शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

मैं और समुन्द्र..

अक्सरहाँ जब मुझे नीरसता घेर लेती है..
मैं समुन्द्र की ओर चला जाता हूँ..
समुन्द्र की उठती और गिरती लहरें..
मेरे नीरसता को लील लेती है..
और मैं..
फिर से...
एक नया जीवन ले के लौट आता  हूँ..।





आज भी कुछ ऐसा ही हुआ..
सच कहूं तो कुछ अजीब हुआ..
सोचा कल नवरात्रा है..तो आज समुन्द्र की सैर कर आऊ..साथ ही मंदिर हो आऊ..।
जब समुन्द्र किनारे पहुंचा तो देखा, समुन्द्र तट से बहुत दूर जा चुकी थी..क्योंकि आज अमावस्या जो है..।मैं समुन्द्र की और बढ़ने लगा बिना किसी उद्देश्य के, फिर मैंने अपना जूता खोला और समुन्द्र के पानी मे पाँव रखा और उन्हें नमन किया..।और सोचने लगा कल से जिंदगी की नई शुरुआत करता हूँ..क्योंकि कल से नवरात्रि शुरू होने वाला है..ये सोच ही रहा था कि समुन्द्र ने मुझसे कहा-अपने सारे अवगुणों को मुझमें त्याग दो..लोग बहुत कुछ मुझमें त्यागते है..तुम अपना अवगुण क्यों नहीं त्याग देते..।
आज मैंने उन अवगुणों को समुन्द्र के लहरों में दफन कर दिया जो मेरे जिंदगी को कुंठित और लक्ष्यविहीन बनाये हुए थे..।मैंने सांप की केचुल की तरह अपने अवगुणों को त्याग कर एक नया शरीर लेके लौटा हूँ..।।
और इस नवरात्रा को खास बनाऊंगा..
और जिंदगी को नया आयाम दूंगा..।
आते वक्त समुन्द्र ने मुझसे कहा..कभी-कभी आ जाया करो..
कम से कम सप्ताह में एक दिन तो आ ही जाया करो..।।

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आईना..