कभी कुछ,कभी कुछ..और कभी कुछ..
मगर कभी-कभी..
कुछ ऐसा लिखता हूँ..
जिसे लिखने के बाद नही..
बल्कि उसे बाद में पढ़ने के बाद..
अहसास होता है..
ये मैंने लिखा है..
और अपने लेखनी पर हल्का गुमान होता है..।।
और कभी-कभी..
मेरी लेखनी मेरा आइना बनकर मुझे झकझोर देता है..।
और मेरे वास्तविकता से मेरा आत्मसाक्षात्कार करा देता है..।
और कभी-कभी मेरी ही लेखनी मुझे तीर की तरह चुभता है..
और मुझे घायल करके क्षणभर के लिए अचेत कर देता है..।
मैं अक्सरहाँ लिखता हूँ..
कभी कुछ,कभी कुछ..
और कभी कुछ..।

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