शायद अधिकांश लोग को मालूम ही न हो..
क्या आपको मालूम है..??
जरा सोचिए..🤔
क्या आप जो सोच रहे है..उससे आप संतुष्ट है..।
चलिए मैं बताता हूँ..
इसके दो पौराणिक दृष्टांत मिलते है...
पहला महिषासुर से 9 दिनों का युद्ध - देवी भागवत और दुर्गा सप्तशती के अनुसार, महिषासुर को वरदान था कि कोई देव, दानव या पुरुष उसका वध नहीं कर सकता। जब उसका अत्याचार बढ़ा, तो त्रिदेवों और देवताओं के तेज से माँ आद्यशक्ति प्रकट हुईं और माँ दुर्गा और महिषासुर की सेना के बीच लगातार 9 दिनों और 9 रातों तक भीषण युद्ध चला। दसवें दिन माँ ने महिषासुर का संहार किया, जिसे अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में मनाया गया..।
(मूलतः ये घटना चैत्र मास में हुआ था,इसलिय चैत्र नवरात्रा मनाया जाता है,वैसे आश्विन मास के नवरात्रा को 'अकाल बोधन' कहा जाता है)
दूसरा दृष्टांत ये है कि जब राम और रावण में युद्ध हो रहा था तब अश्विन अमावस्या के दिन रावण सबको परास्त करते जा रहा था उस रोज उसके सामने कोई टिक नहीं पा रहा था..संध्या के समय जब सब अपने युद्ध शिविर में आये तो श्रीराम को उदास देखकर जामवंत जी ने पूछा आप उदास क्यों है..??श्रीराम ने कहा में रावण को तो हरा सकता हूँ मगर देवी को कैसे हरा सकता हूँ..आज मैंने युद्ध मे अनुभव किया कि देवी स्वयं रावण को गोद मे लेकर लड़ रही है..भला मैं कैसे देवी से लड़ सकता हूँ..।
इसपर जामवंत जी श्रीराम से कहते है..
आप भी शक्ति की आराधना कीजिये..
आराधना का दृढ़ आराधना से दो उत्तर, तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर।
रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सका त्रस्त,तो तुम हो शुद्ध, करोगे उसे निश्चय ही ध्वस्त;
जब तक न सिद्धि हो, देखो न रूप यह विषम,कपिदल-बल से खींचो न शक्ति का यह प्रक्रम।
" राम की शक्ति पूजा"
जामवंत की बातों से सहमत होकर श्रीराम ने कहा में कल से ही शक्ति की आराधना करता हूं..और वो पहला दिन ही नवरात्रा का पहला दिन था..श्रीराम ने समुंद्र तट पर बालू से माँ आद्यशक्ति की प्रतिमा प्रतिष्ठित किया और हनुमान जी से कहा..हे हनुमान मेरे लिए 108 नीलकमल फूल सरोवर से लेते आओ..उन्होंने 9 दिनों तक कठिन उपवास,मौन और ब्रह्मचर्य धारण करके साधना शुरू की..प्रतिपदा से नवमी तक श्रीराम ने माँ के विभिन्न रूपों का आह्वान करते हुए मंत्रों से साधना किया..।वो हरेक मंत्र के साथ देवी को एक-एक नीलकमल समर्पित करते जाते थे..।श्रीराम आठवें दिन तक साधना के उच्च स्तर पर पहुंच गए थे..नवमी के अंतिम प्रहर पर जब पुरश्चरण पूर्ण होनेवाला था तब 108वां कमल अर्पित करने के लिए श्रीराम हाथ आगे बढ़ाते है..मगर थाल खाली होता है..अगर 108 वां कमल फूल नही चढ़ता तो संकल्प और साधना दोनों टूट जाता..और साधना के बीच मे उठना भी शास्त्र-सम्मत नही था..।राम थोड़ा घबड़ाये आखिर ये आखरी फूल गया कंहा..??अचानक उन्हें याद आया..कि बचपन में, माँ कौशल्या उन्हें "राजीव नयन" कहकर पुकारती थी..वो मुस्कुराये और मन ही मन बोले मेरे पास अभी तो दो कमल और है..क्यों न मैं एक देवी माँ को अर्पित कर दू..
कहती थीं माता मुझे सदा ‘राजीव-नयन’!
दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
पूरा करता हूँ देकर मातः एक नयन।
"राम की शक्ति पूजा"
वो बिना संकोच के अपने तरकश से सबसे तीक्ष्ण बाण निकालते है..और अपने दाहिना आँख माँ को समर्पण के लिए तत्पर हो जाते है..ज्योहीं वो बाण अपने आंख के पास लाते है..त्योंही माँ दिव्य प्रकाश के साथ प्रकट होती है,और श्रीराम का हाथ पकड़ लेती है..और कहती है -
हे राघव..मैं तुम्हारी निष्काम भक्ति और समर्पण से अत्यंत प्रसन्न हुई..
होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन।
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।
देवी श्रीराम को अजय होने का वरदान देकर श्रीराम के हृदय में विलीन हो गई..।
और इसके पश्चात दसवें दिन श्रीराम ने रावण पर अंतिम प्रहार किया और रावण का वध किया और अधर्म पर धर्म की विजय स्थापित किया..इसी दिन को हम हरेक साल विजयादशमी मनाते है..।
अब पता चला नवरात्रा क्यों मनाते है...??
आश्विन मास के नवरात्रा को सनातन परंपरा में "अकाल बोधन"(असमय देवी को जाग्रत करना) कहा जाता है,क्योंकि श्रीराम ने आश्विन मास देवी की साधना की थी..तब से ही आश्विन मास में नवरात्रि मनाया जाने लगा..।
देवी की पारंपरिक पूजा चैत्र मास में होता है..।


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें