शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

भीड़..

मैं इस भीड़ में कंही पिछड़ गया..
खुद को देखा तो बहुत पीछे पाया..
मगर ये क्या..
पीछे तो हूँ मैं..
लेकिन मैं भीड़ से ऊपर हूँ..
मेरे पीछे भी भीड़ है,मेरे आगे भी भीड़ है..
मगर मैं इस भीड़ में रहकर भी..
इस भीड़ से परे हूँ..।



न ही मुझे आगे की भीड़ प्रभावित करती है,
न ही पीछे की..
मगर इस भीड़ की..
कोलाहल और चकाचौध हम तक कभी-कभी पहुंच ही जाती है..
और मुझे प्रभावित कर जाती है..।

मैं जंहा हूँ वंहा से आगे जाना आसान है..
बस एक प्रणोदन की जरूरत है..
और मैं बहुत आगे चला जाऊंगा..
जंहा हम जैसे कई है..
मगर इनमें कोई भेद नही है..।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

खालीपन..