मंगलवार, 31 जनवरी 2023

कंही आप स्मार्टफोन के गुलाम तो नही है..??

 आपको क्या लगता है...

स्मार्टफोन को आप कंट्रोल कर रहे है या

फिर स्मार्टफोन आपको कंट्रोल कर रहा है..???

जरा सोचिए..🤔

आपने आखरी बार गूगल पे काम की चीज कब सर्च किया था.. या फिर यूट्यूब पे ही..।।

अगर आपने बीते हुए 3 दिन के अंदर अपने काम की चीज को सर्च किया है,तो आप कभी भी  स्मार्टफोन की गुलामी की जंजीरों को तोड़ सकते है..।

अगर एक सप्ताह हो गया है,तो थोड़ा मुश्किल है..।

अगर 15 दिन से ज्यादा हो गया है तो आप मान लीजिए कि आप समार्टफोन के गुलाम हो चुके है..।

याद रखियेगा.. आपको अपने काम का ही चीज सर्च करना है,जो आपके रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा हो सकता है..।।

 अगर आप रोज सर्च कर पाते है तो समझ लीजिए स्मार्टफोन आपका गुलाम है..

शुक्रवार, 13 जनवरी 2023

नरेंद्र से विवेकानंद बनने की यात्रा..

 आज युवा दिवस है..



और आज के युवा को सोशल मीडिया पर स्क्रोल करते वक़्त ये भी नही मालूम नही होता कि,वो आखिर क्या ढूंढने के लिए स्क्रोल कर रहे है..।। 


आज इस सोशल मीडिया और इंटरनेट के माध्यम से उन्हें जानना बहुत आसान है,जिनके जन्मदिवस पे आज युवा दिवस मनाया जा रहा है..।


मगर हम ये नही जानना चाहते कि नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद बनने की यात्रा कैसा था..??

ये हरेक युवा को जानना चाहिए..


नरेंद्र का जन्म 12 जनुअरी 1867 में कोलकाता में हुआ। पिता विश्वनाथ दत्त वकील थे और माता भुवनेश्वरी देवी थी। 

इनके जीवन के ऊपर जितना प्रभाव पिता का पड़ा उतना ही माता का भी..।।

इनके दादाजी दुर्गाचरण दत्त संस्कृत और पारसी के विद्वान थे, साथ ही लॉ की भी पढ़ाई किये थे। 25 वर्ष की उम्र में ही संत बन गये।

जिसका कुछ न कुछ प्रभाव इनके ऊपर भी पड़ा ही होगा।।


1871 में 7 साल के उम्र में मेट्रो पॉलिअन्त स्कूल में नामांकन होता है।

1879 में प्रेसीडेंसी कॉलेज में नामांकन लेते है।

कॉलेज के पढ़ाई के दौरान ही , एक दिन प्रोफेसर विलियम हैस्टिक, विलियम वर्ड्सवर्थ की 'the excursion' चैप्टर पढ़ा रहे थे । उसी में एक शब्द "TRANCE" आता है। नरेंद्र इस शब्द को अच्छी तरह नही समझ पाते है तो प्रोफेसर कहते है इसे अच्छी तरह समझने के लिए रामकृष्ण परमहंस से मिलना होगा।

उन्ही दिनों कोलकाता में रामकृष्ण परमहंस(1881)सुरेंद्र नाथ मित्र के यंहा आये थे। ये बात नरेंद्र को जब पता चलता है तो वो अपने मित्र के साथ पहुंच जाते है। संगीत-गान की भी व्यवस्था किया गया था,मगर कोई आया नही। इसी समय मित्र के कहने पर वो गाते है- "जागो मां कुलकाण्डलिनी" जिसे सुन परमहंस भावविभोर हो जाते है। और उन्हें दक्षिणेस्वर बुलाते है।



जब नरेंद्र दक्षिणेस्वर जाते है तो पहला सवाल वो पूछते है- क्या आपने भगवान को देखा है..??

परमहंस कहते है- हां देखा है, जैसे तुम्हें देख रहा हूँ,वैसे ही देखा हूँ, बल्कि इससे भी अच्छी तरह से देखा हूँ।।


नरेंद्र का जाना-आना लगा रहता है। इसी बीच 1884 में पिता के मृत्यु होते ही मानो पहाड़ टूट पड़ता है। दिन-प्रतिदिन कर्जदार होते गए,ऊपर से रिश्तेदारों ने केस कर दिया। नरेंद्र ने पहली बार जाना कि गरीबी क्या होती है,खाली-पेट नॉकरी के तलाश में एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर का सिलसिला जारी रहता।

इसी बीच रामकृष्ण परमहंस से नजदीकियां और बढ़ गया।

नरेंद्र की व्याकुलता देखकर एकदिन परमहंस ने कहा अगर तुम मेरा काम करोगे, तो तुम्हारे परिवार का दो वक्त के रोटी का में बंदोबस्त कर दूंगा।

विवेकानंद ने हामी भर दी और शिष्यत्व ग्रहण किया। परमहंस ने उन्हें अपना उत्तरदायित्व दे दिया।


1886 में रामकृष्ण परमहंस के मृत्यु के बाद 'बराह मठ' का निर्माण किया और शिष्य भाई को संगठित कर वो लाहौर से कन्याकुमारी की यात्रा पे पैदल चल दिये।


खेतड़ी के राजा अजित सिंह के सहयोग से 11 सेप्टेंबर 1893 को शिकागो धर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए जाते है। और इसी समय खेतड़ी के महाराज द्वारा उन्हें "स्वामी विवेकानंद" नाम दिया जाता है



4 साल तक पकश्चिमी देशों में लगातार व्यख्यान देने का सिलसिला जारी रहता है।

 भारत वापस आने पर 1 मई 1897 को रामकृष्ण मिशन की स्थापना करते है।

इस बीच लगातार रामकृष्ण परमहंस के विचारों के माध्यम से समाज में नई चेतना का विकास करने का कार्य जारी रखते है।।

4 जुलाई 1902 को 39 वर्ष की आयु में बेलूर मठ में अपना प्राण त्याग देते है।


मगर उनके विचार और आदर्श आज भी युवाओं को उद्देलित करता है..।

वो कहते है-

 " सामाजिक परिवर्तन बाहर से नही,अंदर से होता है"

 "हर व्यक्ति को भगवान की तरह देखो,आप किसी की मदद नहीं कर सकते, बस उसकी सेवा कर सकते हैं।

 "शिक्षा का मतलब सूचना एकत्र करना नही बल्कि, जीवन, चरित्र,और व्यक्ति निर्माण पर होना चाहिए।

 "बिना महिला के सशक्त हुए बिना,समाज कभी सशक्त नही होगा।


उनके विचारों ने समाज के हरेक वर्ग को उद्देलित किया..।।

सुभाष चन्द्र बोस ने उन्हें भारत का "आध्यातिमक पिता" कहा..।।


उनके विचार आज भी प्रासंगिक है,मगर अफसोस आज के युवा को उनके विचार को तो छोड़िए,उनका क्या विचार है वो खुद निर्णय नही ले पा रहे है..।।



सोमवार, 9 जनवरी 2023

लता भगवान करे... क्या आप इन्हें जानते है..

"लता भगवान करे".. 



शायद आपने ये नाम सुना भी नही होगा.. सुनियेगा कैसे... क्योंकि ये हमलोगों से खास है..।।

जब लोग रिटायरमेंट ले के घर पकड़ लेते है, तब ये मैराथन में भाग लेती है, शौक से नही, मजबूरी के कारण.. मगर जीतती है। इस उम्र में लोगों की जब कमर सीधी नही होती,तब ये सिर्फ दौड़ती ही नही, बल्कि जीतती है..।।

चलिए 'लता भगवान करे' के जीवन के उस पहलू पे नजर डालते है,जो उन्हें उन भारतीयों महिलाओं के श्रेणी में लाकर रखता है, जो पूजनीय है..।।

चाहे कोई भी भारतीय माँ और बहन हो, वो अपने परिवार के लिए कुछ भी कर सकती है..।। मगर वर्तमान के पूंजीवादी संस्कृति इस छवि को धूमिल कर रही है,मगर कितना करेगी,हमारी आत्मा तो नही बदल सकती..।।

सच्चा भारत गांव में ही बसता है,उसी लाखों गाँवो में से एक महाराष्ट्र के बारामती के पास रहने वाली लता भगवान करे है। 2014 में इनके पति का तबियत इतना खराब हो गया कि इन्हें अच्छे इलाज के लिए ज्यादा पैसों का जरूरत था, आसपास के लोगों से पैसा इकट्ठा करके हॉस्पिटल में इलाज करवाने के लिए गई,मगर कुछ ही दिन बाद इनके पास MRI कराने का पैसा नही था।। हताश निराश हॉस्पिटल के बाहर चाय के दुकान में बैठकर जब कुछ खा रही थी,तब उन्हें उस पेपर कटिंग में मैराथन के बारे में पढ़ा..।।

और उस मैराथन में भाग लेने के लिए चल गई, शुरुआत में तो इन्हें इनकार कर दिया गया। मगर बहुत अनुरोध करने पर इन्हें भाग लेने दिया गया... तब इनकी उम्र 65 के आसपास था.. मैराथन दौड़ 3km का था..।।

आप जरा सोचिए एक 65 साल की महिला 3km की दौड़ में भाग ले रही है... क्या आपके रोंगटे नही खड़े हो रहे है..।।

'लता भगवान करे' साड़ी पहन कर दौड़ने को तैयार थी, दौड़ शुरू ही हुई थी, कि इनकी चप्पल टूट गई , ये नंगे पांव दौड़ना शुरू कर दी.. तबतक दौड़ती रही जबतक सबसे आगे और जीत नही गई..।।

इन्हें इस मैराथन से जो 5 हज़ार रुपया मिला उस पैसों से पति का MRI करवाया..।।



आखिर ऐसी कौन सी ऐसी चीज थी जिसने उन्हें जीतने को विवश किया...??? 

जरूरत... अगर आप अपनी जरूरत जानते है, तो आप हरेक सीमाओं को तोड़ सकते है,आप नए कीर्तिमान रच सकते है..।।

लता भगवान करे जैसी महिला हरेक भारतीय घर में है, जो समय आने पर सबकुछ न्यौछावर कर सकती है..। 

मगर कब...??

जब आप, उन्हें होने का अहसास होने देंगे....।

'लता भगवान करे' के ऊपर मराठी में फ़िल्म भी बनी जिसमें इन्होंने अपना किरदार स्वयं निभाया..। 2020 में इस फ़िल्म को 67वॉ राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार में विशेष उल्लेख(special mention) के लिए सम्मानित किया गया।।



जरा आप सोचिए🤔...??

65 साल के उम्र में कोई महिला मैराथन में साड़ी पहन कर दौड़ती है, और वो जीतती भी है..। फिर 68 साल के उम्र में सारा जीवन खेतों में काम करने वाली वही महिला फिल्मों में काम करती है...। और उस फ़िल्म को सम्मानित भी किया जाता है..।।

आप क्या सोचते है इसके बारे में..

शनिवार, 7 जनवरी 2023

नव वर्ष का पहला सप्ताह

 नव वर्ष का पहला सप्ताह...कैसा रहा..??


क्या आपने खुद से किया हुआ वादा निभाया,या फिर टूट गया..।।
टूट ही गया होगा...।
क्योंकि 60% से ज्यादा लोगों का नव-वर्ष में किया हुआ वादा एक ही सप्ताह में टूट जाता है। फरबरी आते - आते 80% और अप्रैल-मई तक 12% और लोग, खुद से किया हुआ वादा तोड़ लेते है..।।
सिर्फ 8% लोग ही नव-वर्ष में खुद से किया हुआ वादा निभा पाते है..।।
और ये वो ही लोग है.. जो सिर्फ अपने ही जिंदगी में नही बल्कि औरों के जिंदगी में भी बदलाव लाने की काबिलियत रखते है।

ऐसा क्या कारण है कि लोग लिए हुए संकल्प को निभा नही पाते....??
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि इसका सबसे प्रमुख कारण है कि, हम बिना योजना बनाये हुए ही संकल्प ले लेते है..।।

जरा सोचिए एक दिन में तो हिमालय नही चढ़ा जा सकता..
और हम कुछ इसी तरह का संकल्प ले लेते है,जो बोझ बन जाती है,जिसे कुछ लोग कुछ दिन ढो पाते है,और कुछ लोग कुछ सप्ताह और कुछ महीना..।। 

 और जब एक बार लिया हुआ संकल्प टूट जाता है,तो हम   अपने आप को ही हीन भावना से देखने लगते है,जोकि    बिल्कुल गलत है। ये समय होता है फिर से पुनर्विचार करने  का.. 
आखिर ऐसा क्यों हुआ..??
उस क्यों का जबाब ढूंढे...।।
जब जबाब मिल जाये तो आपके अंदर जरूर बदलाव आएगा..।।

अपने अंदर बदलाव लाने के लिए खुद को दंडित करें...।।

है न अजीब बात.. खुद को दंडित करना..।।
मगर जरा आप सोचिए🤔...
आपके जिंदगी में जो भी अनुसाशन है वो क्यों है...??
और कब आया..??
आप जब स्कूल लेट जाते थे तो मार पड़ता था, या फिर जब होमवर्क नही करते थे तब मार पड़ता था..और हम दंडित होने से बचने के लिए समय पर स्कूल जाते और होमवर्क करते..।।

आप हेलमेट क्यों पहनते है🤔...??
शायद कुछ ही लोगों का जबाब होगा सेफ्टी के लिए...
अक्सरहां भारतीय, ट्रैफिक पुलिस के डर से पहनते है😊..।।
यानी हम दंडित होने से बचने के लिए अनुशासन का पालन करते है..।।


तो अब आप फिर से खुद को दंडित करने का सोचिए..।
सिर्फ सोचिए ही नही खुद को दंडित कीजिये..।।
- हमें सिर्फ एक-एक दिन का संकल्प लेना है और उसे पूरा करना है..।
अगर पूरा न हो तो घर मे ही 54 बार दंड बैठक करना है..।।

और अगली बार, कोई गलती करने से पहले सोचिएगा..।।पहले दंडबैठक करू...
या फिर गलती करके दंड बैठक करू..।।

तो फिर शुरू हो जाइए खुद को दंडित करने के लिए..😊


शनिवार, 31 दिसंबर 2022

2022 क्या पाया क्या खोया..

 2022 क्या खोया क्या पाया..

आज साल का आखरी दिन है..



कितने लोग कितने दिन पहले, या फिर आज इस दिन को खास बनाने के लिए कुछ करेंगे या कर रहें होंगे..।।

आप क्या कीजियेगा..??

जो करना है वो कीजियेगा..।।

मगर 5 मिनट.. 

अपने लिए और सिर्फ अपने लिए जरूर निकालिएगा..

आंखे बंद कीजियेगा..

और सोचिएगा इस एक साल मैं , 

मैंने क्या पाया और क्या खोया..??

चलिए पहले आँखें बंद कीजिए और लंबी गहरी सांस लीजिए,और सोचिए...


अगर 2022 में कुछ पाया तो क्या पाया,और क्यों पाया..??

इस क्यों का जबाब जरूर ढूंढिये..

अगर इस क्यों का जबाब मिल गया तो आने वाले सालों में आप और बेहतर कुछ पा सकते है..।।


अगर कुछ खोया.. तो क्यों खोया..??

क्या आपमें कुछ कमियां थी,या फिर कोई और कारण था..।।

इसका जबाब जरूर ढूंढिये.. 

मगर ईमानदारी से..।।

औरों के लिए ईमानदार बनना बहुत आसान है,

मगर खुद के लिए ईमानदार बनना बहुत कठिन है..।।


असफलता बुरी चीज नही है..

मगर अपनी असफलता से न सीखना बहुत बुरी चीज है..।


2022 के बीतते हुए आखरी लम्हों के साथ अपनी सारी कमियों की पोटरी भी बांध दे..।क्योंकि जो चला जाता है,वो फिर नही आता है..।।

क्या आप में है हिम्मत...?? अगर है,तो हो जाइए तैयार...

अपनी कमियों की पोटरी 2022 के साथ बांधने के लिए..।।

और आने वाले कल के लिए हो जाइए तैयार.. 

कुछ नया और कुछ खास पोटरी को आजीवन ढोने के लिए..

जो आपके लिए बोझ नही, बल्कि आपका सहारा बने,

और आपके जिंदगी को बेहतर से बेहतर बनाये..।।


आने वाला वर्ष सिर्फ आपके लिए ही नही,

बल्कि आपके चाहनेवाले को लिए सुनहरा हो..।।

नव-वर्ष की अग्रिम शुभकामना..💐💐

प्रधानमंत्री मोदी आज के कर्मयोगी

 प्रधानमंत्री मोदी आज के कर्मयोगी

ये सब को पता है कि आज प्रधानमंत्री जी के माँ का देहांत हो गया..



उसके बाद क्या हुआ..??

शायद सब को न पता हो,मगर अधिकांश लोगों को पता होगा,क्योंकि मीडिया और सोशल मीडिया में बखूबी दिखाया गया..।।

मगर मोदीजी जो संदेश देना चाह रहें थे, वो संदेश क्या हम तक पहुंच पाया..।।

अगर हां तो आपने वो सीख लिया, 

जिसे अर्जुन ने युद्धभूमि में श्रीकृष्ण से सीखा था..।।

कृष्ण के पूरे गीता का एक ही सार है..

की कर्मयोगी बनो.. भले परिस्थितियां कैसी भी क्यों न हो अपने कर्तव्य पथ से विचलित नही होना है।

आज प्रधानमंत्री ने पूरे विश्व को यही संदेश दिया..।।

वो माँ के वियोग में विचलित नही हुए होंगे,ऐसा हो ही नही सकता।क्योंकि जिस माँ ने उन्हें नरेंद्र से नरेंद्र मोदी बनाया आज वो उनसे दूर चली गई ..।। ये वास्तविकता है,और इसे बदला नही जा सकता..।।

मगर जो बदला जा सकता है, उसके लिए कुछ किया जा सकता है,प्रधानमंत्री ने वही किया।

माँ के अंतिम संस्कार के बाद वो अपने कर्त्तव्य पथ पर लौट आये

और हावड़ा से जलपाईगुड़ी के लिए वंदे भारत ट्रैन को हरी झंडी दिखाया..।।



और उन्होंने देरी के लिए माफ़ी मांगी..।

वो चाहते तो इस कार्यक्रम को कल के ऊपर टाल सकते थे,या फिर किसी और मंत्री को भी भेज सकते थे।

मगर नही,जो जबाबदेही उन्होंने लिया है,उसे वो ही निभा रहे थे..।।

मगर वर्तमान में हम युवाओं की दशा बहुत ही दयनीय है..

आपको ये जानकर बहुत ही आश्चर्य होगा कि पूरे विश्व मे सर्वाधिक युवा भारत मे ही आत्महत्या करते है..।।

ये उस भारत का हाल है जंहा आत्महत्या को पाप माना जाता है..।।


हम प्रधानमंत्री से आज के घटना से बहुत कुछ सीख सकते है..।।

वो बिना कुछ कहें ही संदेश दे रहे है कि हमें कर्मयोगी होना चाहिए..।

हालात कैसे भी क्यों न हो, हमें अपने कार्य को प्रमुखता देना चाहिए..।

आप की परिस्थिति कैसी भी क्यों न हो,अगर आपके कारण कुछ भी इधर-उधर हुआ हो तो क्षमा मांगने में हिचकिचाना नही चाहिए।।

निर्णय हमें ही करना है.. 

कर्मयोगी बनना है,या फिर भोगी बनना है..??

गुरुवार, 22 दिसंबर 2022

रामानुजन.. क्या आप इन्हें जानते है..??

 रामानुजन.. क्या आप इन्हें जानते है..??

जरा सोचिए... अगर हां, तो कितना जानते है..?? और क्या जानते है..। 

अगर नही,तो क्यों नही जानते ...??



रामानुजन एक आम इंसान नही थे या है..?? क्योंकि ऐसे लोग हमेशा जीवंत रहते है,आप भले भूल जाये मगर इतिहास आपको भूलने नही देगा..। 

रामानुजन ने खुद को ही खास नही बनाया,बल्कि अंग्रेज के बेड़ियों से जकड़े हुए भारत को, कृष्ण की तरह भारत का एक विराट छवि का आभास अंग्रेजों को कराया..।।

मैं उस रामानुजन की बात कर रहा हूँ, जिनके जन्म दिवस पर भारत सरकार गणित दिवस मनाती है..।। मगर अफसोस भारत की 50% से ज्यादा आबादी को ये नही पता कि हम गणित दिवस क्यों मनाते है..??

जबकि आज हमारे पास जानने के अनेक माध्यम है..।मगर हमें जानने की इच्छा ही नही है.. आखिर क्यों..??

ये क्यों का जबाब जरूर अपने अंदर सोचिएगा.. क्योंकि क्यों आपको सोचने वाला इंसान बनायेगा।।

चलिए हम उस रामानुजन को जानते है,जो आज भी गणितज्ञों के लिए पहेली बना हुआ है..।।

रामानुजन का जन्म मद्रास के इरोड़ में एक तमिल गरीब ब्राह्मण परिवार में 22 दिसंबर 1887 को हुआ। इनके पिता के श्री निवास साड़ी के दुकान में क्लर्क का काम करते थे। और माँ गृहणि थी और भक्ति भजन करती थी।

1892 में नजदीक के स्कूल में नामांकन हुआ मगर 5वी तक पढ़ाई में कोई रुचि नही था,बल्कि इनके ऊपर नजर रखा जाता था कि ये स्कूल से भाग न जाये।

जब ये माध्यमिक स्कूल में गए तब इनकी मैथ में रुचि बहुत बढ़ गई।रुचि इतनी बढ़ने लगी कि इन्हें स्कॉलरशिप भी मिलना शुरू हुआ।

मगर 11थ मैं इनकी रुचि मैथ में ज्यादा होने के कारण ये फैल हो गए और इनसे स्कॉलशिप भी छिन गया ।

इसी बीच इनकी शादी 1909 में जानकी से हो गया..।जिसने हमेशा इनका साथ दिया।

1910 में ये रामास्वामी अय्यर से मिलें जो "इंडियन मैथमैटिसियन सोसाइटी" के संस्थापक थे। इन्होंने अपना थ्योरम इन्हें दिखाया,जो इनसे बहुत प्रभावित हुए ।।

1912 में रेवेन्यू डिपार्टमेंट में क्लर्क की नॉकरी 20₹ प्रतिमाह पे किया। यही से उन्होंने G.H.Hardi(उस समय के महान गणितज्ञ) को अपना थ्योरम पत्र के माध्यम से भेजना शुरू किया।

1913 में G.H.Hardi ने रामानुजन को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी लाने के लिए J.E.Littlewood को भारत भेजा..।। 

इस समय समुन्द्र यात्रा भारतियों के लिए अच्छा नही माना जाता था,लोग जब विरोध करने लगे तो इन्होंने कहा कि मैं अपने कुल माता नामगिरी से पूछुंगा। उन्हें अपनी कुलदेवी से हां में जबाब मिला।और वो कैम्ब्रिज के लिए निकल गए। जब ये आ रहे थे तब पत्नी ने इनसे कहा कि मैं भी चलूंगी तो इन्होंने मना कर दिया,क्योंकि वंहा में कंहा और कैसे रहूंगा इसका कोई ठिकाना नही है।

रामानुजन शाकाहारी थे जिस कारण ब्रिटेन में अच्छा खाना मिल नही पाता था,जिस कारण इनकी तबियत गिरने लगी,ज्यों-ज्यों शरीर कमजोर हो रहा था, त्यों-त्यों ये मैथ की ऊंचाइयों पे पहुंच रहे थे।

-6 दिसम्बर 1917 में ये "लंदन मैथेमेटिक्स सोसाइटी" के सदस्य चुने गए।

-1918 में "रॉयल सोसायटी" के लिए इनका चयन हुआ, ये दूसरे भारतीय और उस समय में सबसे युवा चयनित थे।

- इन्हें ट्रिनिटी कॉलेज ने फेलोशिप के लिए चयन किया,जो प्रथम भारतीय थे



इन्होंने ने मैथ के क्षेत्र में बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया है,उस समय के महान गणितज्ञों में से एक G.H.Hardi भी अपने आपको इनसे छोटा समझते थे।

-इन्होंने "divergent series" के ऊपर 120 थ्योरम दिए,साथ ही "partion of whole number", "Fermat Theorem", "Cubic equation & quadratic equation" और Hypo geometric series पर बहुत ही कार्य किया..।।

-इन्होंने अपने जीवन काल मे 3000 से ज्यादा थ्योरम दिए।

-इन्होंने "MOC Theta Function" दिया जिसने 2002 में 'ब्लैक होल' को समझने में मदद किया। और साथ ही कैंसर सेल को समझने में भी मदद हो रहा है।

- 1914 से ही तबियत खराब रहने के कारण 1919 में भारत वापस आ गए । जंहा 26 अप्रैल 1920 में 32 साल के उम्र में क्षय रोग के कारण इनका मृत्यु हो गया।और एक महान सख्सियत की मृत्यु समय से पहले हो गया और इस ब्रह्मांड में कही खो गया।

- एक बार Hardi ने रामानुजन से पूछा कि तुम थ्योरम कैसे हल कर लेते हो..। रामानुजन ने कहा में अपने कुलदेवी 'नामगिरी' को याद करता हूँ और वो उसका जबाब मिल जाता है।

-जब रामानुजन अस्पताल में थे तब उनसे मिलने Hardi अपने मित्र के साथ कार मिलने आये। रामानुजन ने उस गाड़ी की नंबर के चार विशेषता बतलाया। जिसे हार्डी को 3 विशेषता सुलझाने में 6 साल लग गए,और चौथी विशेषता के बारे में Hardi ने अपने वसीयत में लिखा कि रामानुजन ने लिखा है तो सही ही होगा। जिसे हार्डी के मरने के 22 साल बाद सुलझाया गया।।

रामानुजन इस दुनिया के थे ही नही,या फिर समय से पहले इनका प्रादुर्भाव हो गया.. या फिर कुछ और..???

अगर आप रामानुजन को और जानना चाहते है तो उनके ऊपर बनी फ़िल्म - "The man who knew infinity" जरूर देखें। https://youtu.be/8WwLPep9xNg


आप जरा सोचिएगा की आप रामानुजन को क्यों नही जानते..??

इसके लिए सिर्फ आप ही नही,बल्कि हमारा समाज ,हमारा सरकार भी दोषी है..।। अगर हां तो कैसे..?? जरूर बताइएगा..।।

Yoga for digestive system