अंधेरे के तलाश में..।
जंहा कोई कोलाहल न हो..
जंहा सिर्फ और सिर्फ घनघोर अंधेरा हो..
जंहा चांद तारों की भी रोशनी न आये..
मैं वंहा..
थोड़ा देर सोना चाहता हूं..।
मैं थोड़ा देर सोना चाहता हूँ..
अंधेरे के तलाश में।
जंहा न कोई सुगंध,और न ही कोई दुर्गंध हो..
मैं थोड़ा देर सोना चाहता हूँ..
जंहा स्वयं का भी, भान न हो..।
मैं थोड़ा देर सोना चाहता हूँ..।
है अगर किसी को उस जंहा का पता..
तो जरूर इल्तला करें..
कब से बेचैन हु मैं..
क्योंकि..
मैं,थोड़ा देर सोना चाहता हूँ..
अंधेरे की तलाश में..।
बड़ा अजीब है..
सिर्फ मैं ही नही,
कई और है..
अंधेरे की तलाश में..।
उनकी बेचैनी को देख कर..
अब मेरे सोने की इच्छा नही रही..।
क्योंकि जो अंधेरा में ढूंढ रहा..
वो अंधेरा कंही, है ही नही..।
मैं ही अंधेरे में भटक रहा हूँ.
और भटक कर थक गया हूँ..
उजाले की तलाश में..।
मैं थोड़ा देर सोना चाहता हूं..
अंधेरे की तलाश में..।।

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