बुधवार, 24 दिसंबर 2025

खालीपन..

मैं जब-जब खुद को खाली महसूस करता हूँ..

तो मैं,तुम्हारे करीब आ जाता हूँ..

खुद को भरने के लिए..।


तुममें समाहित अथाह ऊर्जा में से..

कुछ ऊर्जा लेकर..

फिर से खुद को ऊर्जावान बनाने के लिए..

मैं तेरे करीब आ जाता हूँ..।


मैं जब भी खुद को खाली महसूस करता हूँ..

मैं तुम्हारे करीब आ जाता हूँ...।




प्यार की पांति..मैं तुमसे

मैं तुमसे मिलना चाहती हूं..
मगर कैसे..
तुम समुंद्र हो तो मैं नदी हूँ..
तुम वटवृक्ष हो तो मैं खजूर हूँ..
तुम गंगा की मैदान हो,तो मैं थार का रेगिस्तान हूँ..।
भला मैं तुमसे कैसे मिल सकता हूँ..।

मैं कुछ नही जानती..
मैं सिर्फ तुमसे मिलना चाहती हूँ..।।

मगर कैसे..??
कैसे समझाऊ तुम्हें..
तुम्हारी सुबह की शुरुआत सूर्य की मीठी तपिश से शुरू होती है,
और मेरी सुबह की शुरुआत,सूर्य की लालिमा की मासूमियत के साथ..।
तुम्हारी रात जब होने को होती है,तो मेरी सुबह होने को होता है..।
तुम्हें अपने चाँद-सितारे को देखने को लाखों खर्च करने होते है,और मेरे चाँद- सितारे यू ही आसमाँ में भटकते मिल जाते है..।।
तुम चलती हो अपने दस हज़ार स्टेप पूरा करने को,
और मैं चलता हूँ,अपने लक्ष्य को पाने को..।
अब तुम्हीं बताओ..
मैं भला कैसे...
तुमसे मिल सकता हूँ..।



क्या सोच रहे हो तुम..

क्या सोच रहे हो तुम..??
यही सोच रहा हूँ कि..
क्या सोच रहा हूँ मैं..।

सच कहूं तो..
कुछ तो सोच रहा हूँ मैं... 
मगर अफसोस क्या सोच रहा हूँ..
यही सोच-सोच कर..
कुछ तो सोच रहा हूँ मैं..।

क्या सोच रहा हूँ..
अब मत ये पूछना..
क्योंकि.. 
यही सवाल तो मैं खुद से..
वर्षों से पूछता आ रहा हूँ की..
क्या सोच रहा हूँ मैं..??

क्या सोच रहा हूँ मैं..??
या फिर क्या खोज रहा हूँ मैं..??
जैसे कस्तूरी मृग भटकता है..
वैसे ही शायद भटक रहा हूँ मैं..।
बस मालूम नही क्यों भटक रहा हूँ मैं..
शायद यही सोच-सोच कर..
कुछ तो सोच रहा हूँ मैं..।।

शायद उस "मैं" के बारे में ही सोच रहा हूँ मैं..
जिस 'मैं" का भान नही है..मुझको..।

जिस मैं से ये ब्रह्मांड है..
वो "मैं",
मैं कैसे हो सकता हूँ..??
शायद यही सोच-सोचकर
कुछ तो सोच रहा हूँ मैं..।।



प्यार की पांति..उसने कहा..

उसने कहा..
मेरे लिए ही सही..
काबिल तो बनो..।
कबतक यू ही..
खुद से मुँह फेरते रहोगे..
कबतक यू ही सबसे मुँह फेरते रहोगे..।

उस काबिल तो बनो..
जिससे अपना मुँह,
मुझको दिखा तो सको..।

उसने कहा..
सिर्फ तुम ही नही गिरे हो..
हरेक रोज कई गिरते है..।
मगर तुम उन जैसा तो न बनो..
जो गिर के उठ न सके..।
मेरे लिए ही सही..
काबिल तो बनो..।

उसने कहा..
कबतक जिंदगी यू ही अकेले काटते रहोगे..
कबतक यू ही सबसे मुँह फेरते रहोगे..
कंही ऐसा न हो..
की ये एकांकीपन तुमसे ही मुँह फेरने लगे..।
मेरे लिए ही सही..
काबिल तो बनो..।

उसने कहा..
मैं भी..भला कबतक तुम्हें झकझोरता रहूंगा..
एकदिन मैं भी कंही थक जाऊंगा..
तो फिर मेरा क्या होगा..??
मेरे लिए ही सही..
काबिल तो बनो..।

उसने कहा..
क्या कहा..??
उसने कहा..
बहुत कुछ कहा..
मगर मैं,नासमझ..
कुछ समझ न पाया..
उसने कहा..
क्या कहा..??


मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

विनोद कुमार शुक्ल

कुछ दिन पहले ही तो आपको पढ़ा था,
कुछ दिन पहले ही तो आपको सुना था..।
किसको पता था की, 
आप यू ही छोड़ के चले जाओगे..।
शायद आपका मकसद पूरा हो गया..
हिंदी साहित्य का फिर से पुनरुत्थान जो आपके द्वारा हो गया..।।


आप आने वाले नई पीढ़ियों के लिए प्रकाशस्तंभ थे..
आपका यू ही छोड़ के चले जाना..
न जाने कितने लोगों के लिए असहनीय है..।।

मगर क्या करें..
जाना तो सबको है ही..तो चल दिये..।
वैसे कई हिंदी साहित्य के पुरोधा को पीछे छोड़ दिये है..
अब नई पीढ़ी..
अपने अनुसार अपनी कहानियां लिखें,पढें और सुने..
हम तो पुराना हो चुके थे,
इसलिए भी चल दिये..।

सच कहूं..
तो पहले शरीर साथ नही दे रहा था..
कुछ दिनों से तो, हाथ भी साथ नही दे रहा था..
कलम पकड़ के कागज पे कुछ उकेड़ नही पा रहा था..
अब तुम्हीं बताओ..
बिना कागज और कलम के, 
कैसे जिंदगी बिताऊँ..??
इसीलिए..
कागज की नाव बनाकर
कलम की पतवार बनाकर..
नोकर की कमीज,पहनकर..
दीवार में एक खिड़की थी,को यादकर में बह चला..
उससे मिलने जिससे सबको मिलना है एक दिन..।








सोमवार, 22 दिसंबर 2025

मैं जब भी..

मैं जब ही इन राहों से गुजरता हूँ..
तुम मुझे हरेक बार ऊर्जावान बना देते हो..
मेरे चेहरे से उदासी हटा कर,ताजगी भर देते हो..।

मैं जब भी इन राहों से गुजरता हूँ..
तुम हरेक बार...
हताशाओं और निराशाओं से भरी जिंदगी को,
दलदल से निकाल कर...
एक नए मुकाम पे खड़ा कर देते हो..।

मैं जब भी इन राहों से गुजरता हूँ..
तुम हरेक बार..
मेरे मुरझाये हुए चेहरे पे मुस्कान बिखेर जाते हो..।

मैं जब भी इन राहों से गुजरता हूँ..
तुम हरेक बार...
मुझे नए जिंदगी से रु-ब-रु करवाते हो..।

मैं जब भी इन राहों से गुजरता हूँ..


रविवार, 21 दिसंबर 2025

विश्व ध्यान दिवस..

ध्यान से तो हम सब अवगत होंगें.. मगर "विश्व ध्यान दिवस" से नही क्योंकि पिछले(2024) साल ही UNO(सयुंक्त राष्ट्र संघ) द्वारा इसे मनाया जाना शुरू किया गया..।

21 तारीख का दिन क्यों चुना गया..??


आखिर क्यों UNO ने इसे मनाना शुरू किया..?
क्योंकि सस्टेनेबल गोल-3 को हासिल करने में ध्यान अहम रोल अदा करता है,इसे बच्चे से बूढ़े और हरेक वर्ग के लोग करके, इससे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त कर सकते है..।
(कुल 17 सस्टेनेबल गोल है,जिसमें "स्वस्थ शरीर और कल्याण" तीसरे नंबर का गोल है,ये 17 SDG(सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल) 2030 तक हासिल करना है।)



ध्यान क्या है..??
हममें से शायद ही कोई होगा जो ध्यान शब्द से परिचित नही होगा..यंहा तक कि सबको ये भी मालूम होगा कि ध्यान कैसे करना है..।
मगर ध्यान क्या है, इसका जबाब देने में सब सहज नही होंगे..।


महर्षि पतंजलि के अनुसार ध्यान -
"तत्र प्रत्ययैयकतानात ध्यानम।"
अर्थात जंहा चित्त की वृत्ति एक ही विषय मे निरंतर प्रवाहित होता रहता है,वही ध्यान है..।
साधारण शब्दों में कहें तो- आप जो कर रहें है उसमें अपना 100% देना ही ध्यान है..।
कितना सरल है...।

मगर जब भी हम ध्यान शब्द सुनते है तो..हमारे सामने आंख बंद कर बैठे एक छवि उभरती है..हमें लगता है, यही ध्यान की प्रक्रिया है..।जो कि सही है,मगर ये सबसे सरल और कठिन प्रक्रिया है..।।

आज के समय मे हम सब कुछ-न-कुछ कर रहे है,मगर हम में से कितने लोग 100% समर्पण के साथ अपना कार्य कर रहे है..??हम कोई भी कार्य 100% डेडिकेशन के साथ नही करते..जिस समय हम 100% डेडिकेशन के साथ कार्य करते है,उसी समय ध्यान शुरू हो जाता है..।।

सफल लोगों का क्या राज है..??
यही की वो अपने कार्य को 100% डेडिकेशन के साथ करते है..और सफल व्यक्ति के फेहरिस्त में आ जाते है..।।

आज के समय मे ध्यान बहुत जरूरी हो गया है क्योंकि हम किसी भी कार्य को एकाग्रता से नही कर रहे है..2015 के माइक्रोसॉफ्ट कॉर्प के एक अध्ययन के अनुसार- 2000 ई तक मनुष्य की एकाग्रता शक्ति 20 सेकंड था, मगर जब से मोबाइल क्रांति की शुरुआत हुई और सोशल मीडिया का उद्भव हुआ तब से मनुष्य की एकाग्रता शक्ति घटती चली गई और ये अब 8 सेकंड से कम हो गया है..।।

श्रीमदभगवदगीता में श्रीकृष्ण के अनुसार ध्यान में क्या करना चाहिए -

"योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।"
योगी को एकांत स्थान में बैठकर निरंतर अपने मन को परमात्मा में लगाना चाहिए..।

उपनिषदों के अनुसार ध्यान करने से क्या होता है..??

 "आत्मानं रथिनम विद्धि शरीरं रथमेव तू।"
ध्यान के द्वारा इन्द्रियों और मन को नियंत्रित होने से आत्मसाक्षात्कार होता है..।


आधुनिक शोध के अनुसार ध्यान करने से क्या होता है..??
आधुनिक न्यूरोसाइंस, मनोविज्ञान और मेडिकल रिसर्च में पाया गया है कि शरीर,मष्तिष्क और मन पर ध्यान का गहरा सकारात्मक प्रभाव पड़ता है..

◆ ध्यान का मस्तिष्क पर प्रभाव-
ब्रेन वेव्स(अल्फा,थीटा) संतुलित होता है,जिससे मानसिक शांति बढ़ती है।
प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स सक्रिय होता है,जिससे निर्णय क्षमता और एकाग्रता बढ़ता है।
एमिगडाला(तनाव केंद्र) की सक्रियता कम होती है,जिससे भय और चिंता घटती है।
ग्रे मैटर की मात्रा बढ़ती है,जिससे स्मरण शक्ति बढ़ती है..।


ध्यान का हृदय और रक्तचाप पर प्रभाव-
ब्लड प्रेशर नियंत्रित होता है।
हृदय गति संतुलित होता है।
हृदय रोगों का जोखिम कम होता है।


ध्यान का प्रतिरक्षा तंत्र पर प्रभाव-
शरीर की इम्युनिटी बढ़ती है।
सूजन कम होता है।
बीमारियों से लड़ने का क्षमता बढ़ती है।


ध्यान का तनाव और चिंता पर प्रभाव-
कार्टिसोल हॉर्मोन(तनाव हॉर्मोन) का स्तर घटता है।
एंग्जायटी, डिप्रेशन और मानसिक थकान में कमी आती है।
भावनात्मक संतुलन विकसित होता है।


ध्यान का एकाग्रता और स्मरण शक्ति पर प्रभाव-
ध्यान से अटेंशन स्पेन बढ़ता है।
•सीखने की क्षमता और रचनात्मकता में वृद्धि होता है।

ध्यान का व्यक्तित्व पर प्रभाव-
धैर्य,करुणा और आत्म-नियंत्रण बढ़ता है।
नकारात्मक भावनाओं में कमी आता है।
सकारत्मक सोच बढ़ता है..।


ध्यान हमारे जिंदगी के हरेक पहलू में सकारात्मक बदलाव लाता है..
इसलिए इस अन्तर्राष्ट्रीय ध्यान दिवस के अवसर पर,ध्यान को अपने जिंदगी में अपनाकर सिर्फ अपना ही नही बल्कि दूसरों के भी जिंदगी में हम बदलाव ला सकते है..😊।

Yoga for digestive system