मंगलवार, 30 सितंबर 2025

स्वयं को देखिए..

हम जब हताश और निराश होते है..तो अपने चारों ओर देखते है..इस उम्मीद से की कंही से कोई आस की नजर आ जाये..
मगर क्या होता है..??
अक्सरहाँ सांत्वना के सिवा और कुछ नही मिलता..मगर ऐसे समय मे सांत्वना भी बड़ा काम आता है..।

हम अक्सरहाँ अपने समस्या का निराकरण के लिए इधर-उधर भटकते है.मगर इसका निराकरण हमारे स्वयं के अंदर ही है..।।
हम अक्सरहाँ जब सब जगह से हार जाते है,तब स्वयं के करीब आते है..और स्वयं से सवाल करते है..तब जादू होता है..क्योंकि स्वयं से सवाल करने पर स्वयं से जबाब मिलता है..।


आपने आखरी बार स्वयं को कब देखा था..या खुद के साथ कब समय बिताया था..
शायद याद नही होगा..या फिर जेहन में सवाल आया होगा कि ये क्या होता है..
सबसे पहले ये क्या होता है..इसका जबाब दे देता हूँ..स्वयं के साथ समय बिताने का मतलब स्वयं का अवलोकन करना
आप एक दिन,एक सप्ताह,एक महीना ,एक साल या फिर अबतक के पूरे जीवन का अवलोकन कर सकते है..
आपने क्या पाया,क्या खोया..आपमें किस तरह की कमियां और खूबियां है..इस तरह से स्वयं का अवलोकन कर सकते है..।

इसे करने से क्या होगा..??
साधारण शब्दों में कहू तो,हमें हमारे परेशानियों से छुटकारा या फिर रास्ता मिलेगा..या फिर भविष्य में होने वाली गलतियों से बच सके..अतीत में जो गलतियां हो चुका है,उस अपराधबोध से छुटकारा मिलेगा..
और जीवन जीने का अलग नजरिया मिलेगा..।।

स्वयं को कैसे देखे..??
बड़ा ही आसान है..
यंहा में 2 तरीका बताता हूँ..
1st:- आयने के सामने चुपचाप खड़े हो/बैठ जाये कम से कम 5-10 मिनट और सिर्फ स्वयं को देखते रहे..
ढेर सारे सवाल जेहन में आएंगे उसे आने देंगे..तबतक जबतक आना ना बंद हो जाये..
2nd :- रात में सोते वक्त अपने पूरे दिन के क्रियाकलाप का अवलोकन करें, आपने क्या अच्छा किया,कंहा गलती की..
आप इस तरह से 1 महीने,1साल या फिर अबतक के अपने पूरे जीवन का अवलोकन करें..

ये एक दिन नही रोज करें..
अगर रोज नही तो कम से कम सप्ताह में 1 दिन तो जरूर करें..
देखिए जिंदगी में किस तरह से बदलाव आता है..
वो भी सिर्फ स्वयं को देखने से...😊

दुर्गा पूजा और कन्या भोज

अभी नवरात्रा चल रहा है,और आज अष्टमी है और महागौरी का पूजन है..
 "श्वेत वृषे समारुढा स्वेताम्बरधरा शुचिः
  महागौरी शुभं दद्दानमहादेवप्रमोददा ।

नवरात्र(दुर्गापूजा) से अनेक यादें बचपन की जुड़ी हुई है..
इनमें से एक यादें जो ज्यादा पुरानी नही है,मगर आज छोटे-छोटे कन्याओं को भोजन करके आते हुए देखते हुए सहसा वो सवाल मन में जागा,जो उस समय जागा..।(नवरात्र में कन्याओं को भोजन कराया जाता है,नवदुर्गा का स्वरूप मान के)

चलिए वो वृतांत सुनाता हूँ..
5-6 छोटी-छोटी लड़कियां(इन सब की उम्र 5-10 के बीच मे था) एक जगह खड़ी थी..
इनमें से जो सबसे बड़ी थी..वो सहसा एक छोटी लड़की से बोलती है- तू भी आ गई..वो छोटी लड़की जबाब देती है,ऑन्टी ने सबको बोला था आने को..।
बड़ी वाली लड़की उधेड़बुन में थी और सभी एक जगह ठिठक सी गई थी..।
फिर कुछ सोचने के बाद बड़ी वाली लड़की ने कहा अच्छा ठीक है चलो..और सबको हिदायत दी कि, इसके बारे में कोई नही बताएगा..(क्या नही बताएगा..??)

कुछ घन्टों के बाद वापस में भी घर की और आ रहा था,और ये लोग भी कन्या भोज खाकर वापस आ रही थी..
सभी खुश थे,सभी के हाथ मे कुछ-न-कुछ था,किसी के हाथ मे खिलौने तो किसी के हाथ मे कॉपियां.. सबके चेहरे पे खुशी था..।
मगर एक सवाल मेरे जेहन में था की..
आखिर कोई, क्या नही बताएगा..??
मैं इस सवाल को जानने का इच्छुक नही था..
मगर ये सब जिस और जा रहे थे,उस और में भी जा रहा था..
(अजीब है ना..हमारे गाँव मे हरेक कोई हरेक चेहरा को पहचानता है,अगर कोई नया चेहरा दिखे ,तो हम एक-दूसरे से पूछते है..आखिर ये कौन है..?? मगर शहरों में आपके बगल में कौन रहता है..हम ये नही जानते..??)
अचानक उस समूह में से एक छोटी लड़की दौड़ी...और माँ कहकर चिल्लाई..और माँ ने मुस्कुराते हुए गले से लगा लिया..
मेरे जेहन में जो कुछ घंटे पहले सवाल था,उसका जबाब मिल गया था..
आखिर क्यों बड़ी वाली लड़की ने उस छोटी लड़की से सवाल किया था..की तुम भी आ गई..??
दरसल वो छोटी लड़की मुस्लिम थी..😊

मेरे सवाल का जबाब भी मिला,और न जाने एक आत्मिक आनंद की अनुभूति महसूस हुई..।।

भारत का हरेक नागरिक पहले भारतीय है..
और हरेक भारतीय सनातनी है..।
चाहे हमारा जाति और धर्म कुछ और क्यों न हो..।

मैं कंहा था..मैं कंहा हूँ

मैं कंहा था,मैं कंहा हूँ..??
मेरे क्या सपने थे..अब कोई सपने नही..
पहले क्या होंसला था,अब कोई हौंसला नही..
पहले क्या-क्या इच्छायें था,अब कोई नही..।।

मैं कंहा था,मैं कंहा हूँ..
जिंदगी के दौड़ में आगे बढ़ने के बजाय..
जैसे में पीछे ही आ रहा हूँ,या फिर थम सा गया हूँ..।।
अगर खुद से पुछु..
क्या है मेरी उपलब्धियां..??
तो जबाब देना बड़ा आसान है..
क्योंकि कोई उपलब्धियां ही नही है..।।

मैं कंहा था,मैं कंहा हूँ..
सच कहूं तो.. 
पहले भी मैं कंही नही था..
मगर मेरे कुछ सपने थे,कुछ आंकाक्षायें थे..
अब कुछ भी नही..
एक दुष्चक्र में फंसा हुआ हूँ..
उसी में चक्कर काट रहा हूँ..

मैं कंहा था,मैं कंहा हूँ..??


सोमवार, 29 सितंबर 2025

विश्व हृदय दिवस..

आज कौन सा दिवस है..??
हमें क्या..विश्व के 95% से ज्यादा आबादी को पता नही होगा..की आज कौन सा दिवस है..??
मगर हरेक लोग के घर में,कोई न कोई इस रोग से जुड़े होंगे..

हां आज "विश्व हृदय❤️दिवस" है..और हम हरेक साल 29 सितंबर को विश्व हृदय दिवस मनाते है..इसकी शुरुआत 2000 में 'वर्ल्ड हार्ट फेडरेशन'(WHF) द्वारा किया गया..लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए..।


हरेक साल विश्व मे ~6.4 करोड़ लोग हृदय 🖤रोग के शिकार होते है..और हर मिनेट विश्व मे 38 लोग इसके शिकार होते है जिस कारण हर तीसरा मौत इसके कारण होता है..।

आखिर हृदय❤️ संबंधित बीमारी क्यों होता है..??
हाई ब्लड प्रेशर,खराब डाइट,लंबे समय तक बैठना,स्मोकिंग,लंबे समय तक तनाव, डाइबिटीज & मोटापा, कम नींद लेना..ये प्रमुख कारण है..।

इसका ❤️ख्याल कैसे रखें..
हेल्थी डाइट, व्यायाम, स्ट्रेस मैनेजमेंट और भरपूर नींद, वजन कंट्रोल, नो स्मोकिंग..

❤️हमारे दिल से 96 हज़ार किलोमीटर लंबी ब्लड वेसल्स जुड़ी होती है..ये पूरे शरीर से खून इकट्ठा करता है और ऑक्ससीजेनेटेड खून पूरे शरीर तक पहुचाता है.. एक इंसान की ब्लड वेसल्स से पृथ्वी को 2 बार लपेट सकते है..


खेल,क्रिकेट,मीडिया और राजनीति...

क्या आपको पता है..भारत का राष्ट्रीय खेल कौन सा है..?? शायद पता होगा..बचपन में कभी न कभी..तो जरूर पढ़ा होगा..मगर ज्यों-ज्यों होश संभाला होगा त्यों-त्यों उसे भूल गए होंगे..??

अगर आपसे खेल का नाम पुछु तो आप, कम-से-कम 10-20 खेल का नाम तो जरूर बता पाएंगे..

अगर उनमें से कितना खेल खेलना आता है,ये पुछु..तो आप कम-से-कम 1-2 गेम का नाम जरूर बता देंगे..

अगर कोई खेल खेलने के लिए कहा जाए.. तो आप किसी आउटडोर गेम में से,आप सर्वप्रथम क्रिकेट को चुनेंगे...(ये बात महिला खिलाड़ी पे भी लागू होता है,बस उसे खेलने का मौका मिले तो वो सर्वप्रथम क्रिकेट ही चुनेंगे)

आखिर क्यों..क्रिकेट को चुना जाएगा..??

क्योंकि क्रिकेट पे कुल खेल बजट का 80% खर्च किया जाता है,मीडिया का 95% कवरेज सिर्फ क्रिकेट पे होता है..और 100% राजनीति भी सिर्फ क्रिकेट पे होता है..

क्रिकेट को इसलिय चुना जाएगा..

क्योंकि यंहा पैसा,शोहरत,राजनीति सबकुछ है..मगर अन्य खेल में तीनों में से कोई चीज नही है... भारत मे 90% मैदान सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट के लिए रिजर्व है..अन्य खेल के लिए मैदान तक नही है..तो अन्य संसाधनों की बात तो छोड़िए..

मीडिया का अन्य खेल से बेरुखी...क्रिकेट से इनको इतना लगाव है कि खिलाड़ी किस ब्रांड की घड़ी और चढ़ी पहनते है,यंहा तक कि खबर रखते है..मगर किसी अंतरराष्ट्रीय खेल का इवेंट भारत में हो रहा है,इसका खबर तक नही रखते..

आज हरेक के जुबान पर एशिया कप(2025)..का नाम है...क्या आपको पता है... भारत ने एशिया कप(2025) में साउथ कोरिया को फाइनल में हराया..??


आपको लग रहा होगा कि मैं क्या बात कर रहा हूँ..हां मैं सही कह रहा हूँ..हॉकी एशिया कप में भारत ने दक्षिण कोरिया को हराया..4-1 से..।

पता है ये इवेंट कंहा हुआ था..??बिहार के राजगीर में...।एक बात और पता है...?? इस इवेंट में पाकिस्तान ने भाग नही लिया था...क्या..हां पाकिस्तान ने बायकॉट किया था..ये कहकर की भारत ने पाकिस्तान पर हमला किया है,इसलिय हम भारत मे सुरक्षित महसूस नही करेंगे..।।

मगर अफसोस न इसपे राजनीति हुई और न ही मीडिया की कवरेज और न ही लोगों तक खबर पहुंची..

भारत की 90% आबादी को तो ये भी पता नही होगा..की हरमनप्रीत सिंह कौन है..??

मगर भारत के 90% लोगों को वैभव सूर्यवंशी की उम्र,हार्दिक पांड्या का हेयर का रंग तक पता होगा...आखिर क्यों..??

जब हम कल फाइनल क्रिकेट मैच देख रहे थे..


उसी दिन दिल्ली में "विश्व पैरा एथलेटिक्स" में शैलेश और वरुण ने  हाई जम्प में गोल्ड और कांस्य पदक जीता..।।


एक पैरा एथलेटिक्स की जिंदगी अपने आप मे सराहनीय है,ऊपर से जब आप खेलते हो,और पदक जीतते हो तब आप और प्रसंशानीय हो जाते है..आपका जीवन उन लाखों निराश लोगों के जिंदगी में प्रेरणा का काम कर सकता है..मगर इनकी सारी उपलब्धियां स्वयं तक ही रह जाती है..क्योंकि मीडिया को TRP से मतलब है..ऐसे खबर से नही जो जिंदगी को बदल सके..बल्कि ऐसे खबरों से है.. जो आपके जिंदगी में आक्रोश,नीरसता और घृणा पैदा करें...

आपने न्यूज़ देखा है..कभी गौर से देखियेगा..वो क्या दिखाते है..सच कहता हूँ, आप न्यूज़ चैनल उस नजरिये से तो नही देखेंगे,जिस नजरिये से कल तक देख रहे है..।।

अन्य खेल में भारत के लोगों की अभिरुचि क्यों नही है..??

ऐसा नही है कि अभिरुचि नही है..बल्कि वो चीज उन तक पहुंच ही नही पाता..पैसा,मीडिया,TRP, राजनीति सबकुछ क्रिकेट के पास है..जबतक इसे अभिकेंद्रित नही किया जाएगा तबतक भारत मे अन्य खेलों का उत्थान नही हो पायेगा..।।



शनिवार, 27 सितंबर 2025

अधूरे सपने..

अधूरे सपनों के साथ जीना,कितना दूभर है..
ये कौन जानता है..??
ये वही जानता है..
जो अधूरे सपनों के साथ जी रहा है..
हरपल कुरेदता है स्वयं को,
हरपल कोसता है स्वयं को..
काश थोड़ा और मेहनत कर लेता,
या फिर एक और मौका मिल जाता..
तो शायद कहानी कुछ और होता..।।


अधूरे सपनों के साथ जीना,कितना दूभर है..
ये कौन जानता है..??
ये वही जानता है..
जो अधूरे सपनों के साथ जी रहा है..।।

गुरुवार, 25 सितंबर 2025

सर्किल ऑफ हैबिट..

प्रकृति और हमारे जिंदगी में सर्किल(वृत,चक्र) का महत्वपूर्ण योगदान है..
हमारे आसपास जितने भी चीज है,उसमें से अधिकांश चीजें सर्किल के रूप में ही है,या फिर उसका स्वरूप कैसा भी हो उसका अंत एक सर्किल में ही होता है..।।

मगर हम आज सर्किल पे बात नही, बल्कि आदतों का चक्र(circle of habit) पर बात करेंगे..।।
हममें से हरेक लोग आदतों से घिरे हुए है,अच्छी और बुरी दोनों आदतों से..।

कुछ आदतें जिंदगी का हिस्सा बन जाते है...खासकर अच्छी आदतें..ये आदतें स्वयं को तो परेशान नही करता,मगर हो सकता है,इन आदतों के वजह से दूसरे परेशान हो😊..।
जैसे सुबह उठना, प्राथना करना,स्वछता, स्वध्याय,अनुशासन इत्यादि..
ये आदतें स्वयं को अच्छा लगता है,इसलिय ये बोझ नही लगता..।।

वंही कुछ आदतें बोझ बन जाती है..??
आखिर क्यों..??
क्योंकि उन आदतों को हम स्वयं भी गलत मानते है..
इसलिय ये आदत बोझ बन जाती है..।
जैसे :-धुम्रपान,मद्यपान,आलस्य,क्रोध इत्यादि..।

हममें से 99.9% लोग जानते है,कि ये गलत है..और इनमें से अधिकांश लोग स्वयं या परिवार के कारण इन आदतों को छोड़ना चाहते है..
अधिकांश लोग कभी-न-कभी इसे छोड़ना चाहते है,मगर इसे कम ही लोग छोड़ पाते है..
आखिर क्यों..??
क्योंकि हममें से 99% आदतों के सर्किल में फंसे हुए है..
और उन्हें पता ही नही है कि कंहा से निकलने है..??

तो फिर क्या करें..??

सबसे पहले हमें अपने सर्किल के बिंदु(point) को पहचानना होगा..की मेरे आदतों का सर्किल कितना बड़ा है..
हमारे आदत जितने पुराने होंगे उतना ही बड़ा सर्किल होगा..

इसके लिए हमें अपने अतीत में जाना होगा..क्योंकि वो बिंदु का पता अतीत से ही चलेगा जंहा से सर्किल बनना शुरू हुआ था..
और खुद से सवाल पूछना होगा..आखिर इसकी शुरुआत हमने क्यों,और किस परिस्थितियों में किया था..??

क्या अब भी वो परिस्थिति है,या उस जैसी परिस्थिति है..।
अगर हां, तो आप उसी बिंदु पे है,जंहा से आपने इन आदतों की शुरुआत किया था..आपके पास सुनहरा मौका है,इन आदतों के चक्र से निकलने का..।

अगर उस जैसी परिस्थितियां अभी नही है,तो आप उस चक्र से अभी निकल तो जाएंगे,मगर कुछ दिनों के बाद आप फिर से उस चक्र के परिधि में आ जाएंगे..और ये चक्र निरंतर चलता रहेगा, और दिन-प्रतिदिन बड़ा होता जायेगा..।।

हममें से कुछ लोग होते है,जो अपने दृढनिश्चय और आत्मविश्वास के बूते इस सर्किल से निर्णय लेते ही निकल जाते है..
इसके लिए इतनी शक्ति चाहिए होती है,जितना पृथ्वी के कक्ष से किसी वस्तु को बाहर जाने के लिए..।
जो वस्तु(उपग्रह) पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल से निकल नही पाते है,उसका क्या हश्र होता है..कभी-कभी हम में से कुछ मनुष्य का भी यही हश्र होता है..।।

इसलिए अपने आदतों के चक्र से छुटकारा पाने के लिए हमें उन जैसे परिस्थितियों को ढूंढ़ना होगा,जिन परिस्थितियों में हमने इसकी शुरुआत किया था..
अन्यथा इस चक्र से निकलना बड़ा दूभर है..।।

बुधवार, 24 सितंबर 2025

रेलवे स्टेशन और बुक स्टॉल..

आपने आखरी बार रेल से कब सफर किया था..??

आपने आखरी बार रेल में किताब या अखबार कब पढ़ा था..??

आपने आखरी बार रेलवे स्टेशन पर बुक स्टॉल कब देखा था..??

आपने आखरी बार रेलवे स्टेशन के बुक स्टॉल से बुक कब खरीदा था..??

मैं पूरी उम्मीद के साथ कह सकता हूँ कि,आपको बिल्कुल याद नही होगा कि ,आपने कब रेल सफर के दौरान बुक पढ़ा या बुक स्टॉल देखा..।।

इसमें कोई ताज्जुब की बात नही है,क्योंकि दिनप्रतिदिन हमारी पढ़ने की क्षमता कम होता जा रहा है..इसलिय आप अफसोस न करें कि आपने रेल सफर मोबाइल देख के बिताया..।।

मगर अफसोस हमारे किताब पढ़ने की दूरियां के वजह से रेलवे स्टेशन का बुक स्टॉल गायब होता जा रहा है..
मुझे फोन बूथ की याद आती है..जो अब लुप्त हो चुका है..
कंही ऐसा ना हो कि बुक स्टॉल भी रेलवे स्टेशन से गायब हो जाये..।।
पहले कोई भी व्यक्ति सफर के दौरन कुछ-न-कुछ पढ़ने के लिए खरीदता ही था,भले ही वो पढ़े ना,पेज ही पलटे मगर खरीदता जरूर था..
मगर आज..हममें से कितने लोग है जो रेलवे सफर के दौरान बुक/पत्रिका खरीदते है..शायद न के बराबर..।।
इसलिय तो भारत के 60% स्टेशन से बुक स्टॉल गायब हो चुके है..।।

अगर आप जब भी सफर करें तो एक बुक या पत्रिका जरूर खरीदे,शायद आपके खरीदने से वो बुक स्टॉल एक दिन और बंद होने से बच जाए..।।

पता है बुक पढ़ने के क्या-क्या फायदे है..??

मंगलवार, 23 सितंबर 2025

दुःख..

कुछ चीजें हमारे हाथ मे नही होता है,
और जो चीज, हमारे हाथ मे नही होता है,
उसके लिए अफसोस करना,और खुद को तकलीफ में डालना बेबकूफी नही तो,और क्या है..??

हममें से आधे लोग बेवजह के तकलीफ में है..
और इस तकलीफ से आपको,सिर्फ और सिर्फ आपके सिवा और कोई नही निकाल सकता..।।

क्या आप दुःखी है..??
अगर हां..
तो फिर से सोचिये..
क्या आप सही में दुःखी है..??
अगर फिर से हां..
तो आप..अपने तकलीफ का कारण लिखिए..।।
हां पहले लिख लीजिये तब आगे पढियेगा..
क्या आपने लिख लिया/सोच लिया..


अगर हां...
तो इससे कैसे छुटकारा पाया जा सकता है..
अब ये लिखिए..।।

हममें से आधे लोग इसलिए दुःखी है कि,उनके आस-पास के लोग दुःखी है..।उस आस-पास के लोगों के जिंदगी में बदलाव लाना उतना जल्दी संभव नही है,जितना जल्दी स्वयं के अन्दर बदलाव लाना..।।
इसलिय स्वयं के अंदर बदलाव लाये और दुःख के दलदल से बाहर निकलिये..।।
जिसे आप दुःख/तकलीफ मान बैठे है..वास्तव में,वो जिंदगी का अभिन्न हिस्सा है..बिना उसके जिंदगी में प्रगति संभव नही है..।।

बस अपना थोड़ा नजरिया बदलिए..
और देखिए..
आपके जिंदगी में दुःख, है, ही नही..।

दुःख और सुख दोनों पानी के बुलबुले की तरह क्षणभंगुर है..
बुलबुला पानी से बनता है,और पानी मे ही विलीन हो जाता है..।
मगर हम मनुष्य सबकुछ भूल कर बस उस बुलबुले की छवि में ही खोये रहते है..होना ये चाहिए कि हमें पानी की तरह आगे बढ़ जाना चाहिए..।।

दुःख का सबसे बड़ा कारण जिंदगी में ठहराव का है..
आप जिस उम्र में हो..
आप नित प्रतिदिन कुछ-न-कुछ अलग करते रहे,या फिर अलग तरीके से करते रहे...।।







शनिवार, 20 सितंबर 2025

किताब और जिंदगी

पहले मैं सोचा करता था,औरतें इतनी पूजा क्यों करती है..
फिर मैंने सोचा-
"हिन्दू नारी इतनी असहाय होती है,उसे पति से,पुत्र से,सभी से इतना लांक्षन,अपमान और तिरस्कार मिलता है कि पूजा-पाठ न हो तो पशु बन जाये।पूजा पाठ ने ही हिन्दू नारी का चरित्र अभी तक इतना ऊंचा रखा है..।"

क्या आप बता सकते है की ये पंक्तियां किस पुस्तक से लिया गया है..??
मैं भी कमाल करता हूँ,कंहा से बता पाएंगे आप..कल तक तो मैं भी अनजान था इन पंक्तियों और इस रहस्य से..।।

सालों से इच्छा थी ये पुस्तक पढ़ने की मगर पढ़ने का मौका ही नही मिला..अमेज़न,फ्लिपकार्ट पे सर्च करके कार्ट में कई दफा रखा,मगर कितने पुस्तक खरीदे और पढ़ लिया मगर इसे पढ़ने से बार-बार वंचित ही रह जाता था..।

मगर इस बार जब अपने घर से आ रहा था,तो स्टेशन पर ये बुक दिखी..मैंने बुक इसलिय नही खरीदी की मुझे पढ़नी थी,क्योंकि मैंने इसलिए खरीदा,की मेरे खरीदने से, शायद ये बुकस्टाल शायद एक दिन और चल जाये।(स्टेशन से लगभग बुक स्टॉल गायब हो चुके है,आज से 5 साल पहले तक लगभग हरेक स्टेशन पर आपको बुक स्टॉल मिल जाता,मगर आज दुर्लभ होता जा रहा है)
ये पुस्तक 1949 में प्रकाशित हुई थी,मगर आज भी ये हिंदी साहित्य(उपन्यास)में अपना अग्रणी स्थान रखता है..
इस पुस्तक का नाम "गुनाहों का देवता" है,जिसे धर्मवीर भारती ने लिखा है..।

इन्होंने लेखनी के माध्यम से प्रेम की नई ऊंचाइयां दी है...
इन्होंने इस पुस्तक में उन पहलुओं को भी छुआ है जो हमें वर्तमान में देखने को मिल रहा है..
"लिव-इन-रिलेशन"आज नया नाम है,मगर चंदर और पम्मी के बीच मे 1949 में ही था..और धर्मवीर भारती जी ने बखूबी प्रेम और लिव-इन-रिलेशन के बारे में बताया है..
एक आतिम्क है,तो दूसरा शरीरिक..शारीरिक भूख जब एक समय पर भर जाता है,तो दोनों के बीच में दूरियां बढ़ जाती है,जो लिव-इन-रिलेशन टूटने का सबसे बड़ा कारण है..।।
आत्मिक भूख कभी नही मरती..ये तो एक दूसरे की पूर्ति के लिए जान तक न्यौछावर कर देते है..।।

प्रेम का स्थान वासना से ऊपर है..जब हम प्रेम के माध्यम से वासना की पूर्ति करते है,तो प्रेम खत्म हो जाता है..।

इस पुस्तक के मुख्य पात्र- चंदर,सुधा,बिनती,पम्मी,गेसू इत्यादि है..
सबका अपना-अपना व्यक्तित्व है जो हमें कई सीख देता है..

इस पुस्तक के कुछ प्रमुख अंश-
जीवन मे अलगाव,दूरी,दुख,और पीड़ा आदमी को महान बना सकता है।भावुकता और सुख नही।
•"ये आज फिजा खामोश है क्यों,
    हर जर्रे को आखिर होश है क्यों?
   या तुम ही किसी के हो न सके,
   या कोई तुम्हार हो न सका।"

कभी-कभी एक व्यक्ति के माध्यम से दूसरे व्यक्ति की भावनाओं की अनुभूति होने लगती है।

मैं ईसाई हूँ, पर सभी अनुभवों के बाद मुझे पता लगता है कि हिंदुओं के यंहा प्रेम नही वरन धर्म और सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर विवाह की रीति बहुत वैज्ञानिक और नारी के लिए सबसे ज्यादा लाभदायक है।उसमें नारी का थोड़ा बंधन चाहे क्यों न हो लेकिन दायित्व रहता है,संतोष रहता है,वह अपने घर की रानी रहती है।

मनुष्य का एक स्वभाव होता है।जब वह दूसरों पर दया करता है तो वह चाहता है कि याचक पूरी विनम्र होकर उसे स्वीकारे।अगर याचक दान लेने में कंही भी स्वाभिमान दिखलाता है तो आदमी अपनी दानवृति और दयाभाव भूलकर नृशंसता से उसके स्वाभिमान को कुचलने में व्यस्त हो जाता है

ये पुस्तक हरेक युवा को पढ़नी चाहिए खासकर उन्हें जो प्रेम के दहलीज पर कदम रख रहे है..धर्मवीर भारती ने खुद इसे 23 साल की उम्र में लिख दिया था..मगर इसे पढ़ने और समझने के लिए 25 की उम्र काफी है..।
अगर आप 25 से पहले इसे पढ़ लेते है तो आप अपने प्रेम को नई ऊंचाइयां दे पाएंगे..।
मगर आजकल तो प्रेम...कोपलें फूटने से पहले ही,हो जा रहा है..आज की जेनरेशन 100 सेकंड की वीडियो पूरा नही देख पाता है तो 100-200 पेज की पुस्तक कंहा से पढ़ पाएंगे..।।

मैं कहूंगा आज नही तो कल ये पुस्तक जरूर पढ़ें..
क्योंकि न ही प्रेम की उम्र होती है,और न ही वासना की कोई सीमा..
ये पुस्तक आपको प्रेम और वासना के पराकाष्ठा और अवसान से अवगत कराएगा..।।

गुरुवार, 18 सितंबर 2025

कस्तूरी मृग और मनुष्य

कबीर दास जी कहते है-"कस्तूरी कुंडली बसै,मृग ढूंढे वन माहि"..यानी कस्तूरी(सुगंध/इत्र) मृग के नाभि में ही विद्यमान है,मगर वो उसे जंगल मे ढूंढता रहता है..


हमलोग भी तो यही करते है..ताउम्र भटकते रहते है..
मगर मृग से भी दयनीय स्थिति हममें से अधिकांश लोगों की है...
मृग को पता है कि वो क्या ढूंढ रहा है..
मगर हममें से अधिकांश लोगों को पता ही नही है कि हमें क्या ढूंढना है,ताउम्र भटकते रहते है,बिना उद्देश्य के..
कुछ लोग होते है जो अपने उद्देश्य के लिए भटकते है..
मगर इनमें से कुछ ही लोग होते है,जिन्हें अपने उद्देश्यपूर्ति में सफलता मिलती है..
क्योंकि वो कस्तूरी मृग की तरह भटकते नही..
वो सबसे पहले स्वयं का अवलोकन करते है..(हममें से 95% स्वयं का अवलोकन नही करते,जबकि सफलता में 50%इसी का योगदान है)और अपने कमियों को दूर करते है,और अपने खूबियों पे काम करते है..।।

जिस तरह कस्तूरी मृग दर-दर भटकता है,उसी तरह हम मनुष्य भी दर-दर भटकते है,जबकि लक्ष्यपरक जीवन का उद्देश्य हमारे अंदर ही छिपा हुआ है...
बस स्वयं का अवलोकन करना है..।।


बुधवार, 17 सितंबर 2025

शिकायत करना बंद कीजिए..

हममें से अक्सरहाँ लोग रोज किसी-न-किसी बात को लेकर शिकायत करते रहते है..
कभी परिवार से,कभी समाज से,कभी संसार से और कभी भगवान से..
ये शिकायत है कि कभी खत्म होने का नाम ही नही लेता..

 
क्या शिकायत करना अच्छी बात है..??
हां बिल्कुल, शिकायत करनी अच्छी बात है,मगर एक सीमा तक..मगर हमें सीमा मालूम ही नही है..।
ये सीमा क्या होना चाहिए..??
जब हमारे शिकायत से,दूसरों को अपनी गलती का अहसास हो,ना कि उसे शर्मिंदा,और हमारे प्रति गुस्सा का भाव जागृत हो..।
शिकायत करते वक़्त अपनी वाणी पर संयम रखना बहुत जरूरी है,क्योंकि हममें से अक्सरहाँ लोग शिकायत के आड़ में अपना गुस्सा/भड़ास निकाल रहे होते है..।

शिकायत करने से छुटकारा पाया जा सकता है..??
हां,बिल्कुल..
जब भी आपको किसी की शिकायत करना हो, तो खुद को उसके जगह रख कर देखें..
देखिए आपके अंदर जो किसी के प्रति नकारात्मक भाव था वो सकारात्मक भाव मे परिवर्तित हो जाएगा..।।

आपने कभी गौर किया है,आप शिकायत किस-किस से करते है..??
•अक्सरहाँ शिकायत हम,अपने चाहने वालों से ही करते है..
और जो हमसे कमजोर है,या फिर किसी सेवा प्रदाता(व्यक्ति/संस्था)से करते है..
क्या हमने कभी, खुद से खुद का शिकायत किया है..??
शायद नही,जबकि हम खुद इतनी गलतियां करते है की शिकायत का अंबार लग जाये,मगर हमें शिकायत सुनने की आदत नही है,सिर्फ शिकायत करने की आदत है..।।

जब हमें शिकायत सुनना अच्छा नही लगता,तो फिर दूसरे को कैसे अच्छा लगेगा.. जिस तरह हम दूसरों से अपेक्षा करते है कि वो शिकायत,शिकायत की तरह करें, उसी तरह हमें भी शिकायत,शिकायत की तरह करना चाहिए..।।

सबसे बड़ा सवाल ये है कि- शिकायत क्या होता है..??
हां जरा सोचिए..शिकायत क्या होता है..??
दूसरों को गलतियां से अवगत कराना,ना कि उसे गलतियों का अहसास कराना..
जब हम किसी को गलतियों से अवगत कराते है,तो हम उसके नजर में उठ जाते है,वंही जब हम किसी को गलती का अहसास कराते है, तो उसके नजर में गिर जाते है..

इसीलिए अब जब भी किसी से शिकायत करना हो तो उसे सिर्फ गलतियों से अवगत कराए ना कि अहसास कराए..।।

सोमवार, 15 सितंबर 2025

करुणा का भाव

हम में से सभीको कभी-न-कभी किसी के कारण जाने-अनजाने में तकलीफ पहुंचा होगा..
उसके बाद क्या होता है..??
हम उनके बारे में भला-बुरा कहने और सोचने लगते है..।
आखिर ऐसा क्यों होता है..??
शायद हमारी अज्ञानता के कारण..।
एक तो हमें तकलीफ पहुँचाने वाले अपने अपराध से अनभिज्ञ है..
ऊपर से हम भी,उन्हें अपराधी बना के अपराध कर बैठते है..।
बल्कि होना ये चाहिए कि,उनके प्रति हमारे अंदर करुणा का भाव होना चाहिए..और उनके हित के लिए कामना करना चाहिए..।।


जरा सोचियेगा..
क्या आपने कभी जानबूझकर गलती किया है..??
जब आप जानबुझकर गलती नही कर सकते तब दूसरा कोई कैसे जानबूझकर गलती कर सकता है..।।

जब हमारे अंदर करुणा का भाव जाग्रत होता है,तब हमें अपराध तो दिखता है,मगर अपराधी नही..।।

पैसा,मनुष्य और प्रकृति..

"हम ज्यों ज्यों पैसों का अंबार लगाते जाते है,
त्यों-त्यों प्रकृति से दूरिया बढ़ाते जाते है.."


हम जितना पैसों की तंगी से जूझते है,उतना ही प्रकृति को स्वयं के पास पाते है..
और हम जितना ही आर्थिक रूप से सम्पन्न होते जाते है,हम उतना ही प्रकृति से स्वयं की दूरियां बढ़ाते जाते है..।।

मगर अफसोस हम इन सब से अनभिज्ञ होते है..??

जब हम आर्थिक तंगी से जूझ रहे होते है,तब प्रकृति के करीब होकर भी उसे महसूस नही कर पाते है..
वंही जब हम ज्यों-ज्यों आर्थिक रूप से संपन्न होते जाते है..
त्यों-त्यों हम स्वयं को प्रकृति से दूर करते जाते है..।

एक गरीब इंसान प्रकृति के हरेक चक्र को महसूस और सामना करता है,
एक अमीर इंसान प्रकृति के हरेक चक्र से दूरियां बनाता है,और उसे चुनौती देता है..।।

मगर अफसोस..
जीवन के एक चक्र में, अमीर और गरीब दोनों ऐसे जगह पर पहुंचते है..जब इन दोनों के जिंदगी में अफसोस के सिवा कुछ नही रहता..।।
गरीब ये सोच के अफसोस करता है कि प्रकृति के इतने करीब होकर भी कभी उसे जानने का कोशिस नही किया..
वंही अमीर इंसान सबकुछ न्यौछावर करके प्रकृति की अनुभूति पाना चाहता है..।
मगर दोनों के हाथ, अक्सरहाँ खाली हाथ ही लगता है..।

इसीलिए आप जंहा है जैसे है..
सूर्य के तेज का आनंद लीजिये..
चांद की रोशनी का दीदार कीजिये..
तारों की टिमटिमाहट का दीदार कीजिये..
बारिश की बूंदों का रसास्वादन कीजिये..
प्रकृति के हरेक चक्र के साथ स्वयं का तालमेल बिठाइए..।।

क्या पता जिंदगी के दौर में वो सबकुछ आपको प्राप्त हो..
जिसकी आपकी लालसा हो..
मगर आप प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने में सक्षम ना हो..।।

इसीलिए समय है..
प्रकृति के हरेक रंग में खुद को रंगे..
और ऐसा निरंतर करने से.. 
प्रकृति आपको अपने रंग में रंगने लगेगी..।।



खिड़कियां

आपने आखरी बार खिड़कियों से कब देखा था..और क्या-क्या देखा था..??


पहले घर मे खिड़कियां होता था घर से बाहर देखने के लिए....मगर अब खिड़कियां पे हम परदे टांग देते है,इसलिये की कंही कोई बाहर से न देखें..।।

कभी खिड़कियों से बाहर देखें..आपको वो दिखेगा जो किसी को दिख नही रहा है..वो अनंत आसमां, और स्वयं में अनंत शक्तियों का संचय का आभास होगा..।।

मगर अफसोस अब हमने खिड़कियों से बाहर देखना क्या खिड़कियां खोलना भी बंद कर दिया है..।।

हम यू ही परेशान होते है..

हममें से अक्सरहाँ लोग उन चीजों के लिए परेशान है,जो चीज हमारे हाथ मे नही है..।।
मगर हम इन परेशानियों पे कभी गौर ही नही करते..और बेवजह परेशान रहते है..।।
आपने अक्सरहाँ या फिर खुद को बेवजह परेशान होते हुए देखा होगा..
जैसे ट्रम्प का टैरिफ लगाना..इजरायल और ईरान में युद्ध होना,पंजाब में बाढ़ आना,उत्तराखंड में भू-स्खलन होना..
इत्यादि..इन घटनाओं का सीधे हमारे ऊपर कोई प्रभाव नही पड़ता..और इसके लिए हम सिर्फ चर्चा और सांत्वना के सिवा और कुछ नही कर सकते..।

चलिए और करीब से कुछ घटनाओं को देखते है,जो हमे परेशान करता है..
आप कभी सफर पर निकलते है तो हो सकता है,बस या ट्रैन लेट हो..जब आप को इंतजार करना पड़ता है तो आप पे क्या बीतता है..
आपने कभी गौर किया है..??
आप क्यों परेशान है..जबकि आपके और हमारे परेशान होने से कुछ नही होने वाला है..मगर इन घटनाओं के कारण हम इतना नकारात्मक हो जाते है कि ये हमे सूक्ष्म स्तर पर नुकसान पहुचाता है..।

चलिए दूसरे घटना पर गौर करते है..
एक बच्चा बुरी तरह से रो रहा है..
आप क्या करेंगे..??

आप  नोट बनाये..और देखे की आप किन-किन चीजों से परेशान होते है..और फिर सोचिये,क्या इन कारणों से परेशान होना जरूरी था..।।
जबकि आपके हाथ मे कुछ भी नही था..।।

हम यू ही परेशान होते है..
जबकि परेशान होने का कोई कारण नही है..।।

मंगलवार, 9 सितंबर 2025

नेपाल,सोशल मीडिया और जेन-Z

नेपाल में जो हुआ आप उसे किस नजर से देखते है..??
आपका क्या राय है..??


मैं तो यही सोचता हूँ..जो नेपाल में हुआ वो कंही भी हो सकता है..।।
क्योंकि जो गुलाम है,उससे चलाक मालिक कुछ भी करा सकता है..।।
भले ही हम इसे जेन-Z आंदोलन कहें..



मगर वास्तव में ये हज़ारों किलोमीटर दूर एक हॉल में बैठे कुछ क्रूर और उन्मादी लोगों का हरकत है,जो अपना मनमानी चला रहे है..।।

इसकी शुरुआत कंहा से हुई..??
इसकी शुरुआत नेपाल सरकार के एक फैसले से हुई,जिसमें उन्होंने हरेक सोशल मीडिया के मालिकों से कहा था कि हरेक कंपनी को नेपाल में रेजिस्ट्रेशन,डेटा सेंटर,और कर्मचारी को नियुक्त करने को कहा गया..
मगर इन कंपनी ने कुछ रिप्लाई तक नही किया..जबकि ज्यों-ज्यों समय सीमा नजदीक आ रहा था त्यों-त्यों ये कंपनियां सोशल मीडिया पे राजनेताओं एवं उनसे जुड़े हरेक रिस्तेदारों की रहीश लाइफ स्टाइल की फ़ोटो शेयर इस तरह करने लगे जैसे..कोई युद्ध मे बम के गोले फेकते है..
ये यंही नही रुके..बल्कि ये कंपनियां हरेक प्लेटफार्म पे भ्रस्टाचार से जुड़े मुद्दे की बमबारी करने लगे..

फिर क्या, इन्ही में से किसी एक नेता को चुना जो कल तक पर्यावरण के लिए काम करता(सूदन गुरुंग) था। अचानक इसके पास इतना कुछ कैसे आ गया कि इसने अपनी आवाज जेन-Z तक पहुँचाया..।।



हम आप सोच भी नही सकते..
ये सोशल मीडिया क्या करा सकता है..
नेपाल सिर्फ एक ट्रेलर है..
अगर हम और हमारी सरकार अभी भी सतर्क नही हुए तो ये सोशल मीडिया के आका कंही दूर कोने में बैठकर किसी भी देश को गृह युद्ध या फिर किसी भी युद्ध मे झोंक सकते है और देश की बागडोर अपने हाथ मे ले सकता है(बांग्लादेश,श्रीलंका में भी इसकी परछाई दिखी थी,मगर किसी ने गौर नही किया)..।।

आने वाला कल AI का है..
इसका दूसरा पक्ष इतना भयावह है..की लोग बात तक नही करते..
AI के लिए एक उक्ति है- "अहं ब्रह्मस्मि"

नेपाल में जो हुआ,इस बारे में हरेक लोगों को सोचना चाहिए..
इसमें कई कारण है..
मगर..
"दुनिया पे राज गुलामों के द्वारा ही किया जाता रहा है..
बस हरेक युग मे इसका स्वरूप बदलता रहा है..
इस युग मे हमलोग सोशल मीडिया के गुलाम है.."







अपने बुराइयों को कैसे पहचाने..

जिंदगी बहुत अजीब है..
कल तक जो अच्छे थे,आज वो बुरे हो गए..
क्यों..??
क्योंकि वो आदमी पहचानने लगे..।।

क्या सच में कुछ लोग बुरे होते है..??
कुछ नही,सब बुरे होते है..।
बस अनुपात का फर्क है..।

आखिर कैसे अपनी बुराइयों को पहचाने..
●अगर आप किसी एक व्यक्ति की बुराई किसी एक व्यक्ति से करते है तो ठीक है..मगर जब आप कई व्यक्तियों की बुराई कई व्यक्तियों से करने लगते है..तब आप खुद..बुरे है..।।
●जब हम किसी एक गलती को छिपाने का प्रयास करते है तब ठीक है,मगर जब हम अक्सरहाँ गलतियां करके दूसरों को दोषारोपण करते है,तब बात गंभीर है..
●जब हमें हरेक चीज में नकारात्मकता दिखने लगे, तो नजरिया बदलने की जरूरत है..
●जब लड़ने से पहले ही हारने के डर हावी हो,तो खुद को तैयार करने का वक़्त है..।।

ना जाने और कई बुराइयां है,जो हमारे जीवन का हिस्सा बन जाता है और हमें पता तक नही चलता..
ऊपर के 3 बुराइयों पे काम करके आप अपने जिंदगी में सकारात्मक बदलाव ला सकते है..
अगर 3 नही कर सकते है तो सिर्फ तीसरे पर ही काम करें..
क्या जादू होता है..??
अगर आप 3सरे बिंदु पर काम करें तो आप अपने जिंदगी में हो रहे जादू को देखना शुरू कर देंगे...😊


शनिवार, 6 सितंबर 2025

बनारस और यादें..

अभी-अभी अचानक बनारस नाम पर नजर पड़ गया..और तुम याद आ गई..।


यू ही बनारस की गलियों में भटकना याद है मुझे,
यू ही BHU के कैंपस में भटकना याद है मुझे..
यू ही गंगा घाट पे भटकना याद है मुझे..
पता है,क्यों..??
शायद तुम्हारा दीदार हो जाये..।

मगर कंहा..??
ऐसी किस्मत पाई थी मैंने.. 
जो तुम्हारा दीदार होता..।।
तुम्हारा दीदार तो ना हुआ..
मगर तुम्हारे कारण कई यादें अबतक जेहन मैं है..।।









बुधवार, 3 सितंबर 2025

क्या हुआ जो फिर गिर गए..

क्या हुआ,जो फिर गिर गए....

होंसला रख, चल खड़ा हो

और चल अपनी मंज़िल की और..।

वो तुम्ही हो,जो गिर के चलना सीखा है..                           एक बार नही कई दफा गिर के चलना सीखा है..              अगर तुम डर जाते,तो क्या तुम फिर चल पाते..??

क्या हुआ जो..फिर गए..

वो तुम्ही तो थे..जिसे अंधेरों से कभी डर लगता था..अब अंधेरा अच्छा लगता है..

वो तुम्ही तो थे..जो काम ठान लिया उसे मुकाम तक पहुचाते थे..

वो तुम्ही तो थे..जो हार कर फिर से एक बार जीतने को खेलते थे..मगर फिर हार जाते थे..मगर फिर भी खेलना नही छोड़ते थे..क्योंकि तुमने खेला था जी जान से..।।

क्या हुआ,जो फिर गिर गए..??

गिरना तो लाज़मी है सफर में,क्योंकि वो सफर..

सफर ही क्या..जिस सफर में थोड़ा ग़म और खुशियां ना हो..

क्या हुआ,जो फिर गिर गए..??

उठ खड़ा हो..इस विराट आसमां को देख..और अपने हौंसले को देख..अपने हौंसले को विराट कर, अपने असफलता को परास्त कर..।।

क्या हुआ, जो फिर गिर गए..??

गिरना तो नियति है..अगर गिर कर उठ ना सके तो फिर सोच ले..क्या होगा..??

उठ खड़ा हो..और अपने नियति से मिल..तबतक आगे चलता चल,जब तक अपने मुकाम को ना पा ले..।।

क्या हुआ,जो फिर गिर गए..??




अवसर कभी खत्म नही होता..

आप कभी हाईवे पे सफर किये है..??
किया ही होगा..
हाईवे और जिंदगी में कई समानता है..
जिंदगी भी तो एक हाईवे की तरह ही है..
ये भी कंही खत्म होती है, या फिर किसी मे मिल जाती है..
(इसपे कभी और बात करेंगे)

हाईवे और गाँव-घर के सड़कों में क्या अंतर है..??
ढेर सारे अंतर आपको नजर आ गया होगा..
मगर सबसे बड़ा अंतर ये है कि आप..हाईवे पे U-टर्न से ही गाड़ी को घुमा सकते है..मगर अन्य सड़को पर आप कंही से भी गाड़ी को घुमा सकते है..।।

माना कि आप.. हाईवे पे सफर कर रहें है और आगे से आपको U-टर्न लेना है..मगर आपका ध्यान कंही और चला जाता है और टर्निंग पीछे छूट जाता है..अब आप क्या करेंगे..??


क्योंकि आप गाड़ी को पीछे कर नही सकते क्योंकि पीछे से आ रही गाड़ी आपको ठोक देगा..क्या करेंगे आप..??
सोच रहे होंगे.. इसमें करना क्या है,आगे वाले टर्निंग से U-टर्न ले लेंगे..।
कितना आसान है..थोड़ा समय लगेगा मगर मंजिल तक तो जरूर पहुंच जाएंगे..।।

यही तो..जिंदगी के साथ होता है..
जिंदगी भी एक हाईवे की तरह है...
हममें से कई लोग असफल होने पर टूट जाते है,उन्हें लगता है जिंदगी खत्म हो गई..।
जो कि गलत है..इन हाईवे के तरह,आगे एक और U-टर्न पॉइंट है..
जो आपको मंजिल तक पहुंचा सकता है..अगर वो भी टर्निंग छूट गया तो क्या हुआ ,आगे फिर एक U-टर्न है..
आप भले ही लक्ष्य से दूर हो रहे है..मगर जब तक आपके अंदर लक्ष्य को पाने की लालसा है तबतक आपके लिए अवसर का द्वार खुला हुआ है..।।
जब आप अपने लक्ष्य को ही भूल जाएंगे...तो अवसर को कैसे पहचानेंगे..।।
इसीलिए चाहे कितनी बार भी असफल क्यों ना हो..
अपने लक्ष्य को ना भूले..
जब तक आपके अंदर लक्ष्य को पाने की लालसा है,तबतक आपको सफल होने से कोई नही रोक सकता..।।

सोमवार, 1 सितंबर 2025

दाग धुलते है..

आपने कभी गंदे कपड़े धोये है..??
अगर हां,तो धोने के बाद आपको क्या बदलाव नजर आता है..??
गंदगी हट जाती है,पहले से ज्यादा साफ नजर आती है..।
है ना..मजेदार बात..।।
आप कहेंगे, इसमें मजेदार क्या है..??


मजेदार बात ये है कि,जब थोड़ी मेहनत करने से कपड़े के दाग धूल सकते है..तो खुद पर मेहनत करने से खुद को क्यों नही संवार सकते है..??
जिंदगी संवारने में जो सबसे बड़ी दुविधा ये है कि हम,अपने  जिंदगी के किस क्षेत्र में काम करें जो संवर जाएं..
क्योंकि कपड़े के दाग दिखते है,तो हम उस जगह को साफ कर देते है..
मगर हममें जो कई दाग है,वो सिर्फ हमें ही दिखते है..इसलिये उसे दूर करने की कोशिस नही करते..
काश वो दाग सिर्फ हमें ही दिख रहे है,वो कई और को दिखता तो हम जरूर उसपे काम करते..क्योंकि कई लोग टोकते,तो कई लोग सलाह देते की ऐसे करने से ये सही हो जाएगा..।।
मगर अफसोस जो दाग सिर्फ हमे ही दिख रहे है वो दिन-प्रतिदिन इतना गहरा होता जाता है कि उसे धुलना नामुमकिन लगता है..कई बार प्रयास करने से भी असफलता हाथ लगती है..और फिर हम उस दाग को और गहरा होने देते है..।।

क्या ये दाग नही हट सकता..??

जरूर एक दृढ़ प्रतिज्ञा और सही दिशा में कार्य करने से ये दाग जरूर हटेंगे..।
सबसे पहले अपने दाग को पहचाने..
ये कब लगते है,और क्यों लगते है..
क्या करें कि ये ना लगे..
इस सब पर अभी कार्य करें.. 
एक नोट बनाये..।
हां अभी..बनाये..
क्या आपने बनाया..
अगर नही,तो प्लीज अभी किसी पेज पे लिखें..
क्या लिखा आपने..
अगर हां..
तो आपके समस्या का समाधान मिल गया होगा..😊।।

हरेक दाग धुलते है..कोई जल्दी,तो कोई देर से..
अगर दाग ना धुले तो..??
निरंतर प्रयास से दाग जरूर धूल जाते है...
पहले जैसा ना सही..
मगर वर्तमान से बेहतर हो जाता है..।

कुछ गलतियां