और सुबह से शाम..
ये सिलसिला न जाने कब से चला आ रहा है..
मगर हम अब भी बेहोश है..।
और दिन से रात..
और रात से दिन..
का रट लगाए हुए है..।
जब उस छोटे से पिंड में अनहद नाद फूटा होगा..
तब न दिन रहा होगा,न रात हुआ होगा..
अगर हुआ होगा..
तो धुंधली सी शाम या फिर धुंध से छनकर आती हुई सुबह की रोशनी..।
ये सिलसिला न जाने कितने साल हजार साल चला होगा..
एक शाम को रात होने में..
या फिर एक सुबह को दिन होने में कितना लंबा सफर तय करना पड़ा होगा..।
ये शाम सबको अपने में समेट रही है..
और सुबह, सबको अपने हिस्से की रोशनी दे रही है..।
ये शाम है, साधना का..
और ये सुबह है,आराधना का..
इसे यू ही जाया न होने दे..।।
(माफ कीजियेगा..ये आपको शायद समझ में न आये..अगर आपको ब्रह्मांड की निर्मण की प्रक्रिया मालूम हो तो आपको जरूर समझ मे आएगा😊 एक बार बिग-बैंग थ्योरी जरूर पढ़ लीजियेगा)


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