मैं कर क्या रहा हूँ..??
कभी-कभी मैं सोचता हूँ..
मैं जा किधर रहा हूँ...??
कभी-कभी मैं सोचता हूँ..
मैं व्यर्थ ही जीवन गवां रहा हूँ..।
कभी-कभी मैं सोचता हूँ..
की कुछ सोच ही नही पा रहा हूँ..।
कभी-कभी मैं सोचता हूँ..
की सोचना ही छोड़ दूं..
मगर..
सोचना ही छोड़ दु..
तो फिर कैसे अपने सोच को साकार करू..।
इस सोच ने ही तो..
इस संसार के अस्तित्व को साकार किया..
इस सोच ने ही तो..
इस विश्व का विस्तार किया..
इस सोच ने ही तो..
कई संस्कार का विस्तार कर..
नए कीर्तिमान का निर्माण किया..।
कभी-कभी मैं सोचता हूँ..
की सोचना ही छोड़ दूं..।
मगर..
इस तरह की सोच तब आती है..
जब जिंदगी..
हमारे अनुकूल नही चलती..।
मगर फिर सोचता हूँ..
आखिर हमारे अनुकूल चलती ही क्या है..??
जो चल रही है..
अगर उसे ही ईमानदारी से अपने अनुकूल बना ले..
तो फिर सोचना ही क्या है..।
कभी-कभी मैं सोचता हूँ..
मैं कर क्या रहा हूँ..??
कभी-कभी मैं सोचता हूँ..
मैं जा किधर रहा हूँ...??
कभी-कभी मैं सोचता हूँ..
मैं व्यर्थ ही जीवन गवां रहा हूँ..।
कभी-कभी मैं सोचता हूँ..
की कुछ सोच ही नही पा रहा हूँ..।
कभी-कभी मैं सोचता हूँ..
की सोचना ही छोड़ दूं..।

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