शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

खालीपन..

हमें दूसरों की जरूरत पड़ती है..
अपने खालीपन को भरने के लिए..।
हमारी सारी उम्र गुजर जाती है..
अपने खालीपन को भरने के पीछे..
मगर ये खालीपन कभी भरता ही नही..
क्योंकि हमें अपने खालीपन का पता ही नही चलता..।



ये खालीपन क्यों है..??
इस क्यों को कोई क्यों नही जानता..।
क्योंकि इस खालीपन को,जानने के लिए..
खाली होना पड़ता है..
और यंहा खाली कौन होना चाहता है..??

कबीर दास जी कहते है-

कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढै बन माहि।

ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखत नाहि॥

हमारा हाल भी तो उस मृग की ही तरह है..हम अपने खालीपन को भरने के लिए क्या-क्या नही करते,सोशल मीडिया/मूवी/वेबसेरीज़ न जाने और क्या-क्या करते है, अपने खालीपन को भरने के लिए..जबकि ये हमारे खालीपन को और बढ़ाता है..।और ज्यों-ज्यों खालीपन बढ़ता जाता है,हम बैचैन और विक्षिप्त होते जाते है..।

तो हम क्या करें..??

कबीरदास जी कहते है..-

जिन ढूँढा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।

मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ॥

हमें अपने खालीपन को भरने के लिए अपने अंदर ही डुबकियां लगाना होगा,मगर ये कठिन है..क्योंकि जब हम अपने अंदर डुबकियां लगाते है,तो हमें अपने ही बुराइयों का सामना करना होता है,जो बहुत कठिन है..विरला ही कोई-कोई होता है,जो अपनी बुराइयों को स्वीकार कर उसे परास्त कर अपने अंदर डुबकियां लगा पाता है..और अपने खालीपन को दूर कर पाते है..।।

अपने आप को स्वीकार करें..
अपने अच्छाइयों को अपने बुराइयों को,अपने कमियों को..जब तक आप स्वयं को स्वीकार नही करेंगे तबतक आप अपने खालीपन को नही भर पाएंगे..।
अपने आप को स्वीकार करें...
कैसे..??
अपने अंदर डुबकियां लगाकर..
डुबकी कैसे लगाए..??
आंख बंद करके स्वयं को स्वयं में मिलाएं..।
स्वयं को स्वयं में कैसे मिलाए..??
सांसों के साथ स्वयं को तल्लीन करके..हरेक आनेजाने वाली सांस को देखें.. जब सिर्फ सांस रह जाये और कुछ नहीं..तब ये खालीपन मिटेगा नही बल्कि इस खालीपन में ही सब कुछ समा जाएगा..।।

ये जो खालीपन प्रतीत होता है..वो खालीपन,उस खालीपन का ही प्रतिबिंब है,जिसमें सबकुछ समाहित है..और वो ही हमें अपनी और आकर्षित करता रहता है..।।





समाज और हम

हम अक्सर कहते हैं कि "मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है," लेकिन क्या हमने कभी रुककर यह सोचा है कि इस 'समाज' का हमारे अंतर्मन पर क्या प्रभाव पड़ता है..??


समाज केवल व्यक्तियों का समूह नहीं है बल्कि यह साझा मान्यताओं, अपेक्षाओं और कभी-कभी थोपे गए आदर्शों और मूल्यों का एक ताना-बाना भी है..।

समाज हमें सुरक्षा देता है, पहचान देता है, लेकिन अक्सर हमारी मौलिकता (Originality) की कीमत पर..। 

बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि 'लोग क्या कहेंगे'। यह एक वाक्य कई बार हमारी रचनात्मकता और हमारे साहसी निर्णयों का गला घोंट देता है। 



क्या हम वही बन रहे हैं जो हम वास्तव में हैं..या हम बनना चाहते है, या हम वही बन रहे हैं जो समाज हमसे उम्मीद करता है..?

आज डिजिटल युग में हम एकदूसरे से जुड़े तो हुए हैं, लेकिन संवाद खो गया है। आज हम भीड़ में भी अकेले हैं...क्यों..??

सहानुभूति (Empathy) की जगह अब जजमेंट (Judgment) ने ले ली है। एक स्वस्थ समाज वही है जहाँ व्यक्ति को उसकी खामियों के साथ स्वीकार किया जाए, न कि उसे एक सांचे में ढालने की कोशिश की जाए।

वर्तमान में समाज की अच्छी खामियां गुम होती जा रही है..अक्सरहाँ मैं अपने बुजुर्गों से सुना करता था- समाज किस दिन के लिए है..।मगर वर्तमान में आज ये समाज टूट रहा है..भले ही समाज मे कई खामियां क्यों न हो..मगर ये समाज ही होता है...जो हरेक परिस्थितियों में हमारे साथ होता है..।

मगर वर्तमान में आज, ये समाज टूट कर बिखर रहा है..

शहरों में ये ढांचा टूट ही गया है...आपने कई हृदयविदारक घटना अखबारों और न्यूज़ में देखा होगा..जब घर से लाश की बदबू आने लगती है,तब बगल वाले को पता चलता है..हमारे सामने कौन रहता है..हमें सालों तक पता नही चलता..ये हाल है शहरी समाज का..।

गाँव में अभी भी समाज जिंदा है..मगर ये भी अब अवसान की और जा रहा है..क्योंकि समाज अपना दायित्व का निर्वहन नही कर रहा है...।।

आइए हम थोड़ा सामाजिक बने..अपना हाथ आगे बढ़ा कर मानसिक,शारीरिक और आर्थिक योगदान देकर..।



आज हम आप जैसे भी है..इसमें इस समाज का अहम योगदान है..और हम, ऐसा कहने वाले आखरी पीढ़ी है..😊

भीड़..

मैं इस भीड़ में कंही पिछड़ गया..
खुद को देखा तो बहुत पीछे पाया..
मगर ये क्या..
पीछे तो हूँ मैं..
लेकिन मैं भीड़ से ऊपर हूँ..
मेरे पीछे भी भीड़ है,मेरे आगे भी भीड़ है..
मगर मैं इस भीड़ में रहकर भी..
इस भीड़ से परे हूँ..।



न ही मुझे आगे की भीड़ प्रभावित करती है,
न ही पीछे की..
मगर इस भीड़ की..
कोलाहल और चकाचौध हम तक कभी-कभी पहुंच ही जाती है..
और मुझे प्रभावित कर जाती है..।

मैं जंहा हूँ वंहा से आगे जाना आसान है..
बस एक प्रणोदन की जरूरत है..
और मैं बहुत आगे चला जाऊंगा..
जंहा हम जैसे कई है..
मगर इनमें कोई भेद नही है..।

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

बुरे परिस्थितियों में ही अच्छे समय का बीजारोपण होता है...।

हमसब अक्सरहाँ कभी-न-कभी बुरी परिस्थितियों से गुजरते है..
और अक्सरहाँ हम उन परिस्थितियों को कोसते है..।
मगर हम कभी उन परिस्थितियों पे गौर नही करते..।

कभी-कभी हम जिन परिस्थितियों को बुरा कहते है,वही परिस्थितियां हमारे जिंदगी के लिए सबसे अहम साबित होता है..।।

इतिहास भरा पड़ा हुआ है..उन बुरी परिस्थितियों से जिसने इतिहास का रुख ही मोड़ दिया..।

चलिए उनमें से कुछ व्यक्तियों से रु-ब-रु होते है,जो बुरे परिस्थितियों के कारण ही महान बन पाए..।

एक व्यक्ति प्रथम श्रेणी(first class) का वैध टिकट लेकर ट्रैन में सफर करता है,मगर उसके अश्वेत होने के कारण उसे ट्रैन से फेंक दिया जाता है..और वो व्यक्ति सारी रात कड़ाके के ठंड में उस स्टेशन के वेटिंग रूम में ठिठुर कर गुजारता है,और निर्णय लेता है कि इस अन्याय और नस्लभेद के खिलाफ आवाज उठाऊंगा...।



इन्ही के पदचिन्हों पे चलकर "मार्टिन लूथर किंग जूनियर" ने अमेरिका में 'सिविल राइट मूवमेंट' चलाया..
वो कहते है.. 
"ईसा मसीह ने हमें लक्ष्य दिया और....उन्होंने हमें तरीका दिया।"

इसी तरह दक्षिण अफ्रीका के "नेल्सन मंडेला" ने उन्हें अपना आदर्श मानकर दक्षिण अफ्रीका को बिना किसी गृहयुद्ध के दक्षिण अफ्रीका को लोकतांत्रिक देश बनाया..।
(◆नेल्सन मंडेला ने 27 साल जेल में बिताया..इनके लिए इनसे बुरा और क्या हो सकता है,मगर परिणाम सामने है,आज उन्हें पूरा विश्व जानता है..।


"अक्सरहाँ जब हम सबसे बुरे दौड़ से गुजर रहे होते है,उसी समय अच्छे समय का बीजारोपण भी हो रहा होता है..इसीलिए बुरा समय जब भी आये,तो घबराए नही,मुस्कुराए😊.."

अब हममें से अधिकांश लोग जान गए होंगे कि हम किसकी बात कर रहे है..
वो व्यक्ति कोई और नही बल्कि "महात्मा गांधी" थे जिसे 7 जून 1893 को पीटरमैरिट्सबर्ग स्टेशन पे ट्रैन से उस ठिठुरती हुई ठंड में फेंका गया..वो रात ऐतिहासिक रात थी..जिसने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी बना दिया..।
जरा सोचियेगा..अगर ये घटना उनके साथ नही होता तो क्या होता..??


चलिए अब उस सख्स से रु-ब-रु होते है,जिन्हें स्कूल से इसलिय निकाल दिया गया कि वो मंद बुद्धि के थे..।
शिक्षक ने उनकी माँ को एक पत्र लिखा कि आपका बच्चा addled( अव्यवस्थित दिमाग) है और वह कुछ सीख नही सकता..।
उनकी माँ ने उस पत्र को पढ़ा और उनसे कहा- स्कूल ने लिखा है कि "आपका बेटा बहुत प्रतिभाशाली है,और हमारे पास उसे पढ़ाने लायक अच्छे शिक्षक नही है,इसिलिय आप इसे खुद पढ़ाये...।"
पता है वो बच्चा कौन था..??
दुनिया उसे "थौक आविष्कारक" के रूप में जानता है..वो और कोई नही बल्कि "थॉमस अल्वा एडिसन" थे...।

उन्होंने वो किया जो आज हमें सामान्य लगता है..
उन्होंने पहली बार बिजली का बल्ब बनाया..इससे पहले दुनिया मोमबत्तियां और गैस की रोशनी पर निर्भर थी।
•उन्होंने पहली बार आवाज रिकॉर्ड कर सुनने वाला पहला उपकरण बनाया,जिससे संगीत उद्योग की शुरुआत हुई..
•आज हम सिनेमा हॉल में फ़िल्म का लुत्फ उठा रहे है तो उन्ही के कारण..उन्होंने "मोशन पिक्चर कैमरा" का आविष्कार किया जिससे फ़िल्म उद्योग का जन्म हुआ..।
•आज हम आप मोबाइल चला रहे है,मगर जरा सोचिए अगर बैटरी रिचार्जजेबल न होता तो क्या होता..।

वो कहते थे-
"मैं असफल नही होता हूँ,बल्कि एक नया तरीका खोज लेता हूँ,जो काम नही करता.."

वो हमेशा कठिन परिश्रम के पक्ष में रहे है,इस बारे में कहते है..-
"प्रतिभा 1% प्रेरणा और 99% कड़ी मेहनत ही सफलता का राज है।"
(Genius is 1% inspiration and 99% perspiration)

जरा सोचियेगा अगर उन्हें स्कूल से नही निकाला गया होता तो क्या होता..??

ये तो वो लोग है जिन्होंने अपने बुरे परिस्थितियों से देश और दुनिया को दिशा दी..
मगर हममें से हरेक घर में,हरेक समाज में कोई न कोई व्यक्ति होता ही है..जो बुरे परिस्थितियों से गुजरकर वो कार्य करते है,जो हमारे लिए आदर्श हो जाते है..।।

याद रखें..आप जब भी बुरे-से-बुरे परिस्थितियों से गुजर रहे हो,तो समझ लीजिए ,आपके अंदर अच्छे समय का बीजारोपण हो रहा है..

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

मैं अक्सरहाँ लिखता हूँ..

मैं अक्सरहाँ लिखता हूँ..
कभी कुछ,कभी कुछ..और कभी कुछ..
मगर कभी-कभी..
कुछ ऐसा लिखता हूँ..
जिसे लिखने के बाद नही..
बल्कि उसे बाद में पढ़ने के बाद..
अहसास होता है..
ये मैंने लिखा है..
और अपने लेखनी पर हल्का गुमान होता है..।।

और कभी-कभी..
मेरी लेखनी मेरा आइना बनकर मुझे झकझोर देता है..।
और मेरे वास्तविकता से मेरा आत्मसाक्षात्कार करा देता है..।
और कभी-कभी मेरी ही लेखनी मुझे तीर की तरह चुभता है..
और मुझे घायल करके क्षणभर के लिए अचेत कर देता है..।

मैं अक्सरहाँ लिखता हूँ..
कभी कुछ,कभी कुछ..
और कभी कुछ..।




आंनद की अनुभूति..मगर क्यों..??

कभी-कभी आनंद की अनुभूति होती है..
जैसे पूरा रोम-रोम हर्षित हो चुका है..।
शरीर का पूरा कोशिका जागृत हो चुका हो..
ऐसा महसूस होता है..।
मगर ये क्यों होता है..??

इसका कारण मालूम नही..
जब थोड़ा सोचा तो कुछ जबाब मिला..
पहला "अंतस मन" जिससे अभी तक मे अनभिज्ञ हूँ,मगर वो नही..
शायद मेरे कुछ संस्कार(कार्य) के कारण वो मुस्कुराता हो,और इस कारण पूरे शरीर में रोमांच पैदा होता हो..।

हम सब कंही-न-कंही एक दूसरे से जुड़े हुए है..
कुछ लोगों से खास जुड़ाव होता है..
शायद उन खास लोगों में से कोई खास लोग हर्षित होकर जिक्र या याद कर रहें हो..तो वो तरंगें हम तक पहुंचती है,और इस स्थूल शरीर को रोमांचित कर देता है..।।

कभी-कभी इसका विपरीत भी होता है..
आप उदास होते है,
मगर क्यों होते है..?
इसका लाख कारण ढूंढने पर भी नही पता चलता है..
शायद यही कारण होता हो..।।

इसीलिए मुस्कुराइए और अच्छे कार्य कीजिये..
जिससे आपके अंदर विद्यमान सूक्ष्म शरीर आपको हमेशा आंनदित रखें..।

कभी खुद से पूछिए..

कभी खुद से पूछिए,
आप कर क्या रहें है..?
आप जो कर रहें है..
क्या वो सही कर रहे है..?
कभी खुद से पूछिए..
आप कर क्या रहें है..?


घंटों यू ही जाया कर रहें है..
क्यों कर रहें है..?
उस क्यों को ढूंढिये..
और खुद से पूछिए..
आप जो कर रहें है..
क्या वो सही कर रहे है..?

सुबह से शाम..
शाम से रात..
और रात से सुबह..
कब हो जाता है..
ये पता नही चलता..।
ये क्यों नही पता चलता..?
उस क्यों को ढूंढिये..
और खुद से पूछिए..
आप कर क्या रहें है..?

साल दर साल यू ही बीत गए..
और हम वंही के वंही रह गए..
बीज अंकुरित होकर पेड़ बन गए..
पेड़ से गिरा बीज भी अंकुरित होकर पेड़ बन गये..।
और हम वंही के वंही रह गए..
क्यों रह गए..?
उस क्यों को ढूंढिये..।
और खुद से पूछिए..
आप जो कर रहें है..
क्या वो सही कर रहे है..?

सबको भान है अपने कर्तव्य का..
मगर कितने निभाते है अपने कर्तव्य को..?
आखिर क्यों लोग हो जाते है..
कर्तव्यमूढ़..??
उस क्यों को ढूंढकर..
अपने कर्तव्य का पालन कीजिये..।
या फिर यू ही..
घंटों,दिन,साल..जाया कीजिये..।

कभी खुद से पूछिए,
आप कर क्या रहें है..?
आप जो कर रहें है..
क्या वो सही कर रहे है..?
कभी खुद से पूछिए..
आप कर क्या रहें है..??




कंहा ढूंढ रहे हो मुझे..

कंहा ढूंढ रहे हो मुझे..
खुद में ढूंढो न..।
मैं वही हूँ..
और कंही नही..।

अगर कंही कुछ दिख रहा है,तो..
वो सिर्फ तुम्हारे अंदर का ही आभा है..
और कुछ नही..

कंहा ढूंढ रहे हो मुझे..
खुद में ढूंढो न..।
मैं वही हूँ..
और कंही नही..।
कंहा ढूंढ रहे हो मुझे..





रविवार, 22 फ़रवरी 2026

आप उनको कितना महत्व देते है..

क्या आपको पता है..
इस पृथ्वी पर सर्वाधिक मूर्ति किसकी बनी हुई है,और बन रही है..??
ये शायद आपको मालूम होगा..😊
उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया था..मगर आज सर्वाधिक मूर्तियां उन्ही की है..
और वो है- "महात्मा बुद्ध"।

और एक सवाल और जो कि आपको मालूम ही होगा..
किस राजनीतिज्ञ का सर्वाधिक मूर्तियां पृथ्वी पर है..?
ये वो है..जिन्हें आज के युवा बिना जाने ही दो-चार कहते रहते है..
जबकि विश्व उनका सम्मान करता है..
आइंस्टीन ने उनके बारे में कहा था- 

"आने वाली पीढ़ियां शायद ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई व्यक्ति कभी इस धरती पर चला था।"

 (Generations to come will scarce believe that such a one as this ever in flesh and blood walked upon this earth.)

आइंस्टीन ने ये शब्द गांधीजी के बारे में कहा था..।
अक्सरहाँ लोग गांधी जी के बारे में कहते है..काहे का राष्ट्रपिता..??मगर जब उसे पता चलता है कि उन्हें राष्ट्रपिता से संबोधन सुभाष चंद्र बोस ने किया था..तब लोग चुप हो जाता है..।।गांधी सिर्फ एक राजनीतिज्ञ नही थे..वो खुद में एक विश्विद्यालय थे..उनकी सोच और विचार आज भी प्रसांगिक है,और आगे भी रहेगा..गांधी को पढ़ना नही समझना जरूरी है..इस गर्मी छुट्टी में स्वयं और अपने बच्चे को गांधी की आत्मकथा पढ़ाये..।।

यू ही न्यूज़ स्क्रॉल कर रहा था..तो एक तस्वीर दिखी..और मैं सोचने लगा..
आखिर क्यों..
हम उन्हें तो जानते है,
मगर इन्हें नही जानते,
जिनके कारण हम उन्हें जानते है..।

शायद हममें से बहुत कम लोग ही "कस्तूरबा गांधी" को जानते होंगे..
गांधी से महात्मा गांधी बनने में अहम योगदान कस्तूरबा गांधी का था..।


•वंही सिद्धार्थ से महात्मा बुद्ध की यात्रा में यशोधरा का अहम योगदान है..।
•वंही अंबेडकर से बाबासाहब अंबेडकर बनने में रमा बाई का अहम योगदान था..

कहा जाता है हरेक सफल व्यक्ति के पीछे एक महिला का योगदान होता है..
मगर वो महिला कंही खो जाती है..और लोग भूल जाते है..।

महिला(माँ, aunty,बहन,पत्नी,बेटी) वो पारस पत्थर है..जो पुरुष को तराशती है..।
वो एक असभ्य मनुष्य को सभ्य बना देती है..।।

एक पुरुष के जीवन मे हरेक पड़ाव पर एक महिला की जरूरत होती है..अगर वो न हो,तो पुरुष पथभ्रष्ट हो जाता है..।।
अगर महिला आप पे निःस्वार्थ प्रेम लुटाए तो आपको दुनिया का सर्वश्रेष्ठ इंसान बना देगी...।मगर कुदृष्टि पड़ गई तो आपका जीवन नरकमय बना देगी..।।

मगर वर्तमान में लोगों का दृष्टिकोण बदल रहा है...
क्या हमारा दृष्टिकोण सही है...??
सोचियेगा..
जब हमारे ही दृष्टि में दोष है तो हम कैसे सही और बुरा देख सकते है..😊।

हम उनको कितना महत्व देते है..
जिनके कारण आज हमारा अस्तित्व है..
जिनके कारण जिंदगी को नया उद्देश्य मिला..
जिनके कारण जिंदगी को सार्थक बना रहे है..
जिनके कारण जिंदगी इंद्रधनुष की तरह रंगीन बन रही है..।



"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥"


शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

AI विनाश की और बढ़ता कदम..

क्या आपको पता है..
हड़प्पा/सिंधु सभ्यता,माया सभ्यता या फिर मेसोपोटामिया सभ्यता का विनाश क्यों हुआ..??

और इन सभ्यता का विनाश तब हुआ जब ये अपने चरम पर था..।
और आज हम वही है..चरम पर..या फिर विनाश के कगार पर..।।

इन सभ्यताओं का विनाश पानी के कारण हुआ..
इन क्षेत्र में पानी की इतनी किल्लत हो गई कि ये क्षेत्र वीरान हो गया..वंही मेसोपोटामिया में पानी का इतना दोहन किया गया कि पानी खारा हो गया और जमीन बंजर हो गई..।।
इन सभ्यताओं का विनाश पानी के कमी के वजह से ही हुआ..।।

और आज हम उसी कगार पर है..।।

विश्व मे 26%(2.2 अरब ) से ज्यादा आबादी को शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नही है..।

~73 करोड़ से ज्यादा लोगों को पानी पीने के लिए आधे घंटे का सफर करके तालाब या नदी से पानी पीने के लिए जाना होता है..
4अरब लोग, लगभग आधी आबादी को कम से कम 1 महीना पानी की किल्लत से जूझना होता है..।।

ये सारा आंकड़ा AI के शुरुआत से पहले का है..और AI कंपनी, पानी की खपत की सही जानकारी नही दे रही है..।।

कुछ रिपोर्ट के अनुसार-
दुनियाभर में जितना बोतलबंद पानी का खपत हो रहा है,उससे ज्यादा AI पानी का खपत कर रहा है..।।

2025 में 312-765 अरब लीटर पानी का खपत AI के द्वारा किया गया है।
यानी 1 व्यक्ति 3 लीटर पानी पीता है..तो सालभर में लगभग 1095 लीटर यानी 70 करोड़ लोगों का सालाना पानी AI पी रहा है..(73 करोड़ लोग नदी/तालाब का पानी पीने को मजबूर है)



आप कल्पना कर सकते है..
आज जितने लोगों के हाथ में मोबाइल है,अगर सभी लोग यूट्यूब,व्हाट्सएप या अन्य सोशल मीडिया की तरह AI का इस्तेमाल करने लगे तब क्या होगा..??

इसका असर दिखने लगा है..
नवी मुंबई में ,UP में,बंगलुरु में..और कई जगह जंहा-जंहा डाटा सेन्टर का कार्य चालू है..
•UP में पहले बोरबेल(चापाकल) से 60-70 मीटर खुदाई करने पे पानी आ जाता था,अब 100मीटर खुदाई करने पर पानी आता है।।
•वंही नवी मुंबई में रहने वाले कई लोग आपको कहते मिल जाएंगे 10 साल पहले तक पानी की किल्लत नही थी मगर अब हरेक साल पानी की समस्या होती है..।।
•बंगलुरु की समस्या से तो सब अवगत है..।

मगर इन समस्याओं से हमें क्या लेना,बस कुछ दिन,कुछ साल रुकिए..जब आपके हिस्से का भी पानी AI पी जाएगा तब आप भी चिल्लायेंगे..।।



वैसे भी इन समस्याओं का सबसे ज्यादा असर भारत के उन लोगों पे पड़ेगा जो हाशिये पे है..और जो हाशिये पे है..आज 5kg अनाज से खुश है,तो कल 100 लीटर पानी से खुश रहेंगे..।।

हम आप उस भयावह स्थिति को अभी नही देख रहे है..मगर आने वाले सालों में उन समस्या से रु-ब-रु होना ही पड़ेगा..।।

मैं डरा नही रहा हूँ, बस वास्तविकता से अवगत करा रहू है..।

एक हाशिये पे खड़ा इंसान कीपैड मोबाइल चला रहा है,मगर उसे भी 299₹ का रिचार्ज करवाना पड़ रहा है..जबकि वो न 2G,3G,4G, 5G यूज़ कर रहा है...।और मजबूरी ये है कि अब सारे काम मे मोबाइल नंबर लगता ही है..अगर रिचार्ज न कराये तो sim बंद, अगर sim बंद तो OTP नही आएगा..अगर OTP नही आएगा तो सरकार के कई योजनाओं का लाभ नही उठा पायेगा..।।

इसी तरह आप AI इस्तेमाल करें या न करें.. मगर इसकी कीमत चुकानी ही होगी..क्योंकि कोई ऑप्शन ही नही है..।

अगर इसका कोई समाधान न ढूंढा गया...तो वो दिन दूर नही जब हड़प्पा सभ्यता की तरह भारत के बेंगलुरु,नवी मुंबई को किताबों में पढ़ना पड़ेगा..।।

क्या आपके पास कोई समाधान है..??

AI आज जरूरत है,हम,आप इससे मुँह मोड़ नही सकते,AI भारत को सुपर पावर बना सकता है..जिस तरह संचार क्रांति ने भारत को आर्थिक रूप से सशक्त किया उसी तरह AI क्रांति भारत को सुपर पावर बना सकता है...।
मगर इसके दुष्परिणाम के निराकरण के लिए हमारे पास समाधान होना चाहिए..।
AI से घबराए नहीं, बल्कि अपने प्रगति में सही इस्तेमाल करें।।


मन करता है

मन करता है.. 
चुपचाप तुम्हारे साथ खामोश बैठूं..
घंटो तलक..तुम्हारे साथ बैठूं..
ना तुम कुछ बोलो..
ना मैं कुछ बोलू..।
बस मौन के द्वारा ही सबकुछ बयां करू..
मन करता है...
चुपचाप तुम्हारे साथ खामोश बैठूँ..।

तुम अपना सर्... 
मेरे कंधे पर रखकर..
पूरा ब्रह्मांड निघांरो..
और मैं, 
तुममें...
पूरा ब्रह्मांड निघारू..।
ना तुम कुछ बोलो..
ना मैं कुछ बोलू..
बस मौन के द्वारा ही सबकुछ बयां करू..।
मन करता है...
चुपचाप तुम्हारे साथ खामोश बैठूँ..।



गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

क्या आप आज से संतुष्ट है

क्या आप आज से संतुष्ट है..
अगर हां, 
तो आप अपने जीवन से भी जरूर संतुष्ट होंगे..।
अपने आज को बेहतर बनाये..
न कि अपने अतीत और भविष्य के बारे में सोचे कि उसे बेहतर बनाया जा सकता था या फिर बेहतर बनाया जा सकता है..।

अपने आज को बेहतर बनाकर..
आज संतुष्ट होइये..
क्योंकि आज की संतुष्टि में ही, 
कल की संतुष्टि का बीज है..।
इसीलिए खुद से पूछिए..
आपने जो आज का दिन बिताया वो संतुष्टिपरक था..??
अगर हां..तब तो ठीक है..।
अगर नही..
तो खुद से पूछिए..
क्या इसे और बेहतर किया जा सकता था..??
उन खामियों को आज ढूंढिये और कल के लिए खुद को तैयार कीजिये..
जिससे आपका कल संतुष्टिपरक हो..।।



कंहा थे प्रभु

पहले भी मैं उदास होता था,

पहले भी मैं हताश होता था..

पहले खुद से ही खुद को प्रोत्साहित करता था..

मगर आज..

जब हताश और निराश था..

तो उसने कहा..

मैं हूँ न तुम्हारे साथ..।

मैंने कहा..

कंहा थे प्रभु इतने दिन से..

ये पूछने पे उन्होंने कहा..

तुम याद ही अभी किये..।



मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

कोई तो होगी..

कोई तो होगी..
जो मेरे अंदर प्यार के वट वृक्ष को देखेगी..
वो मुझे नही,मेरे कैरियर को नही..
सिर्फ मुझे ही देखेगी..
कोई तो होगी..।।

ये दुनिया जालिम है..
अगर वो,
मेरे अंदर..
प्रेम के वट वृक्ष को देख भी लेगी..
तो दुनिया उसे दिग्भ्रमित करेगी..
कैसे रहेगी..??
क्या करेगी..??
क्या भविष्य है इसके साथ..??
क्या करेगी तू इसके साथ..??

मगर शायद..
उसका अंतर्मन कहेगा..
ये वही वट वृक्ष है..
जिसके छावं में..
मैं चैन से,
सो सकूंगी..

कोई तो होगी..।


सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

नजरिया..हमारे धर्मग्रंथ और एलियन...

क्या एलियन होते है..??
इसका जबाब न हम, हां में दे सकते है,और न ही, ना में..।

हम भारतीय तो बिल्कुल नही कह सकते है कि एलियन नही होते..
क्योंकि हमारे धर्म ग्रंथ में जिस भूत, पिशाच, दैत्य,प्रेत, असुर,यक्ष, बेताल इत्यादि का जिक्र किया जाता है,आखिर वो लोग है कौन..?




इनके बारे में हमेशा, हमलोगों को सिर्फ गलत बातें ही बताया गया..
बल्कि इन लोगों ने मानवों के साथ मिलकर कई अच्छे काम किये है..
●जिसमें सबसे प्रमुख "समुंद्र-मंथन" का जिक्र आता है..
साथ ही कई "गण"(भूत, प्रेत,पिशाच, डाकिनी और शाकिनी इत्यादि) भगवान शिव के सेना में शामिल है..।

●अभी भी ग्रामीण भारत मे क्षेत्रपाल का मंदिर मिल जाएगा..ये मंदिर गाँव के रक्षा के लिए बनाया जाता है..।ये मंदिर सामान्यतः गाँव के सबसे अंत मे मिलेगा..(अक्सरहाँ हम इसे ब्रह्म बाबा के मंदिर के रूप में मानते है..)

●हममें से कई लोग विक्रम और बेताल की कहानी जरूर सुने होंगे..क्या आपने या हमने सोचा है..ये बेताल कौन है..??
बेताल के IQ(इंटेलिजेंस कोशेंट) लेवल पे हमलोगों ने कभी गौर ही नही किया..।।

● वंही जब हम हनुमान चालीसा पढ़ते है तो उसमें एक पंक्ति है-"भूत पिशाच निकट नही आवै, महावीर जब नाम सुनावै"..ये भूत,पिशाच है कौन जिसे हनुमान जी नियंत्रित करते है..
वंही जब हम हनुमान जी की "पंचमुखी" छवि देखते है,तो वो कुछ और ही कहता है..।

बौद्ध धर्म में भी "धर्मपाल" की आकृति वाली मूर्ति दिखती है,जो पिशाच जैसा ही मिलता जुलता है..बौद्ध मान्यता ये है कि पहले ये नकारात्मक थे,मगर बौद्ध की शिक्षाओं से प्रभावित होकर धर्म और मानवता के रक्षक बन गए..

जैन धर्म मे भी "यक्ष-यक्षिणी" की मूर्तियां मिलती है,जो द्वारपाल का कार्य करती है,मानव से बिल्कुल ही अलग दिखती है..।

वंही अन्य धर्म मे भी ऐसे लोगों का उल्लेख है,जिन्हें मानव के हितैषी के रूप में दर्शाया गया है..

इस्लाम धर्म मे "जिन्नात" का उल्लेख है..कहा जाता है कि कुछ जिन्न सूफी संतों और पैगम्बरों के मददगार भी रहे है,वही बुरे जिन्न को "इबलीस" (शैतान)का अनुयायी माना जाता है..।

ईसाई धर्म मे मुख्य रूप से "डेमन्स" और "फालेन एंजेल्स" का जिक्र सर्वाधिक है,मान्यता ये है कि कभी ये फरिश्ते थे,मगर ईश्वर के विरुद्ध विद्रोह करने पर स्वर्ग से निकाल दिया गया..

●वंही यहूदी लोककथाओं में "डिब्बक" का उल्लेख मिलता है..।




हरेक धर्म में इनका अलग-अलग तरीके से जिक्र किया गया है..मगर सब किसी-न-किसी रूप से मानव के हितैषी ही रहें.. फिर ऐसा क्या हुआ कि मानव और इनमें अलगाव हो गया और उन्हें हम नकारात्मक रूप में लेने लगे..।।

-वर्तमान समय में भी जब हम आधुनिक शब्द "एलियन" का नाम लेते है तो एक नकारात्मक रूप में ही..
आखिर कुछ तो ऐसा अतीत में हुआ होगा..जो इन्हें हीरो से विलेन बना दिया..।।

फिर से हमारा सवाल है कि - "एलियन" होते है..??
हम जो चीज नही देखते इसका ये मतलब नही की वो चीज नही होते है..।।
हम बैक्टेरिया,वायरस,प्रोटोज़ोआ को नही देख पाते मगर वो है..सिर्फ है ही नही बल्कि हमारा अस्तित्व भी उनके हाथ मे है...😊

इस ब्रह्मण्ड🌏 को हम कितना जानते है...??
शायद 1% भी नही..।
सच बताऊ तो अभी हम पृथ्वी के भी कई रहस्य को नही जानते...।

एलोरा और वंहा की कुछ मूर्तियां कुछ तो संकेत संकेत करती है..।
क्रमशः...

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

शिव और धड़कन..

न जाने वर्षों बाद ऐसा हुआ..
पहले ये दिल सिर्फ उसके लिए धड़कता था..
फिर उसके गुम होने के बाद..
इसने धड़कना बंद कर दिया..।।

फिर शिव की कृपा हुई..
और इक अनजान..
इस वेबजाल में भटकते-भटकते..
मुझतक पहुंच गई..।
फिर भी ये धड़कना शुरू नही हुआ..।

न जाने आज फिर क्यों..
ये दिल फिर से धड़कना शुरू किया...।
शायद शिव के करीब जा रहा हूँ मैं..
या फिर शिव ही मेरे करीब आ रहे है..।
बिना शिव के चाहे, क्या होता है..
वो जो चाहे..सो होता है..।।


शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

जिंदा होने का तात्पर्य..

अगर आप जिंदा है..
तो आप..
दूसरों को भी जिंदा रख सकते है..।
इसीलिए जिंदा रहना जरूरी है..।




जिंदा होने से तात्पर्य सांस चलने से नही है..
बल्कि जिंदा होने का अहसास..
दूसरों को करवाने से है..।
अगर आप अपने जिंदा होने का अहसास दूसरों को नही करवा रहे है..
तो आप उनके लिए जिंदा नही है...।।

तो फिर क्या करें..
अपने मौजूदगी और अपने जिंदा होने का अहसास करवाये..।
अपने चाहने और जाननेवालों से जुड़े..अब जुड़ना आसान है..
एक क्लिक करते ही आप उनके लिए जिंदा हो सकते है..।

जिन्हें आप नही जानते है..
उन्हें अपनी मौजूदगी का अहसास अपने मुस्कान से कराए..
हमेशा मुस्कुराते रहें..क्योंकि..
आपकी मुस्कान दूसरों के चेहरे पे भी मुस्कान ला सकती है..।।






गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

मैं अच्छा हूँ या बुरा हूँ..

मैं अच्छा हूँ, या बुरा हूँ..
इसका निर्णय कौन करेगा..??​
ये भीड़...
या मैं स्वयं..
मैं अपने हर सच और हर झूठ से वाकिफ हूँ..
इसलिए सही निर्णय तो मैं ही कर पाऊंगा..।
ये भीड़ सिर्फ मुखौटा देखती है..
मन की गहराई नहीं..।



मैं अच्छा हूँ, या बुरा हूँ..
इसका निर्णय कौन करेगा..??
तराजू तो सबके हाथ में है..
पर बांट सबके अलग अलग है..
कोई स्वार्थ से तोलेगा..
तो कोई संस्कार से..
बेहतर है कि मैं खुद को खुद से तोलूं..।।

मैं अच्छा हूँ, या बुरा हूँ..
इसका निर्णय कौन करेगा..??




"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।  
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥"
(भगवद्गीता)

हम सुंदर दिखना चाहते है..

हम सुंदर दिखना चाहते है..
आखिर क्यों..??
है न बड़ा अजीब सवाल..।
आपको याद है..
आप आखरी बार,खुद के लिए सुंदर कब बने थे..??
नही याद होगा..
क्योंकि हम खुद के लिए सुंदर बनते ही नही..
बल्कि लोग क्या कहेंगे..
इसके लिए सुंदर बनते है..और अपनी सुंदरता का दिखावा करते है। 



हमें सुंदर क्या बनाता है..??
क्या हमारे कपड़े,गहने या फिर हमारा सौंदर्य प्रसाधन..
शायद ये सब नही..
मगर ये वास्तविकता नही है..
ये हमें सुंदर नही, बल्कि हमारे सुंदरता में चार चांद लगाते है..।
तो फिर हमें सुंदर कौन बनाता है..??

हमें आकर्षक कौन बनाता है..??
इन सबका सिर्फ जबाब ही नही हमें मालूम है बल्कि..
हम सब इन खूबियों से लबरेज है..।।

वो चीज आखिर है क्या..??

वो चीज..
आपके चेहरे पे है..
और वो है..
आपकी मुस्कान..।।

कृष्ण सुंदर है अपने मुस्कान के कारण..
कृष्ण सौम्य है,अपने मुस्कान के कारण..
कृष्ण आराध्य है,अपने मुस्कान के कारण..।।

ये मुस्कान सिर्फ मुस्कान ही नही है..
बल्कि स्वयं से आत्मसाक्षात्कार कराने का साधन है..।।
इसीलिए मुस्कुराइए..
खुद के लिए..


बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

मौन हूँ मैं..

ना ही कुछ कहने को है..
ना ही कुछ पूछने को है..
इसीलिए मौन हूँ मैं..
मेरे मौन को तुम..
मेरी उदासी मत समझना..।
मेरे मौन में..
वो सबकुछ है..
जो इस शून्य में है..।।




अगर तुम इस शून्य को,समझ सकते हो..
तो मेरे मौन को भी, 
समझ ही लोगे..।
इस शून्य से ही,तो मैं हूँ,
इस शून्य से ही,तो तुम हो..
और तुमको ही समझने को,
मौन हूँ मैं..
क्योंकि मौन ही तो..
शून्य से साक्षात्कार का सबसे सरल साधन है..।।

ना ही कुछ कहने को है..
ना ही कुछ पूछने को है..
इसीलिए मौन हूँ मैं..
मेरे मौन को तुम..
मेरी उदासी मत समझना..।
मेरे मौन में..
वो सबकुछ है..
जो इस शून्य में है..।।

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

शतरंज से सीख..

अक्सरहाँ जब मैं उदास होता हूँ,वैसे होता नही हूँ..😊 
या फिर क्या करूँ,क्या न करू.. की स्थिति उपजती है,तो मैं अपने मोबाइल/टेब पर शतंरज♟️ खेलता हूँ..अक्सरहाँ हारता हूँ, या फिर जीतता हूँ..मगर अक्सरहाँ हारता ही हूँ..😀।

अभी खेलते-खेलते कुछ सीखने को मिला..वैसे अक्सरहाँ मिलता है..मगर आज मैंने उस सीख को कागज पे उतारा..फिर सोचा क्यों न ब्लॉग पर ही लिखू..और यंही तक नही रुका मैं,फिर मैंने सोचा..हरेक लेवल से जो सीख मिलेगी उसे एक किताब का रूप दूंगा..😊।

आज मैंने..
67वे लेवल.. से सीखा...



हमारा पहला कदम ही जीत का नींव रखता है,और साथ ही जीत और हार का दिशा तय करता है..
(हमारा दिन कैसा होगा,अक्सरहाँ हमारे सुबह के शुरुआत से तय हो जाता है,मगर मैं इससे सहमत नही हूँ..😊हां कभी-कभी ऐसा होता होगा..वैसे आप अपने दिन को कभी भी खुशनुमा बना सकते है..चेहरे पे एक मुस्कान😊 लाकर..
मुस्कुराइए..😊 क्योंकि आप जिंदा है..और जिंदा इंसान कुछ भी कर सकता है..।)

कभी-कभी हमें आगे बढ़ने के लिए मदद की जरूरत पड़ती है...अगर मदद नही लिया तो...जंहा अटके है,वंहा न जाने कबतक अटके रहेंगे इसका पता नही चलेगा..दिन,सप्ताह,महीना,साल या ताउम्र..।
इसलिए आगे बढ़ने के लिए मदद लेने से झिझके नही..मदद ले और आगे बढें.. अपने झिझक को तोड़े..।
(मगर अफसोस हम जैसे कुछ लोग है,जिनकी झिझक टूटती ही नही😊..जिनका खामियाजा उन्हें ताउम्र भुगतना पड़ता है..😢)

मगर एक बात तो है..जब आप बिना मदद के आगे बढ़ते है..और सफल होते है,तो उसका सुकून ही कुछ और होता है..😊और ये सुकून हमेशा आपको सुकून देता है..।
मगर इसका दूसरा पहलू भी है..
अगर आप सफल नही हुए तो..🤔
इसलिए मदद लेने से हिचकिये मत..😊।
आगे बढ़ना है तो मदद लीजिये..चाहे वो आपका दुश्मन ही क्यों न हो..उससे भी मदद लीजिये।

68वा लेवल..से सीखा..
अपने हरेक मोहरे पे नजर रखें.. 
-जिस तरह शतंरज में हम अपने हरेक मोहरे पर नजर रखते है,उसी तरह जिंदगी में भी हमें, अपने हरेक सगे-संबंधी एवं आसपास के लोगों पर नजर रखनी होती है..क्योंकि इनकी अनदेखी कभी-कभी भारी पर सकता है,या फिर इनसे जुड़े रहने से जिंदगी में उत्थान आ सकता है..

शतंरज में कभी भी कोई चाल बिना सोचे समझे न चले-
जिंदगी में अक्सरहाँ हम कई बार बिना सोचे समझे,अनमने ढंग से आगे बढ़ते है,जिसका खामियाजा हमें अक्सरहाँ उठाना पड़ता है..

हमेशा धैर्य बनाये रखें..
कभी-कभी जीत हमारे हिस्से में इसलिय नही आता कि हम जितना चाहते है,बल्कि वो इसलिए आता है कि हम धैर्य बनाये रखते है..।

69/70वा लेवल से सीखा
कभी हार मत मानें..
अक्सरहाँ जब हम बार-बार हारते है,तो मन मे बुरे ख्याल आता है..कंहा आकर फंस गया..और मन करता है,अब इसे छोड़ दू मुझसे न हो पायेगा..।

मगर जब हम लगे रहते है..
तब,एक ऐसा समय आता है की, बिना उम्मीद के ही उम्मीद की किरण खिल जाती है..।और हम सफल हो जाते है..और सोचते है कि ये कैसे हो गया..।
अक्सरहाँ लोग इसे जादू मान लेते है..
मगर ये निरंतरता..और हार न मानने की जिद के कारण ही संभव होता है..।।
इसीलिए मैदान मत छोड़िए..लगे रहिये..।
जब आपसे किसी को उम्मीद नही होगी..यंहा तक कि आप भी उम्मीद करना छोड़ देंगे..मगर आप लगे रहेंगे..और तब ही जादू होगा..और आप सफल हो जाएंगे..।

कृष्ण कहते है-
 "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
   मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥"

●71वा लेवल से सीखा-

सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

जिंदगी में कुछ लोग..

जिंदगी में कुछ लोग होना चाहिए..
जो हमारे जिंदगी को स्पंदित करें..
जो हमारे जिंदगी में प्रणोदक(propellant) और  उत्प्रेरक(catalyst)का  काम करें..।।
जिंदगी में कुछ लोग होना ही चाहिए..


ये लोग शुरू से ही होते है हमारे आस-पास, मगर अफसोस हमें समझ ही नहीं होता,इन्हें समझने की..
और हम इनसे दूरियां बना लेते है..।।
दूरियां इतना बना लेते है..की फिर कभी करीब जा नही पाते..
अगर करीब चल भी गए..
तो वो अब न हमें स्पंदित करेंगे..
न ही वो प्रणोदक और उत्प्रेरक का काम करेंगे..।।
कोई नही..धैर्य रखें..
वो फिर से आपके स्पर्श से जीवंत हो उठेंगे..
और वो आपको फिर से स्पंदित,प्रणोदित और उत्प्रेरित करेंगे..।।

हमारे आसपास ऐसे लोगों की भरमार है..
इनसे दूरियां नहीं, इनसे करीबियां बढ़ाये..
ये वो लोग है..
जो आपको..आप से हम बनाएंगे...
और, औरों से खास बनाएंगे..।।

जिंदगी में कुछ लोग होना ही चाहिए..
जो हमारे जिंदगी को स्पंदित करें..
जो हमारे जिंदगी में प्रणोदक(propellant) और  उत्प्रेरक(catalyst)का  काम करें..।।
जिंदगी में कुछ लोग होना ही चाहिए..।

हमारे जिंदगी को सबसे पहले स्पंदित,प्रणोदित और उत्प्रेरित हमारे माता-पिता,भाई-बहन,रिश्तेदार, मित्र,शिक्षक,समाज और गुरु करते है..।।
मगर जब हम इनसे दूरियां बना लेते है..
तो फिर इनके बिना हमारा कोई अस्तित्व नही रह जाता..।।
ये वो लोग होते है..
जो हमारे जिंदगी को स्पंदित,प्रणोदित और उत्प्रेरित करके हमारे जिंदगी को नया मुकाम देते है..।।
ज्यादा खुशी मत होइये..😊
कभी-कभी इसका उल्टा परिणाम भी होता है..।
अगर आप उनके स्पंदन,प्रणोदन और उत्प्रेण को अच्छी तरह समझ नही पाए तो..।

जिंदगी में कुछ लोग होना ही चाहिए..