सोमवार, 23 मार्च 2026

23 मार्च..क्यों है खास..।

इतिहास के कुछ ऐसे पन्ने है,जो कभी पुराने नही हो सकते..
और न ही वो मिट सकते है..चाहे इतिहास के वो पन्ने फाड़ ही क्यों न दिया जाय..मगर वो कंही न कंही अपना जगह बना ही लेंगे..।।
आप उसे इतिहास से हटाओगे तो वो साहित्य में शामिल हो जाएगा..
अगर उसे साहित्य से भी हटाओगे तो वो लोगों के जुबां पे आ जायेगा..।।

आज की तारीख़ यानी 23 मार्च उन्हीं लोगों को समर्पित है..
जिस उम्र में हम कैरियर और अपने भविष्य के बारे में सोचते है..
उस उम्र में वो तीन, वो मुकाम हासिल कर लिए..
जिस मुकाम पे कोई पहुंच नही सकता..।।

पता है वो 3 कौन थे..??
आज ही के दिन उन्हें उन गुनाह के लिए फांसी दे दी गई,जो गुनाह अंग्रेजी हुकूमत साबित नही कर पाया..(लाहौर षड्यंत्र)
वो इतने भयभीत थे कि उन्हें तय तारीख से एक दिन पहले चुपके से फांसी दे दी गई..।।
और वो 3 भारत माता की जय..और इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते-लगाते शहीद हो गए..।।

वो 3 कौन थे..??

शिवराम राजगुरु,सुखदेव थापर और तीसरा भगत सिंह थे..।।

भारत के चौराहों पे गांधी,अंबेडकर, बोस,के बाद सर्वाधिक अगर किसी की मूर्ति लगी है तो वो भगत सिंह की..।।




आज की युवा इन्हें थोड़ा बहुत तो जानती है..
मगर सच कहूं तो बहुत बड़ी आबादी इन्हें नही जानती है..।

इनके क्रांतिकारी कार्यों से कोई अवगत नही है..??
जब क्रूर,अमानुष,हिंसक,नीच अंग्रेज के नजरों से सब बचे रहते थे,उस समय इन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को नाको दम कर दिया था..
अंग्रेज इन क्रांतिकारियों से इतने भयभीत थे कि इन्हें किसी तरह अपने रास्ते से हटाना चाहते थे..।।

गांधी जी ने अगर लोगों को जागरूक किया..तो इन क्रांतिकारियों ने लोगों को अपने अधिकार के लिए लड़ना सिखाया..।।
मगर आज ये क्रांतिकारी कंही धूमिल हो गए है..।।

आज भारत को फिर से क्रांतिकारियों की जरूरत है..
जो भ्रष्टाचार के खिलाफ,अन्याय के खिलाफ, अधर्म के खिलाफ आवाज उठा सके..।।

मगर अफ़सोस आज के युवा तो खुद अघोषित गुलाम हो चुके है..।
आज उनके पास समय नही है..
जबकि सारा काम ऑनलाइन हो जा रहा है..।
हमारे युवा रील देखने मे या फिर सोशल मीडिया में व्यस्त है..।।
मगर खुद को शारीरिक,मानसिक,आध्यात्मिक रूप से कितने युवा खुद को मजबूत बना रहे है..??

अगर इन क्रांतिकारियों को जानना हो तो कुछ पुस्तक पढ़िए...

भगत सिंह ने अपने पुस्तक "why I am an atheist?" में लिखते है - 
"बम और पिस्तौल क्रांति नही लाते,क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है.."

"आलोचना और स्वतंत्र विचार एक क्रांतिकारी के दो अनिवार्य गुण हैं..।"

"क्रांति से हमारा तात्पर्य अंततः एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना से है जिसे इस प्रकार के घातक खतरों का सामना न करना पड़े और जिसमें सर्वहारा वर्ग (श्रमिक वर्ग) का प्रभुत्व हो।"

भगत सिंह को जानने के लिए इनकी पुस्तक "why I am an atheist?" पढ़ें..आप सोचने पे विवश हो जाएंगे..।

 


सुखदेव थापर
ये हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) के मुख्य रणनीतिकार थे। उन्हें दल का 'मस्तिष्क' माना जाता था..।

इनके अनुसार-
 ​"क्रांति केवल बम और पिस्तौल से नहीं आती, बल्कि एक अनुशासित संगठन और स्पष्ट विचारधारा से आती है।"

"हमें फांसी की सजा का स्वागत करना चाहिए, क्योंकि हमारी मौत सोई हुई जनता को जगाने का काम करेगी। एक जीवित क्रांतिकारी से कहीं अधिक शक्तिशाली एक मृत (शहीद) क्रांतिकारी होता है।"

सुखदेव जी ने गांधी जी को 7अक्टूबर 1930 को पत्र लिखा था,तबतक इन्हें फांसी की सजा सुना दिया गया था. उस पत्र के कुछ प्रमुख अंश-

क्रांतिकारियों को पथभ्रष्ट या हिंसक कहने पर गांधीजी से कहते है-

"आप हमें जनता के सामने अपराधी की तरह पेश करते हैं, लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि हम जो कर रहे हैं, वह देश के गौरव और स्वाभिमान के लिए है..?"

गांधी इरविन समझौता पर वार्ता के समय सवाल करते है-

 ​"यदि आप सरकार के साथ समझौता कर रहे हैं, तो याद रखें कि केवल कुछ कैदियों की रिहाई से क्रांति समाप्त नहीं होगी। जब तक पूर्ण स्वतंत्रता और शोषण का अंत नहीं होता, तब तक यह आग जलती रहेगी।"

"हम मौत से नहीं डरते। हम तो चाहते हैं कि हमारी फांसी देश के युवाओं के दिलों में आजादी की मशाल जला दे। क्या आपकी अहिंसा इस बलिदान की शक्ति को समझ पाएगी?"

सुखदेव इस बात के सख्त खिलाफ थे कि गांधीजी उनकी फांसी रुकवाने के लिए अंग्रेजों से 'दया' की भीख मांगें। उन्होंने गौरव के साथ कहा कि वे शहीद होना चाहते हैं ताकि उनका रक्त देश के काम आए। 

◆राजगुरु..

जहाँ भगत सिंह 'विचारक' और सुखदेव 'रणनीतिकार' थे, वहीं राजगुरु दल के सबसे घातक 'निशानेबाज' माने जाते थे।

राजगुरु महाराष्ट्र से थे और छत्रपति शिवाजी महाराज उनके सबसे बड़े आदर्श थे। वे अक्सर कहा करते थे...

"गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहकर सौ साल जीने से बेहतर है कि,स्वतंत्रता की वेदी पर एक दिन शेर की तरह शहीद हो जाना.."

 फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद, जब जेल में साथियों के बीच चर्चा होती थी, तब राजगुरु ने मुस्कुराते हुए कहा था..

"फांसी का फंदा मेरे लिए फूलों की माला जैसा है। मुझे गर्व है कि मैं अपने देश के काम आ रहा हूँ और भगत सिंह व सुखदेव जैसे शेरों के साथ शहीद हो रहा हूँ।"

 राजगुरु संस्कृत के विद्वान थे। वे अक्सर जेल में कठिन संस्कृत श्लोकों का पाठ करते थे। उनका मानना था कि भारतीय संस्कृति और शास्त्र हमें अन्याय के खिलाफ लड़ना सिखाते हैं..।।

 


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