मगर आप ही हो,कि अक्सरहाँ दस्तक दे जाते हो..
और मुझे अपने आगोश में ले लेते हो..।
आखिर क्यों करते हो ऐसा..?
मैंने तो कभी..
अच्छे से न नाम लिया,न जप किया,न तप किया..
तो फिर आखिर क्यों..
मुझपे कृपा वरसा रहें हो..
मैं तो उस योग्य भी खुद को नही मानता..
की आपके चरणों की धूलि को अपने सर से लगा सकूँ..
मगर आप हो..
जो मेरे साँसों में रच बस गए हो..
ज्योहीं आपसे दूरियां बढ़ती है..
आप हरदफ़ा दस्तक दे जाते हो..।
क्या करूँ,कैसे करू..
की आपमें समाहित हो जाऊं..।
आप ही मार्ग दिखाओ बप्पा..
इस जीवन को अब..
सार्थक बनाओ बप्पा..।

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