मगर मालूम नहीं क्यों..
अगर मैं, हताश और निराश होता भी हूँ तो..
पानी के बुलबुले के समान क्षणभंगुर..
और फिर..
निर्लज आसमान की तरह मुस्कुराने😊 लगता हूँ..।
शायद हमारी नियति ही मुस्कुराना है..
हम ही मुस्कुराना भूल जाते है..।
अपने आसपास देखिए..
हरेक पेड़-पौधे और जीव-जंतु को..
सब मुस्कुरा रहें है..
अगर नही मुस्कुरा रहें है तो..
मुस्कुराने की कोशिस कर रहें है..।
और हम क्या कर रहें है..?

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