हम अक्सर कहते हैं कि "मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है," लेकिन क्या हमने कभी रुककर यह सोचा है कि इस 'समाज' का हमारे अंतर्मन पर क्या प्रभाव पड़ता है..??
समाज हमें सुरक्षा देता है, पहचान देता है, लेकिन अक्सर हमारी मौलिकता (Originality) की कीमत पर..।
बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि 'लोग क्या कहेंगे'। यह एक वाक्य कई बार हमारी रचनात्मकता और हमारे साहसी निर्णयों का गला घोंट देता है।
क्या हम वही बन रहे हैं जो हम वास्तव में हैं..या हम बनना चाहते है, या हम वही बन रहे हैं जो समाज हमसे उम्मीद करता है..?
आज डिजिटल युग में हम एकदूसरे से जुड़े तो हुए हैं, लेकिन संवाद खो गया है। आज हम भीड़ में भी अकेले हैं...क्यों..??
सहानुभूति (Empathy) की जगह अब जजमेंट (Judgment) ने ले ली है। एक स्वस्थ समाज वही है जहाँ व्यक्ति को उसकी खामियों के साथ स्वीकार किया जाए, न कि उसे एक सांचे में ढालने की कोशिश की जाए।
वर्तमान में समाज की अच्छी खामियां गुम होती जा रही है..अक्सरहाँ मैं अपने बुजुर्गों से सुना करता था- समाज किस दिन के लिए है..।मगर वर्तमान में आज ये समाज टूट रहा है..भले ही समाज मे कई खामियां क्यों न हो..मगर ये समाज ही होता है...जो हरेक परिस्थितियों में हमारे साथ होता है..।
मगर वर्तमान में आज, ये समाज टूट कर बिखर रहा है..
शहरों में ये ढांचा टूट ही गया है...आपने कई हृदयविदारक घटना अखबारों और न्यूज़ में देखा होगा..जब घर से लाश की बदबू आने लगती है,तब बगल वाले को पता चलता है..हमारे सामने कौन रहता है..हमें सालों तक पता नही चलता..ये हाल है शहरी समाज का..।
गाँव में अभी भी समाज जिंदा है..मगर ये भी अब अवसान की और जा रहा है..क्योंकि समाज अपना दायित्व का निर्वहन नही कर रहा है...।।
आइए हम थोड़ा सामाजिक बने..अपना हाथ आगे बढ़ा कर मानसिक,शारीरिक और आर्थिक योगदान देकर..।
आज हम आप जैसे भी है..इसमें इस समाज का अहम योगदान है..और हम, ऐसा कहने वाले आखरी पीढ़ी है..😊



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