शनिवार, 31 जनवरी 2026

किताब : अजपा जप एवं चिदाकाश धारणा


यह पुस्तक सत्यानंद सरस्वती द्वारा लिखा गया है..जिसमे वो अजपा जप और चिदाकाश धारणा के बारे में बताते है..।
इस पुस्तक के कुछ प्रमुख अंश नीचे है..


अजपा जप

साँस 'सो' की ध्वनि के साथ अंदर एवं 'हं' ध्वनि के साथ बाहर आती है, तो इसे 'अजपा गायत्री' कहते हैं।

​जब नामोच्चारण मुख से हो तो - "जप"

​जब नामोच्चारण हृदय से हो तो - "अजपा"


अजपा के द्वारा समाधि का प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है

​अजपा क्रियायोग का एक अंग है।

​(तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान क्रियायोग है - पतंजलि)


​•अजपा की साधना के लिए गुरु की आवश्यकता नहीं होता..

​"स्वाध्याय" क्या है..? अपने कार्यों के प्रति निरंतर जागरूकता ही स्वाध्याय है।

•​अजपा करते समय आज्ञा चक्र या अनाहत चक्र या शरीर के अन्य केंद्रों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए..।


●​अजपा करते वक़्त 3 महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देना चाहिए..

​1. गहरी श्वसन क्रिया 2.विश्रांति 3.पूर्ण जागरूकता पर


​"श्वसन प्रक्रिया में मंत्रों का योग ही 'अजपा' है।"


अजपा में इच्छित रूप से लंबी और गहरी श्वास लेना से

आयु बढ़ती है..😊


दाहिनी — पिंगला — सूर्य नाड़ी

​बांई — इड़ा — चंद्र नाड़ी

​इन दोनों का क्रमिक प्रवाह चेतना से अलग रखती है।

​●जब सुषुम्ना का प्रवाह हो तो ध्यान करना चाहिए।

●श्वास-प्रश्वास की दर प्रति मिनट 15 बार होना चाहिए।


​● अजपा करने की प्रक्रिया:

सुखद आसन में बैठकर शरीर को शिथिल रखें और गहरी साँस ले..

भीतर लेने वाली साँस के साथ "सो" और बाहर आने वाली साँस के साथ "हं" का योग करना चाहिए और इस दौरान कोई मानसिक विराम नहीं लेना चाहिए..।और कुछ समय के बाद शून्य में प्रवेश एवं भ्रूमध्य में चेतना को ले जाकर आज्ञा चक्र या अनाहत चक्र पर मन को एकाग्र करना चाहिए..और कुछ समय बाद फिर अनाहत का जाप करना चाहिए।

अजपा का अभ्यास बैठकर या लेटकर भी किया जा सकता है।


महत्वपूर्ण शब्द:

पूरक — सांस लेना

रेचक — श्वास छोड़ना

​कुंभक — सांस रोकना


●ध्यान के 4 सोपान हैं-

​•विश्रांतिकरण,जागरूकता,एक हो जाना और स्वयं को भूल जाना..।

◆​ध्यान की प्रक्रिया में एकाग्रता नहीं वरन जागरूकता का विशेष महत्त्व है।

अजपा अभ्यास में प्रमुख बातें-

​लययुक्त श्वसन, कल्पना, पूर्ण अविरल सजगता, पूर्ण शिथिलीकरण तथा समस्त शरीर के प्रति चैतन्यता।



चिदाकाश धारणा

चिदाकाश :- चित् + आकाश (चेतना का आकाश)

चित - मन, बुद्धि, अहंकार (अंत:करण)

चित् :- चेतना का पर्यायवाची।


स्मृतियों में 3 प्रकार के आकाश का वर्णन:

प्राकृतिक (सामान्य) आकाश

चित्ताकाश (मन का आकाश)

चिदाकाश (बुद्धि का आकाश)

प्रथम दो की अपेक्षा यह सूक्ष्म होता है,इसका संबंध शुद्ध चेतना से है।


योग उपनिषद में 5 प्रकार के आकाश की चर्चा:

आकाश :- प्राकृतिक आकाश, जिसे देख सकते हैं।

पराकाश :- अंदर एवं बाहर के अंधकार का संकेत करता है।

महाकाश :- अंदर एवं बाहर अनुभवगम्य अग्नि की सी चमक का प्रतिनिधित्व करता है।

तत्वाकाश :- अंदर की आत्मा की अनुभूति का दिग्दर्शन कराता है।

सूर्याकाश :- शुद्ध चेतना को प्रदर्शित करता है जो हजार सूर्यों की भांति तेजोमय है।

धारणा :- मानसिक शक्तियों को किसी विशेष क्षेत्र या वस्तु विशेष पर केंद्रित करना ही "धारणा" है।

​●ध्यान के लिए दो आसन सर्वोत्तम है-

पद्मासन और सिद्धासन (स्वस्तिकासन)


​●चेतना क्या है?

हमारे अंदर की ज्ञान शक्ति है,जिसे स्वयं का और दूसरे का ज्ञान रहता है।सूक्ष्म रूप से चेतना सर्वव्याप्त है।चेतना का स्वरूप इंद्रियों के माध्यम से प्रकट होता है।चेतना अस्तित्व का एक बुनियादी तत्व है। वह अपने स्वरूप को किसी भी माध्यम से किसी भी रूप में प्रकट कर सकती है।

रूप या माध्यम की सीमा चेतना की सीमा नहीं है, सिर्फ चेतना की अभिव्यक्ति ही सीमा है।


​● समाधि' का अर्थ..?

चित्त का समाहित हो जाना और इंद्रियों के अनुभव से ऊपर उठ जाना ही समाधि है।


कष्ट का मूल कारण है..?? आसक्ति(कर्म के प्रति, विचार के प्रति, आशा और मान्यताओं के प्रति)।

​अजपा अभ्यास कितनी बार करना चाहिए..??

3 बार करना चाहिए

​सुबह 4-6 के बीच: बैठकर

​शाम में आराम कुर्सी या आरामदायक पोस्चर में बैठकर और

​सोते वक्त सोते हुए।


अजपा जप से क्या लाभ होता है..??

अजपा हरेक रोगों की रामबाण दवा हैरोग के कई कारणों में एक कारण 'अतृप्त इच्छा' है, जिसका इलाज किसी के पास नहीं है, इसे अजपा से दूर कर सकते हैं।

​"मनुष्य दवाइयों से नहीं, बल्कि प्राणशक्ति के प्रवाह से ठीक होता है। अजपा के द्वारा प्राणशक्ति अविरल और सभी अंगों में प्रवाहित होती है।"

अजपा जप द्वारा मानसिक क्लेश का निवारण:

सभी व्याधियों (problems) का दो ही कारण है: राग और द्वेष

इसके कारण ही मानसिक क्लेश उत्पन्न होते हैं।

​इसे नियंत्रित करना न ही संभव है और न ही आसान।

​मगर अजपा के द्वारा मानसिक क्लेशों को दूर किया जा सकता है।


अजपा जप आधुनिक समय मे सबके लिए सहज है..इसके लिए न ही गुरु की आवश्यकता है और न ही किसी कर्मकांड की..मगर अजपा के द्वारा हम अपने जीवन के हरेक समस्याओं से छुटकारा पा सकते है..।

ये जितना सरल है,उतना ही प्रभावी है..इसीलिए अजपा को अपने जीवन मे अपनाकर अपने जीवन को सरल और सहज बनाये..।।

हम दुःखी क्यों है..??

अतीत से लेकर वर्तमान तक,हम सभी दुःखो से घिरे हुए है..
आखिर क्यों..??
इस क्यों का जबाब हम अतीत से ही ढूंढते आ रहे है..हमारे ऋषियों-मनीषियों ने दुःख का कारण और निवारण भी बताया है..।



सांख्य दर्शन दुःख का कारण "अविवेक"(पुरुष प्रकृति को एक समझना) को मानता है,और इसके निदान के लिए "विवेक ख्याति"(दोनों के बीच के अंतर को जानकर स्वयं का अनुभव करना) का मंतव्य प्रस्तुत करता है।

● वंही महर्षि पतंजलि दुःख का कारण "पंच-क्लेश"(अविद्या, अस्मिता,राग, द्वेष, और अभिनिवेश(मृत्यु भय)) को मानते है,और इससे निवारण के लिए "अष्टांगिक योग" का मार्ग बताते है।

●वही वेदांत दुःख का कारण "माया" को मानता है,और इसके निदान के लिए "आत्म ज्ञान" पर जोड़ देता है..।

●दूसरी तरफ महात्मा बुद्ध ने दुःख का कारण "तृष्णा(इच्छा)" को माना और इससे उबरने के लिए "अष्टांगिक मार्ग" का राह बताते है..।

●वंही महावीर जी दुःख का मूल कारण "कर्म और बंधन" को मानते है,और इससे छुटकारा पाने के लिए "रत्नत्रय"(सम्यक दर्शन,सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र) का मार्ग बताते है..।।

इसमें से कोई भी दर्शन दुःख से इंकार नही करता,वो दुःख को परम सत्य मानते है,आपका पृथ्वी पर पर्दापण होते ही,दुःख आपका साया बन जायेगा,आप और हम इससे बच नही सकते..मगर हम सब इससे बचने का निर्रथक प्रयास करते रहते है..।
हमारे संतों और ऋषियों ने जो मार्ग बताया है,वो इतना सरल नही है,जो हमसब उस राह पर चल सके..।

तो क्या किया जाय..??
◆सबसे पहले तो हमें, दुःख को वैसे ही स्वीकार करना होगा,जैसे हमने दिन और रात को स्वीकार कर लिया है..।

क्या अब हमें रात भयावह लगती है..??
शायद हममें से अधिकांश का जबाब नही में होगा..।
अब अपने आप को आज से 10000 वर्ष पीछे ले जाये और अपने आसपास के वातावरण का कल्पना कीजिये...न खाने,न पीने और न ही रहने का कोई ठिकाना है..दिन किसी तरह कट जाती है,मगर रात होते ही डर का शाया शुरू हो जाता है..।
हम ये भी नही सोच सकते कि,क्या हम कल का सवेरा देख पाएंगे..??
मगर वर्तमान में हम आने वाले भविष्य के बारे में भी सोच लेते है..😊
इसीलिए तो इन्वेस्टमेंट करते है..।
ये कैसे संभव हुआ..??
उस रात को स्वीकार कर,रात को बेहतर बनाने से..।
इसीलिए हमें दुःख को स्वीकारना होगा,और उसे बेहतर बनाना होगा..तब ही हम दुःख से छुटकारा पा सकते है..।।

दुःख की उत्पत्ति कब होती है,और ये हमें कब प्रभावित करता है..??
दुःख की उत्पत्ति कभी भी हो सकती है..जैसे आंख बंद करते ही अंधेरा हो जाता है,उसी तरह दुःख का स्मरण करते ही दुःख की उत्पत्ति हो जाती है..।
जिस तरह हम दिन में आंख बंद करने के बावजूद उजियाला का अनुभव कर पाते है,उसी तरह हम दुःख को भी महसूस कर पाएंगे कि ये फालतू का दुःख है,या सच्चा का..।।
वर्तमान में हममें से अधिकांश लोग दुःख को स्वयं आमंत्रित कर रहे है,जिस तरह आंख बंद करके अंधेरे को आमंत्रित करते है..।

हम दुःख को कैसे आमंत्रित कर रहे है..??
इसका जबाब आप स्वयं ढूंढिये..😊
वर्तमान में दुःख का सबसे बड़ा कारण "डिजिटल गुलामी" है..ये आपको क्षणभंगुर आभासी सुख देता है..और उसके बाद निरंतर दुःख के दलदल में घसीटते जाता है..और हमें अहसास भी नही होता...।आज इसके कारण अवसाद(depression),चिंता(Anxiety) वैश्विक महामारी का रूप ले चुका है..।

• "खालीपन" हां दुःख का सबसे बड़ा कारण हमारा खालीपन है..
दुःख का अहसास भी तब होता है,जब आप खाली होते है..जबतक आप व्यस्त होते है,तबतक आपको दुःख स्पर्श नही करता..।
जरा सोचिए..आप दुःखी कब होते है 🤔..??
जब हम खाली होते है..और जब हम खाली होते है तो हमारे पास दो चुनाव होता है..दुःख की और ढुलकने का या फिर सुख की और बढ़ने का..जब हम सुख की और बढ़ने में सक्षम नही होते तो दुःख की और यू ही ढुलक जाते..हम दुःख की और न ढुलके इसके लिए हम कई माध्यम को अपनाते है..जैसे सोशल मीडिया यूज़ करना,मूवी देखना या कुछ ऐसी एक्टिविटी जो हमें दुःख से दूर करें..हम कामयाब भी होते है..मगर तबतक ही जबतक हम वो एक्टिविटी कर रहे होते है,और फिर हम वंही पे खुद को पाते है..।
तो फिर क्या करें..??
अपने आप को सार्थक कार्य मे व्यस्त करें..जिसे करने के बाद आपको कुछ आउटपुट मिले..(वो सोशल मीडिया भी हो सकता है,या संगीत,मूवी कुछ भी)
अगर हम ऐसा करते रहें तो धीरे-धीरे ये दुःख भी रात की तरह सहज होने लगेगा..।।
 "दुःख को अस्वीकार नही,स्वीकार करें"
 क्योंकि स्वीकृति ही निवृति है..।।
Don't reject suffering, accept it"
Because acceptance is liberation..


गुरुवार, 29 जनवरी 2026

कैसे हो..

कैसे कहूं कि..
मैं..कैसा हूँ..।
सच कहता हूं..
मैं वैसा तो नही हूँ..
जैसा तेरे पूछने..
से पहले था..।

पहले मायूस था मैं..
थोड़ा उदास भी था मैं..
मगर तेरे पूछते ही..
कैसे हो..??
मैं,
मैं रह ही नही गया..।
मैं,
मैं हो गया..।।






बप्पा..



बप्पा क्या कर दिया आपने..
ड़र लगता है..
कंही आपसे भी ज्यादा..
उससे प्यार न करने लगूं..।

मगर एक बात है..
वो भी आपको पूजती है..
आपको मानती है..
आपसे प्यार करती है..।

बप्पा..
आपसे बेहतर कौन जानता है..
आपने जो किया है..
वो अच्छे के लिए ही किया है..।


बुधवार, 28 जनवरी 2026

कंहा थे..

अब जिधर देखता हूँ..
उधर तुम ही दिखते हो..
न जाने क्या किया तूने..
मेरे सांसों में..
अब सिर्फ तुम बसते हो..।

कंहा थे इससे पहले..??
अब वीरान हो गई जिंदगी को..
फिर से नया जान दे रहे हो..।

जब से तुम आये हो..
तबसे मैं,
मैं रह ही नही गया..
अब बस सिर्फ मैं..
मैं हो जाना चाहता हूं..।

अब जिधर देखता हूँ..
उधर तुम ही दिखते हो..
न जाने क्या किया तूने..
मेरे सांसों में..
अब सिर्फ तुम बसते हो..।



सोमवार, 26 जनवरी 2026

कभी-कभी..

कभी-कभी थकना जरूरी है..
क्योंकि कभी-कभी थकने के बाद अहसास होता है कि,
क्या हम सही दिशा में जा रहे है या नही..।

कभी-कभी मायूस होना जरूरी है..
क्योंकि मायूस होने के बाद ही मायूसी का जड़ का पता चला पाता है..।

कभी-कभी सोचना भी जरूरी है..
क्योंकि सोचने के बाद ही सही निर्णय निकलता है..।।

कभी-कभी भविष्य में झांकना भी जरूरी है..
क्योंकि वर्तमान का सही दिशा का पता चलता है..।।

रविवार, 25 जनवरी 2026

कंहा ढूंढ रहे हो मुझे..

बप्पा..
कंहा ढूंढ रहे हो मुझे..
किस स्वरूप में ढूंढ रहे हो मुझे..
जिस स्वरूप में, तुम देख रहे हो मुझे..
क्या उस स्वरूप में कोई और देख सकता है मुझे..
तो फिर क्यों जंहा-तहाँ ढूंढ रहे हो मुझे..।

मुझे तुम खुद में समाहित करो..
और हरेक सांस से मुझे विस्तारित करो..
इतना विस्तार करों..
जितना तुम मेरा विस्तार देख रहे हो..।।

बप्पा..


कभी हार मत मानो..

कभी हार मत मानों..
क्योंकि जब हम हार मान लेते है..
तो आने वाली पीढियां भी हार मान लेती है..
और वर्तमान पीढ़ी भी..।

भले ही जीत सुनिश्चित न हो..
मगर मैदान में डटे रहों..
क्या पता,
पासा कब पलट जाए..
और जीत हमारे हिस्से में आ जाये..।।

इस तरह जितने वालें तुम सिर्फ अकेले नही होंगे...
इतिहास तुम्हारे जैसे योद्धाओं से भरा पड़ा है..
जिसने अंतिम क्षण तक मैदान में डटने का निर्णय लिया..
उसके ही सर पर जीत का सहरा सजा है..।

इसीलिए,
कभी हार मत मानों..
क्योंकि जब हम हार मान लेते है..
तो आने वाली पीढियां भी हार मान लेती है..
और वर्तमान पीढ़ी भी..।



शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

"पराक्रम दिवस" और सुभाष चंद्र बोस..

जब मैं पहली बार कोलकाता मेट्रो में सफर कर रहा था..तो एक चीज मुझे बहुत अच्छी लगी वो ये की - हरेक मेट्रो स्टॉपेज का नाम बंगाल के विभूतियों के नाम पर था,जिसे मैं इतिहास के पन्नों में पढ़ा करता था,उनका नाम कान में गूँज कर उन्हें जीवंत कर दे रहा था..।
मैं इस कारण बंगाल सरकार का फैन हो गया..और सोचने लगा की ये कदम हरेक सरकार को उठानी चाहिए..जिन विभूतियों ने अपना जीवन देश और समाज के लिए समर्पण किया उनके लिए हम इतना तो कर ही सकते है..।
जिससे हम उनके योगदान को भूले नही..।

आखिर ये परंपरा सिर्फ बंगाल में ही क्यों है,और किसी राज्य में क्यों नही..?
तो इसका जबाब मुझे आज मिला..
इस परंपरा की शुरुआत 1922 में हुई..जब सुभाष चंद्र बोस कलकत्ता महापालिका के कार्यकारी अधिकारी बने,तो उन्होंने गलियों और सड़कों का नाम स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर रखना शुरू किया..साथ ही जिन परिवार के लोग आजादी के लड़ाई में शहीद हुए थे उनके परिवार के सदस्य को महापालिका में नॉकरी देना शुरु किये थे..।
ये था स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि..
मगर आज क्या हो रहा है..??

2021 से सरकार ने 23 जेनुअरी को  "पराक्रम दिवस" के रूप में मनाना शुरू किया..जो एक बहुत ही अच्छी पहल है..और इनके लिए ये सम्मान वैसे ही है जैसे सूर्य को दीपक दिखाना..।


सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ध्रुव तारा है..सबसे अलग सबसे खास..।
उन्होंने वो किया..जो उस समय कोई सोच तक नही सकता था..
न ही भारतीय और न ही अंग्रेज..।
जब उनकी मृत्यु की खबर फैली तो ब्रिटिश लेखक,राजनीतिक चिंतक जॉर्ज ऑरवेल ने कहा-" दुनिया के लिए ये अच्छा हुआ" उनकी धमक सिर्फ भारत तक ही नही पूरे विश्व में था..।

आखिर उन्होंने ऐसा क्या किया कि हम उनके जन्मदिन के उपलक्ष्य में "पराक्रम दिवस" मनाते है..-

वो पहले ऐसे शख्स थे जो ICS(वर्तमान में IAS) की परीक्षा में 4थ रैंक लाने के बाद ये कहकर नॉकरी नही की..की मुझे अंग्रेजों की गुलामी नही करनी है..(ICS की परीक्षा उन्होंने पिता के दबाब में दिया था)
नॉकरी को ठुकराते ही वो अंग्रेजों के नजर पे चढ़ गए क्योंकि ये खबर ब्रिटिश अखबार में भी चर्चा का विषय बन गया था..।तब से ही वो अंग्रेजों के नजर पे चढ़ गए...।
"स्वतंत्रता केवल राजनीतिक ही नही,मानसिक भी होनी चाहिए"।

11 बार जेल जाना पड़ा,और हरेक बार मजबूत होकर निकले..।
 "तुम मुझे खून दो,मैं तुम्हें आजादी दूंगा।"

17 जनुअरी 1941 में 20वी सदी का सबसे बड़ा साहसिक राजनीतिक पलायन करने वाले सख्स बने..।
"गुलामी का सबसे बड़ा सहारा डर होता है-
 और डर को तोड़ना ही क्रांति है.."।

जर्मनी और जापान का समर्थन लेकर विश्व राजनीति को चौकाया..।
"स्वतंत्रता किसी से भीख में नही ली जाती,
 उसे हासिल किया जाता है.."।

विश्व का पहला "महिला सैन्य टुकड़ी" का गठन किया("रानी लक्ष्मीबाई रेजिमेंट")
"देश की सेवा करने का सबसे अच्छा तरीका है-
 अनुसाशन और त्याग"

भारत के बाहर आजाद हिंद सरकार की गठन कर उसके प्रधानमंत्री बने जिसे जापान,जर्मनी,इटली,बर्मा,थाईलैंड,क्रोशिया एवं अन्य देशों ने मान्यता दिया...।
 "मेरे जीवन का उद्देश्य भारत को पूर्ण स्वतंत्र देखना है।"

गांधी जी को "राष्ट्र पिता" कहकर संबोधित किया.(आज ढेर सारे भ्रम फैलाये जाते है गांधी,नेहरू और सुभाष को लेकर जबकि इनके विचार अलग-अलग थे मगर ये तीनों एक दूसरे के पूरक थे..)
 "एक सशक्त और संगठित राष्ट्र ही स्वतंत्र रह सकता है"।

वो सिर्फ क्रांतिकारी नही,बल्कि आध्यात्मिक भी थे,वो स्वामी विवेकानंद को भारत का "आध्यात्मिक गुरु" माना..।
 "राजनीति में समझौते हो सकते है,लेकिन राष्ट्रीय स्वाभिमान में नही।"

उनकी मृत्यु आज भी रहस्य है..।
 "जय हिंद"




कंहा से आई वो..

ये दूसरी दफा हो रहा है..
जब दिल फिर से धड़कना शुरू हो गया..।

पहले..एक अल्हड़ के लिए धड़कता था..
जिसे देखते ही मेरी फिजा रंगीन हो जाती थी..।

अब उसके लिए थोड़ा-थोड़ा धड़कना शुरू हुआ..
जो मुझसे मिलों दूर है..
उसका मेसैज मेंरे हृदय को स्पंदित कर देता है..।

मालूम नही कंहा से आई वो..??
और मेरे वीरान हो गई जिंदगी में..
हरियाली सी छा गई वो..।


गुरुवार, 22 जनवरी 2026

"ठीक-ठाक"..

मैंने पूछा..
कैसे हो..??
उसने कहा "ठीक-ठाक"..।
इस ठीक-ठाक में न जाने कितना दर्द छुपा था..
न वो बयां कर सकते थे...
और न ही मैं..
इस ठीक-ठाक में छुपा दर्द को समझ सकता था..।


अक्सरहाँ जब दर्द बयां नही कर पाते है..
तो "ठीक-ठाक" कह कर काम चला लेते है..
क्योंकि और ऑप्शन ही क्या है..😊??

कहने को,सिर्फ दो शब्द है "ठीक-ठाक"..
मगर इस शब्द में..
न जाने कितना दर्द और आहें छुपा हुआ है..
ये सिर्फ ठीक-ठाक कहने वाले ही जानते है..
या फिर जो जान लेते है..
वो भी "ठीक-ठाक" को स्वीकार कर लेते है..
क्योंकि और ऑप्शन ही क्या है😊..??





सोमवार, 19 जनवरी 2026

दादी माँ..

दादी माँ..
अब तक आपका..
कम से कम दो बार कॉल आ गया होता..
आप,पहली बार जन्मदिन की शुभकामना और ढेर सारा आशीर्वाद और प्यार देती..
और दूसरी बार कॉल करके पूछती क्या-क्या बनाया..
फिर तीसरी बार रात में कॉल करती...
मगर इस बार आपका कॉल नही आएगा..😢



मगर अभी भी,आपका मुस्कुराता चेहरा, मेरे सामने है..😊
ऐसा लग रहा है..
जैसे,उस जंहा से भी आप ढेर सारा प्यार मुझपे बरसा रही है..।।

आपका मुस्कुराता चेहरा आज भी मेरे जेहन में है..
और सदा रहेगा..।।
लव यू दादी माँ..





मैं अभी कुछ नही हूँ..

मैं अभी कुछ नही हूँ..
मगर अब भी मुझमें..
असीम संभावनाएं बची हुई है..।

बस एक बार खुद को समेटना है..
और खुद को समेट कर 
उस असीम संभावनाओं को
साकार करना है..।।

मैं अभी कुछ नही हूँ..
मगर अब भी मुझमें..
असीम संभावनाएं बची हुई है..।

पापा..

पापा..
मैं आपका काबिल बेटा नही बन पाया..
पापा..
मैं आपके सपनों को रंग नही दे पाया..
पापा..
मैं काबिल नही बन पाया..
पापा..
मगर एक दिन जरूर..
वो दिन आएगा..
जब आप मुझपे गौरवान्वित महसूस कर पाएंगे..।।
पापा..

रविवार, 18 जनवरी 2026

सुबह हो ही रही थी..

सुबह हो ही रही थी...
की आंख लग गई..।
आंख लगी ही थी कि..
सपनों में तुम आ गई..।
तुम आई ही थी,
की आंख खुल गई..।
आंख खुली ही थी..
कि मोबाइल पे एक मैसेज आया..
उस मेसैज ने मेरे लिए 
गुड मॉर्निंग का पैगाम लाया..।

सुबह हो ही रही थी..
की आंख लग गई..।


दोसजी..

मैं उसे हर रोज याद करता हूँ..
मगर उसे कॉल नही करता..।
क्योंकि..
ड़र लगता है..
कंही वो फिर कॉल न काट दे..।।



तुम्हारा फोन न उठाना उतना तकलीफ देह नही था..
जितना तुम्हारा फोन काटना..
आज भी दर्द देता है..।।

मालूम नही..
किस मनहूस घरी पर मैंने..
तुम्हें फोन किया..
जो तुम्हें फोन काटना पड़ा..।

मालूम नही क्यों..
मैं तुम्हें आज भी याद करता हूँ..
और तुम्हारे फ़ोन आने का इंतजार करता हूँ..।।

फ़ोन करने को मैं भी फ़ोन कर दु...
मगर डरता हूँ..
कंही तुम फिर फोन न काट दो..।।

मैं ये भी जानता हूँ..
क्योंकि.. 
तुम्हारी जिंदगी अब सिर्फ तुम्हारी नही है..
क्योंकि आधी जिंदगी की लगाम तूने..
मोहतरमा के हाथों में थमा दिया है..।

मुझे आज भी तुम्हारे फोन का इंतजार है..
और एक सच या झूठ सुनने का इंतजार है..
तुम फोन करो..और कहो..
दोसजी मैंने नही,हो सकता है..
उन्होंने फोन काट दिया हो..।
और मैं मुस्कुराते हुए इस सच को स्वीकार कर लूं..।

मुझे आज भी तुम्हारे कॉल का इंतजार है..
दोसजी..


हम अयोग्य है..

हम अयोग्य है..
इसीलिए तो लड़ रहे है..
लड़ भी किस चीज के लिए रहे है..
तेल,खनिज और जमीन के टुकड़े के लिए..।


जबकि ये ब्रह्मांड इतना विशाल है..कि
 इस पृथ्वी का भी..
इस ब्रह्मांड में कोई खास स्थान नही है..
जिस तेल खनिज के लिए हम लड़ रहे है..
हो सकता है..
ब्रह्मांड में कोई ऐसी जगह होगी जंहा..
खनिज और तेल की धार बह रही होगी..।

हम अयोग्य है..
इसलिय तो लड़ रहे है..।
खुद से..दूसरे से..
जिस रोज हमारी अयोग्यता दूर हो जाएगी..
उस रोज हम लड़ना बंद कर देंगे..।।

हम अयोग्य है...
इसलिय लड़ रहे है...।।

मैं तुमसे मिलकर..

कैसे कहु मैं उससे..
मुझे प्यार का इजहार करना नही आता..।
अगर देखना ही,हो तुमको..
मेरे दिल मे झांक कर देखो..
प्रेम का सैलाब बह रहा है..।

मुझे नही आता.. 
इस भीड़ की तरह प्रेम जताना..।
क्या करूँ..
मैं हूँ ही ऐसा..।

मैं तुमसे मिलकर..
"मैं"हो जाना चाहता हूँ..।
क्योंकि इस जंहा में सिर्फ एक ही सत्य तो है..
और वो है..
"मैं" हो जाना..।।


शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

सोचा था..

सोचा था तुम्हें अब मैसेज नही करूँगा..
मगर तुम्हारा स्टेटस देखकर..
मैं भूल गया..
की तुम्हें मैसेज नही करना था😊..।।

तुम मेरी जिंदगी में आई..
तपती धूप में,
बिन बादल बरसात की तरह..।
और मैं तुम्हें भूलने की व्यर्थ कोशिस कर रहा हूँ..
सावन की बरसात की तरह..।

तुम्हारा एक मैसेज..
मुझे स्पंदित कर देता है..
तुम्हारा एक कमेंट मुझे..
अनकही सी उलझन में डाल देता है..
कि कोई अजनबी..
इतना अपना सा कैसे लग सकता है.??


बुधवार, 14 जनवरी 2026

समय..

समय..
न यह ठहरता है..
न यह लौटता है..
यह तो बस..
पलकों के झपकने में बीत जाता है..।

जिसे हम 'कल' कहते है..
वह एक याद है..।

जिसे हम 'कल' कहेंगे..
वह एक प्यास है..।

और जो 'अभी' है..
बस वही प्रकाश है..।।



Yoga for digestive system