शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

भारत "अर्थ" रूपी पुरुषार्थ से पंगु क्यों बना..

​"पैसा खुदा तो नहीं, मगर खुदा की कसम,खुदा से कम भी नहीं।"

मालूम नहीं ये शेर किसने कहा था..मगर जिसने भी कहा सही ही कहा था..।

मगर मालूम नहीं क्यों..हमारे भारतीय दर्शन में अर्थ को इतना महत्व नहीं दिया जाता है..।

आपको क्या लगता है..??

अगर आपका भी जबाब हां मैं है तो..

आप गलत है..😊

है न थोड़ा अजीब बात..।


चाहे वैदिक संहिता हो,उपनिषद हो,षड्दर्शन हो,भगवतगीता हो या फिर हमारे प्राचीनकालीन दार्शनिक(कौटिल्य,वात्स्यान इत्यादि)हो..सभी ने अर्थ को महत्व दिया है..।।


आखिर फिर ऐसा क्या हुआ कि हम भारतीय अर्थ को उतना महत्व नहीं देते..??

अक्सरहाँ हम अपने समाज,परिवार में देखते है,की जो अर्थ उपार्जन पे जोर देते है..उनके बारे में हमारा धारणा सही नहीं होता..अक्सरहाँ हममें से कई लोग को आपने कहते हुए सुना होगा कि वो हमेशा पैसा-पैसा करता रहता है..।

आखिर इसमें गलत क्या है..??


हमारे अधिकांश धर्मशास्त्र में 4 पुरूषार्थ के बारे में चर्चा किया गया है.."धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष"..



मगर हमारे समाज का पूरा जोर धर्म पर ही है..

अर्थ और काम का चर्चा होते ही हम कन्नी काटने लगते है..

आखिर क्यों..??


धर्म,अर्थ और काम वो पिरामिड है जिसके अंदर पूरा मानव समाज समाहित है,अगर इन तीनों में से एक भी हट गया तो लाखों सालों से बनाया गया मानव सभ्यता ध्वस्त हो जाएगा..हममें और पशुओं में कोई अंतर नहीं रह जायेगा..।

धर्म,अर्थ और काम मे से सबसे ज्यादा महत्वता अर्थ का है..

अर्थ तिनपहिया वाहन का अगला पहिया है..जो धर्म और काम रूपी वाहन को संतुलन बनाये रखा है..।




जरा आप सोचिए..

बिना अर्थ के धर्म का कोई अस्तित्व रह जायेगा..??


आखिर ईसाइयत विश्व के कोने-कोने तक कैसे पंहुचा..??

वो अर्थ ही था जिसके माध्यम से ईसाइयत दुनिया के हरेक कोने तक पहुंचा..।

जरा सोचिएगा..

बिना अर्थ के काम(सभी तरह की इच्छायें) की पूर्ति हो पायेगा..??

और जब तक इच्छाओं की पूर्ति नहीं होगा,तो मोक्ष की प्राप्ति कैसे होगा..??


अर्थ वो पुरुषार्थ है,जिसने धर्म,काम और मोक्ष रूपी पुरुषार्थ को अपने कंधे पे उठाये हुये है..।

तो फिर आखिर क्यों..

हमारा भारतीय समाज "अर्थ" रूपी पुरुषार्थ को हेय दृष्टि से देखता है..??


थोड़ा अतीत में चलते है..

भारत का स्वर्ण युग कब था..??

हममें से अक्सरहाँ लोगों ने पढ़ा होगा कि गुप्तकाल को स्वर्ण युग कहते है..इससे थोड़ा और पीछे जाएंगे तो मौर्य काल भी भारत का स्वर्णिम काल था..।

आखिर क्यों..??

अगर आप मध्यकाल में आएंगे तो पाएंगे कि अकबर का काल भी बेहतर था..आखिर क्यों..??


इन सबके केंद्र में कंही-न-कंही "अर्थ" ही था..जो भारत को धर्म,काम और मोक्ष की और अग्रसर किया..।


मौर्यकाल के आसपास बौद्ध,जैन जैसे 16 पंथ थे जो उस समय फल-फूल रहे थे जिसमें बौद्ध, जैन को सर्वाधिक संरक्षण मिला..बौद्ध धर्म अर्थ के बलबूते ही एक देश से दूसरे देश मे फैला..।

मौर्य काल मे ही कई विहार और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय बनाये गए,ये क्या था..??ये "काम" का ही तो अभिव्यक्ति था..।

उस समय जो ढेर सारे पंथ थे,वो क्या था..??

वो "मोक्ष" रूपी पुरुषार्थ को हासिल करने का ही तो साधन था..।।


इसी तरह गुप्तकाल में शैव, वैष्णव,शाक्त सम्प्रदाय का प्रसार हुआ आखिर कैसे..??

"अर्थ"रूपी पुरुषार्थ के ही कारण तो..

ढेर सारे मंदिर,मूर्तियां बनाया गया,साथ ही कई ग्रंथ लिखें गए ये क्या था,ये "काम" का ही तो रूप था..।

अगर गुप्कालीन शासक और लोग "अर्थ" रूपी पुरुषार्थ से सक्षम न होते तो,क्या ये संभव हो पाता..।


वंही मुगलकाल में कई स्थापत्य का निर्माण किया गया..

वंही दक्षिण भारत मे कई विशालकाय मंदिरों का निर्माण किया गया..

ये सब आखिर कैसे संभव हुआ..??

ये सब "अर्थ" रूपी पुरुषार्थ के कारण ही संभव हुआ..।।


तो फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि..हम भारतीय "अर्थ" रूपी पुरुषार्थ को हेय दृष्टि से देखने लगे और हमारा पूरा ध्यान "धर्म" रूपी पुरुषार्थ पर ही रह गया..??

जरा सोचिए..और मनन कीजिये..

अगर आपके अंदर कोई विचार पनपते है,तो हमें भी बताइए😊..।।


हमारा पूरा ध्यान "धर्म" रूपी पुरुषार्थ पे ही क्यों रह गया..??

इसके लिए आपको थोड़ा नहीं बल्कि 1000 वर्ष पीछे जाना होगा..

भारत हमेशा से ही सहिष्णु रहा है,"अथिति देवों भवः" का भाव हमारे जेहन में हमेशा से रहा है..।इस भाव के कारण ही हमें ये हाल देखने को मिल रहा है..।आज से 1000 वर्ष पहले मुस्लिम आक्रांता हमारे क्षेत्र में आने लगे,हमें लगा ठीक है,सब ठीक हो जाएगा,मगर ये ज्यों-ज्यों भारत के अंदर घुसने लगे त्यों-त्यों हमारे मंदिर,हमारे धर्म को निशाना बनाना शुरू किया..भारत की भूमि इतनी उपजाऊ थी कि कुछ न करने पर भी धन-धान्य इतना उपज जाता था कि हम खुद खाकर दूसरों को खिला सकते थे,इन आक्रांता ने धन लुटा हम मौन रहें क्योंकि हमारे पास अकूत संपदा थी..।मगर इन आक्रांताओं ने हमारे धर्म,संस्कृति और सभ्यता को चोट पहुँचाना शुरू किया,इसलिए हमारी पहली प्राथमिकता हमारा "धर्म"रूपी पुरुषार्थ का संरक्षण करना हो गया..लगातार 750 वर्ष तक मुस्लिम आक्रांताओं ने हमारे धर्म को चोट पहुँचाया..।

इनके कमजोर होते ही यूरोपियन आ गए..

मुस्लिम आक्रांताओं ने तो सिर्फ हमारे "धर्म" रूपी पुरुषार्थ को नुकसान पहुँचाया मगर यूरोपियन आक्रांताओं ने हमारे धर्म के साथ-साथ हमारे "अर्थ" को भी नुकसान पहुँचाया,हमें अर्थ से इतना पंगु बना दिया गया कि हम उन पर आश्रित हो गए..।

आज भी हम उन यूरोपियन(ब्रिटेन) के कारण ही पंगु है..200 सालों में अंग्रेजों ने आर्थिक रूप से हमें इतना शोषण किया कि हम आज भी उठ नहीं पा रहें है..हम आज भी सरकार के ऊपर आश्रित होने को बेबस है..।।


इसका उपाय क्या है..??

आपके पास कोई उपाय है..तो कृपया बताये..।।


हरेक भारतीय को "अर्थ" रूपी पुरुषार्थ की महत्वता बतानी होगी..

और "धर्म" का दृढ़ संरक्षण सरकार को करना होगा,जिससे जनता आश्वस्त हो,कि हमारा धर्म संरक्षित है..उसके ऊपर कोई खतरा नही है..।।

वर्तमान सरकार इस और अग्रसर है..

शायद इसलिय ही "अर्थ"रूपी पुरुषार्थ अंगड़ाई ले रहा है..।।


अगर आपका कोई विचार हो,तो कृपया करके साझा करें..।।


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