गुरुवार, 13 अगस्त 2026

मन भटक रहा है..

मन भटक रहा है..
क्यों..??
ये सवाल नया नही,
सदियों पुराना है..
मन भटक रहा है..।
आखिर भटकेगा क्यों नहीं..
क्योंकि उसे खुला छोड़ जो रखा है..।



क्या करें, कैसे करें..
कैसे इसे नियंत्रित करें..??
इसे नियंत्रण करना आसान कंहा है..
ये तो बिना लगाम के घोड़े के समान स्वछंद है..
इसके लगाम को जितना जकड़ने की कोशिश करेंगे..
ये उतना ही उलझन बढ़ाता जाएगा..।

फिर आखिर क्या करें,कैसे करें..??
कुछ नहीं..
बस अपने उद्देश्य को ढूंढिए..
और उसके पूर्ति के लिए लग जाइये..
और अपने मन को भी वंही लगाइए..।
क्योंकि हमारा मन भी तो..
किसी उद्देश्य के लिए ही भटक रहा है..
उसे सार्थक उद्देश्य की पूर्ति में लगाइए..।
न कि बेवजह के उद्देश्य में उसे उलझाइये..
जबतक बेवजह के उद्देश्य में उसे उलझाइयेगा
तबतक वो यू ही भटकता रहेगा..
खुद से ही सार्थक उद्देश्य को तलाशता रहेगा..।।

मन भटक रहा है..
मगर वास्तविकता तो कुछ और है..
हम ही भटक रहे है..
मन तो अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए भटक रहा है..।
हम क्यों भटक रहे है..?
जिस रोज हम अपने उद्देश्य की पूर्ति में लग जाएंगे..
उस रोज मन भी तादात्म्य बिठाकर उद्देश्य पूर्ति में लग जायेगा..।
जिस रोज उद्देश्य निर्रथक लगने लगेगा..
फिर से मन भटकने लगेगा..।

मन भटक रहा है..।

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