मगर लिखने से ड़र लगता है..।
कंही मेरी लेखनी..
किसी को सुई की तरह न चुभ जाये..
या फिर किसी को समझ ही न आये..
दोनों में खतरा है..
भला ये खतरा कौन मोल उठाये..।
कुछ लिखने का मन करता है..
मगर लिखने से डर लगता है..
क्योंकि आजकल कौन पढ़ता है..
और किसको इतनी समझ है..कि
किसी की लेखनी को समझ पाए..
हम वही समझ पाते है..
जो पढ़ पाते है..
मगर उस लेखनी के उस पार झांक नही पाते..।
कुछ लिखने को मन करता है..
मगर लिखने से ड़र लगता है..
क्योंकि शब्दों के मायाजाल में कोई फंसकर..
यू ही गुमराह न हो जाये..
क्योंकि सही राह चलना बड़ा दुष्कर है..
गलत राह पर तो हम चल ही रहें है..।
कुछ लिखने को मन करता है..
मगर लिखने से ड़र लगता है..
क्योंकि..
मेरी लेखनी किसी को समझ आएगा कि नही..
या फिर मैं कुछ ऐसा लिख भी पाऊंगा की नही..
जो सार्थक हो,सामर्थ्य हो,समृद्ध हो..
शायद यही सब सोचकर लिखने से डर लगता है..।
कुछ लिखने को मन करता है..
मगर लिखने से ड़र लगता है..

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