इस माया से ढकी अंधियारे में..
कभी इधर,तो कभी उधर..
यू ही भटक रहा हूँ मैं..।
कंहा ढूंढू मैं..
गुरु को..
मैं तो अभी उस योग्य भी नहीं..
की उन्हें ढूंढने का साहस करू..।
मुझमें अभी वो योग्यता भी नहीं..
की उनके थपकियों का चोट सह सकू..।
कंहा ढूंढू गुरु को..।
(जिस तरह कुम्हार मिट्टी के बर्तन को थपकी देकर आकार देता है,उसी तरह गुरु कुम्हार की तरह ही शिष्य को आकार देता है)
कंहा ढूंढू गुरु को..
जो व्यर्थ हो रहे जीवन को नई दिशा दे..
कंहा ढूंढू..
कहते है..
गुरु को ढूंढ नही सकते..
बल्कि गुरु स्वयं ही आपको ढूंढ लेते है..।
आखिर क्या करूँ..
की गुरु की कृपा हो..।
अपने अंदर की प्यास और जिजीविषा को जितना बढ़ा सकते है..
उतना बढ़ाये..
अपने कमियों से निजात पाए..
स्वयं को निश्छल और पवित्र बना ले..
गुरु का अंकुरण स्वयं ही होगा..।।
गुरु आपको देख रहे है..
आपका वाट जोह रहें है..
आज से नहीं,
सदियों से..
आप ही राह भटक चुके है..
आप आगे तो बढ़े..
गुरु स्वयं ही आपका हाथ थाम लेंगे..।।

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