गुरुवार, 18 सितंबर 2025

कस्तूरी मृग और मनुष्य

कबीर दास जी कहते है-"कस्तूरी कुंडली बसै,मृग ढूंढे वन माहि"..यानी कस्तूरी(सुगंध/इत्र) मृग के नाभि में ही विद्यमान है,मगर वो उसे जंगल मे ढूंढता रहता है..


हमलोग भी तो यही करते है..ताउम्र भटकते रहते है..
मगर मृग से भी दयनीय स्थिति हममें से अधिकांश लोगों की है...
मृग को पता है कि वो क्या ढूंढ रहा है..
मगर हममें से अधिकांश लोगों को पता ही नही है कि हमें क्या ढूंढना है,ताउम्र भटकते रहते है,बिना उद्देश्य के..
कुछ लोग होते है जो अपने उद्देश्य के लिए भटकते है..
मगर इनमें से कुछ ही लोग होते है,जिन्हें अपने उद्देश्यपूर्ति में सफलता मिलती है..
क्योंकि वो कस्तूरी मृग की तरह भटकते नही..
वो सबसे पहले स्वयं का अवलोकन करते है..(हममें से 95% स्वयं का अवलोकन नही करते,जबकि सफलता में 50%इसी का योगदान है)और अपने कमियों को दूर करते है,और अपने खूबियों पे काम करते है..।।

जिस तरह कस्तूरी मृग दर-दर भटकता है,उसी तरह हम मनुष्य भी दर-दर भटकते है,जबकि लक्ष्यपरक जीवन का उद्देश्य हमारे अंदर ही छिपा हुआ है...
बस स्वयं का अवलोकन करना है..।।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कुछ गलतियां