बुधवार, 22 अप्रैल 2026

दायित्व का बोझ

बचपन से लेकर मृत्यु तक हम किसी न किसी बोझ को लेकर जीते ही है..
चाहे वो बोझ शिक्षा का हो,रोजगार का हो,रिश्ते-नाते का हो,परिवार का हो,समाज का हो,आदतों का हो या फिर वर्तमान में सोशल मीडिया का हो..।



हम किसी न किसी बोझ में जी रहे होते है..।।
इसमें से कई बोझ तो हम निरर्थक का ढो रहे होते है..
अगर समय रहते निरर्थक बोझ को नही हटाया तो वो आजीवन आपके जिंदगी का हिस्सा बन जायेगा..।
उस बोझ के कारण न आप खुश रहेंगे और न ही आपके ऊपर वो बोझ लादने वाला..
इसीलिए शुरुआत में ही अगर वो बोझ निरर्थक लगे तो उसे उतार फेंकिये..बिना किसी के फिक्र किये हुए..क्योंकि वो आपको बोझ उठाने में सहयोग तो करेंगे..मगर उसे ढोना आपको ही पड़ेगा..।।

आप किस तरह के निरर्थक बोझ को ढो रहे है..??
या फिर आपको आभास ही नही है,की आप बोझ ढो रहे है..??

बोझ उतार फेंकने का ये मतलब नही की आप अपने दायित्वों से भागे..बल्कि उसी दायित्व का निर्वहन करें जिसे करने में आप सक्षम हो..अन्यथा जिंदगी तकलीफ देह हो जाती है,अगर दायित्व का निर्वहन सही से न हो तो..।

इसका मतलब ये नही की आप दायित्व न ले..दायित्व ले मगर अपने क्षमता और परिस्थितियों को देखते हुए..।।
ये जिंदगी के हरेक क्षेत्र पर लागू होता है.।

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