और AI ने तो इसकी प्रसांगिकता और बढ़ा दी है..😊।।


शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

क्या होती है खुशियां..

जब बिना शर्त के..
चेहरे पे यू ही मुस्कान आ जाये..।
ये होती है खुशियां..।

हम खुशियां ढूंढते है..
जबकि खुशियां बिखरी हुई है..
हमारे चारों और..
बस जरूरत है..
उसे समेटने की..।
मगर फुर्सत कंहा है..
किसी को समेटने की..।



फुर्सत ही नही..
बल्कि हमें..
खुशियों की पहचान ही कंहा है..?
हमें तो ये भी पता नही कि..
आखिर खुशियां होती क्या है..??

जब बिना शर्त के..
चेहरे पे यू ही मुस्कान आ जाये..।
ये होती है खुशियां..।

जब खिलते हुए फूलों को देखककर..
जब चहचहाते हुए चिड़ियों को सुनकर..
यू ही चेहरे पे मुस्कान आ जाये..
इससे बड़ी खुशियां और क्या है..।

जब बिना शर्त के..
चेहरे पे यू ही मुस्कान आ जाये..।
ये होती है खुशियां..।

सपने..

सपने अगर टूटते है..
तो उसे जोड़ना.. 
हमारे ही हाथों में होता है..।
सपने हमेशा हमारे ही होते है..
हां..
कभी-कभी हम दूसरों के नजरों से देखते है..
और वो हमारे सपने हो जाते है..।


सपने अगर टूटते है..
तो उसे जोड़ना..
हमारे ही हाथों मे होता है..।
सपने टूटकर इतना कभी नही बिखरता..
जिसे फिर से समेट न पाए..
बस जरूरत होती है..
फिर से बिखरे सपने संजोने का..।।

सच होते है सपने..
सपने अगर हो अपने..।
अपने सपने को साकार कर..
खुद को तुम स्वीकार कर..
सच होते है सपने..।

सपने अगर टूटते है..
तो उसे जोड़ना..
हमारे ही हाथों में होता है..।

वेदना..

एक समय था..जब इस शब्द को सुनकर गौरवान्वित महसूस करता था,ये शब्द मेरे शरीर के हरेक कोशिकाओं को तरंगित कर दिया करता था..
ये शब्द मुझे औरों से बिल्कुल अलग अहसास करवाता था..और मुझसे ढेर सारा काम करवाता था..जब घंटों बैठे-बैठे आंखें थक कर बंद होने लगती..दिमाग कहता अब बस करो..सर टेबल पर रखकर आंख बंद करता तो सहसा इन शब्दों का तरंग शरीर के अंदर गूँजता और मुझे ऊर्जावान बना कर, फिर से पढ़ने और पन्ने पलटने को हिम्मत देता..।
मगर...
पिछले एक सालों से ये शब्द सुनते ही मानों ऐसे लगता है कि..
कोई गाली दे रहा है..जैसे शरीर मे कोई सुई चुभो रहा है..।


उस शब्द को एकीकार न कर पाने के कारण..
जिंदगी लक्ष्यविहीन हो गई है..
अब पता ही नही है कि करना क्या है..।
जबतक वो साथ था,तो पता था कि करना क्या है..
मगर जब से उसका साथ छुटा है तब से जिंदगी का उद्देश्य ही अब पता नही चलता..।

चलते फिरते उस शब्द से कही भी सामना होता है,तो ऐसे लगता है जैसे वो गाली दे रहा है..जैसे वो सुई चुभो रहा है..।।

क्या उसे मात देने का मेरे पास कोई और रास्ता नही है..??
क्या उस शब्द से सामने करने का कोई रास्ता नही है..??
रास्ते तो हमेशा एक-न-एक जरूर होता है..
मगर पहले से आसान नही कठिन होता है..
जितनी देर करोगे..उसका सामना करने में और कठिनाई आएगी..।
इसलिय अब खड़ा हो..
भेदने दो उसको..
चुभोने दो उसको..
यही दर्द तो उसे परास्त करने में मदद करेंगे..।
मंजिल जितनी दूर होगी..
अनुभव उतना ज्यादा होगा..
उन सारे अनुभवों से परास्त करने का अपना मजा होगा..।।

प्यार की पांति..मन करता है..

मन करता है..
हरेक रोज..
तुम्हे कुछ लिखा करू..
मन कहता है..
हरेक रोज..
तुम्हें कुछ कहा करू..।
फिर यही मन कहता है..
छोड़ दे यार..
उन्हें बुरा लगेगा..।


मन करता है..
तुम्हारे साथ..
ढेर सारे..
गप्पे लड़ाऊँ...।
मन करता है..
तुम्हारे साथ..
ढेर सारे.. 
वक़्त बिताऊँ..।

मगर फिर..
वो कहती है..
मन को संभालो..
मन का क्या है..
वो तो चंचल..
बंदर है जी..।

वो कहती है..
जो है..मन में..
मन में, दबा लो..
और एक कब्रगाह बना लो..
और उसपे अश्रु बहाओ..।

मन का क्या है..
ये तो स्वछंद..
उन्मुक्त परिंदा है जी..।
इसको संभालों..
नही तो सच कहता हूं..
तुम्हारी भी कब्रगाह बन जाएगी..😀

मन करता है..
नहीं-नही जी..😊
कुछ नही करता..।।

न जाने ये मन चाहता क्या है..??

मन की भाषा, 
मन ही समझें..
अब हम..
कंहा से लाये..
वो मन..
जो इस मन की..
भाषा को समझें..।



संस्मरण..आखिर क्यों..??

कुछ घटना,कुछ वाकया मन मष्तिष्क पर छाप छोड़ देती है..
और सोचने को मजबूर कर देती है..।
आज शाम 3 दृश्य ने सोचने को मजबूर कर दिया..।

पहला दृश्य..
समुंद्र के किनारे टहलते टहलते मैं आखरी छोर तक चला गया जंहा कोई नही था बिल्कुल शांति थी..।मेरी नजर उन दो कुत्तों पे पड़ी जो समुंद्र के लहर से 10-11 फ़ीट की दूरी पर पाँव से गड्ढे खोद रहे थे..मुझे लगा मस्ती कर रहे है..।मगर जब करीब गया तो देखा कि ये दोनों कुते गड्ढे खोदने के बाद रेत से रिस कर आ रहे पानी का भरने का इंतजार करते है,जब पानी भर जाता है तब वो उसे पी लेते है..फिर इंतजार करते है,और फिर पीते है..।
मुझे दो चीज सोचने को विवश किया..
1.क्या समुंद्र का पानी इसे नुकसान नही करेगा..??
 मैंने झट से गूगल किया तो पता चला हरेक जानवर को समुंद्र का पानी नुकसान पहुचायेगा.. हो सकता है ये सब अपने आप को उसके अनुरूप ढाल लिया हो..।
2.इन्हें पानी फ़िल्टर कर पीने को किसने सिखाया..??
ये एक तरह से गड्ढा खोदकर पानी को फ़िल्टर ही तो कर रहें थे..।


दूसरा दृश्य..
समुंद्र के किनारे ही एक अकेली महिला थी..जो अपने में खुश थी मगर उसकी खुशी उसकी विक्षिप्त अवस्था को दर्शा रही थी..वो महिला अचानक मुझसे कही जरा मेरा वीडियो बना देंगे..मैंने कहा हां..तो उन्होंने अपना मोबाइल मेरे हाथ मे थमा कर बोली आप सिर्फ इसे पकड़े रहिये..।
थोड़ा इधर थोड़ा उधर थोड़ा ऊपर थोड़ा नीचे के बाद आखिर मोबाइल एडजस्ट हो गया..मन हो रहा था छोड़ के भाग जाऊ..
मगर इसके बाद जो हुआ वो सोचने को विवश कर दिया..
वो बनावटी मुस्कान के साथ बोलती है,
हाइ गाइज.. 
मैं रोज बिच पे आती हूँ, मेरा वजन कम हो रहा है..
मैं यंहा हीरोइन बनने आई थी आज कुछ भी नही बन पाई..
ये दरिंदो से भरा हुआ जगह है..
सब साले इस्तेमाल करेंगे..
इसलिय अपना स्वास्थ्य का ख्याल रखें और आपलोग गाँव मे ही रहें, अच्छे से रहें..।
उसके बाद उन्होंने कहा मेरा एक फोटो खींच दीजियेगा..मैंने 3-4 क्लिक करके वंहा से निकल गया..।
मगर उसका चेहरा और बातें अभी भी दिमाग मे चल रहा है..।

तीसरा दृश्य..
एक छोटा बच्चा लगभग 3 साल का रहा होगा..
वो माँ की अंगुली पकड़ कर जा रहा था कि उसकी एक चप्पल पाँव से निकल कर पीछे छूट जाता है..
जबतक वो माँ को बोलता तबतक वो कई कदम आगे बढ़ गया था..।
क्योंकि वो छोटा बच्चा अपने उम्र के अनुसार नही चल रहा था,बल्कि उसकी माँ अपने उम्र के अनुसार चला रही थी..।
जबतक बच्चा शब्दों का चयन कर वाक्य बनाता और माँ को कहता कि मेरा एक चप्पल पाँव से निकल गया है..तबतक वो कई कदम आगे बढ़ गया था..
माँ के कानों में ये शब्द जाते ही माँ ने एक थप्पड़ जड़ दिया..।
मैं ये दृश्य देखकर आवाक रह गया..??


एक तो माँ अपने स्पीड से बच्चें को चला रही थी,..
दूसरे में, माँ को बच्चे के चाल में बदलाव का महसूस नही हुआ..।
मैं इसी उधेड़बुन में हूँ...
कभी-कभी दूसरों की लापरवाही के वजह से किसी और को सजा भुगतना पड़ता है..।।

ये 3 दृश्य ने सोचने को मजबूर कर दिया..
● कुत्ते को पानी फ़िल्टर कर पीने को किसने सिखाया..??
●उस महिला के साथ क्या हुआ होगा..??
●आखिर हम बच्चों पर हाथ क्यों उठाते है..??
आखिर क्यों..??